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कोई यूँ ही नहीं चुभता

मैंने कौन-सी कविता कैसे लिखी, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए असंभव-प्रायः है। भावनाओं के सागर में उठे ज्वार ने अन्तस् की धरती पर कैसा रेणुका-चित्र अंकित किया -यह तो सबको दिखाई देता है, लेकिन इस चित्र के सृजन की त्वरित प्रक्रिया में लहर कैसे उठी; कैसे धरती पर...

ख़ुशियों को ज़ंजीर

लिखे किसी ने गीत तो समझो, मन को गहरी पीर मिली सृजन हुआ उन्मुक्त तभी जब, ख़ुशियों को ज़ंजीर मिली किस्से बने, कहानी फैली, चित्र सजे, कविता जन्मी पर न मिली मजनू को लैला, ना रांझे को हीर मिली ✍️ चिराग़...

काव्य

जिन शिखरों को हो पिघलने से ऐतराज़ उन्हें कभी नदी-सा बहाव नहीं मिलता अनुभूति अनकही रहती हैं जब तक अक्षरों से उनका स्वभाव नहीं मिलता जोड़-तोड़ करने से कविता तो बनती है किन्तु ऐसी कविता में भाव नहीं मिलता काव्य तो है ऐसी पीड़ाओं की प्रतिध्वनि जहाँ टीस उठती है पर घाव नहीं...

मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा

मेरे अन्तर्मन की पावन-सी कुटिया में मेरे गीतों की दिव्य प्रेरणा बसती है उसकी ऑंखों से बहती हैं ग़ज़लें-नज्में कविता होती है जब वो खुलकर हँसती है हर भाषा, संस्कृति, काल, धर्म और धरती की हर उपमा उस सौंदर्य हेतु बेमानी है सारे नष्वर लौकिक प्रतिमानों से ऊपर सुन्दरता की वो...

शायरी

शायरी इक शरारत भरी शाम है हर सुख़न इक छलकता हुआ जाम है जब ये प्याले ग़ज़ल के पिए तो लगा मयक़दा तो बिना बात बदनाम है ✍️ चिराग़...
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