Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सोशल मीडिया पर रचना का सम्मान किया जाता है, रचनाकार का नहीं। ठीक इसी प्रकार जैसे सरकार ग़रीबी के हित की चिंता करती है, ग़रीब के हित की नहीं।
लगभग प्रत्येक सोशल नेटवर्किंग साइट ने किसी की रचना बहुत पसंद आने पर उसे ‘शेयर’ करने का विकल्प बनाया है, लेकिन चूँकि बनी हुई लकीरों पर चलनेवाले लोग इतिहास में नाम दर्ज नहीं करा पाते इसलिए सोशल मीडिया के मेहनती लोग एक क्लिक के इस आलस्यपूर्ण मार्ग को छोड़कर उस सामग्री को कॉपी करते हैं, फिर अपनी वॉल पर उसे पेस्ट करते हैं। फिर उसके नीचे से रचनाकार का नाम मिटाते हैं, कुछ अतिरिक्त परिश्रमी उसके नीचे अपना नाम भी लिखते हैं। इतनी मेहनत करने के बाद इनकी पोस्ट पर जो प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ आती हैं, उनको भी ये बड़ी विनम्रता से ग्रहण करते हैं। मूल रचनाकार इतनी सारी प्रशंसा बटोरकर पथभ्रष्ट न हो जाए इसलिए ये देवदूत प्रशंसकों को पथभ्रष्ट करके उनके हिस्से की प्रशंसा का हलाहल पचा जाते हैं।
यदि कोई टुच्चा रचनाकार इस तरह की किसी महानता पर ऐतराज़ जताता है तो इस पंथ के सभी अनुयायी इकट्ठा होकर उस रचनाकार को धिक्कारने लगते हैं। इस धिक्कार यज्ञ में जो मंत्र पढ़े जाते हैं उनका समवेत तात्पर्य यह होता है कि ‘आपकी रचना पसंद आई इसीलिए तो कॉपी-पेस्ट की, आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपकी रचना को प्रचारित किया जा रहा है, आपने रचना प्रकाशित कर दी तो वह अब जनता की हो गई, आपकी सोच छोटी है इसलिए यह घटिया विवाद कर रहे हो, आदि आदि।’ ज़्यादा बहस करनेवाले लोगों से यहाँ तक पूछ लिया जाता है कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुमने ही लिखी है, हो सकता है तुमने भी कहीं से चुराई हो!
अपनी रचना चोरी होने की शिकायत करनेवाला अपराधी काफ़ी अपमानित और शर्मिंदा होने के बाद ब्लॉक हो जाता है। ब्लॉक होते ही सर्जक और उपभोक्ता के मध्य एक दीवार उठ जाती है, रचनाकार दीवार के इस पार किलसता रह जाता है और रचना उस पार तारीफ़ें बटोरती रहती है।
कविता, लेख, व्यंग्योक्ति, फ़ोटो, कैरिकेचर, संगीत, स्वर, वीडियो शॉट, पेंटिंग, क्लिप आर्ट और डिजिटल डिज़ाइन जैसे सभी अमूल्य रत्न, मूल रचनाकार की गुदड़ी से उठाकर अपनी वॉल के शोरूम पर ले जाने वाले ये जौहरी रचनाकार को शोहरत और क़ामयाबी के नशे से बचाते हैं। हास्य की लघुकथाओं के माथे पर चुटकुले का फट्टा चिपकाकर उन्हें लावारिस करने की परंपरा तो युगों-युगों से चली ही आ रही है। जब पूरी-पूरी कविता, लेख और लघुकथा ही अपनी साड़ी नहीं बचा पाती तो ऐसे में वन लाइनर, विचार और व्यंग्योक्ति की मिनी स्कर्ट की तो बात ही क्या करनी। लोकोक्तियां, मुहावरे, लोकगीत, दंतकथाएँ, गल्प आदि इसी प्रवृत्ति के पुरखों के सद्प्रयासों से लावारिस हो चुके हैं।
राजनेता शायरों के अशआर पढ़कर भाषण जमाते हैं लेकिन शायर को न तो श्रेय मिलता न अर्थ। फ़िल्म अभिनेता रोज़ अपने सोशल हेंडिल पर कुछ न कुछ चेप देते हैं, लेकिन श्रेय कभी किसी को नहीं देते। हाँ, उनके बाबूजी की कविता को श्रेय देकर भी कोई कहीं उध्दृत कर दे तो वे कॉपीराइट का नोटिस ज़रूर भिजवा देते हैं। मोटिवेशनल स्पीकर्स बिना नाम के कविताएँ और सूक्तियां उद्धृत करके मूल रचनाकारों को डिमोटिवेट करते ही रहते हैं।
अरे भाई, कुम्हार की तो नियति ही है भट्ठी का ताप सहना। उसके बर्तनों को कुम्हार की ज़िंदगी के अभिशाप से दूर ले जानेवाला देवता नहीं तो और कौन है। तुमने बच्चा पैदा कर दिया, अब उसके सर्टिफिकेट में बाप के नाम की जगह कोई टाटा-बिड़ला अपना नाम लिख दे तो तुमको आपत्ति क्यों है? शर्म आनी चाहिए, अपनी शोहरत के लिए तुम अपने बच्चे की प्रगति में बाधक बनना चाहते हो।
इससे ज़्यादा घटियापन और क्या होगा कि कॉपी-पेस्ट करनेवाले महान परोपकारियों के मार्ग में मुश्किलें खड़ी करने के लिए अच्छे भले टेक्स्ट को इमेज बनाकर, उस पर अपना नाम, वॉटरमार्क और लोगो आदि सब चिपकाकर पोस्ट करने लगे हैं। लेकिन कर्मठ महान लोग ऐसी चुनौतियों से घबराते नहीं, बल्कि फोटोशॉप पर उस वॉटरमार्क, लोगो और नाम को हटा देते हैं। यदि यह सम्भव न हो तो उस रचना को अपनी कोमल अंगुलियों से दोबारा टेक्स्ट फॉर्मेट में कम्पोज़ करके फिर पोस्ट करते हैं। कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े, लेकिन ये मूल रचनाकार को सफलता के अहंकार से बचाने के लिए कटिबद्ध हैं।
जो लोग बिना नाम की रचनाओं पर कमेंट और लाइक करते हैं, वे इन महान देवदूतों को प्रोत्साहित करते हैं। यदि लोग बेनाम रचनाओं पर प्रतिक्रिया देना बंद कर दें तो ये बेचारे देवदूत हतोत्साहित होकर विलुप्त हो जाएंगे, लेकिन आम खानेवाले को इस बात से क्या लेना-देना की जिस बाग़ में यह मिठास उपजी है उसके माली के घर की रोटियां कौन चबा रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
मैं एक ऐसे साहित्यकार को जानता हूँ जो हर समय विरोध और प्रतिकार की मुद्रा में ही दृष्टिगोचर होते हैं। वे कहीं भी, कभी भी, किसी भी बात से असहमत हो जाते हैं। यह असहमति उनकी दाढ़ी की तरह घटती-बढ़ती रहती है।
वेदव्यास से लेकर तुलसीदास तक और राजेन्द्र यादव से दुष्यंत कुमार तक कोई साहित्यिक तीसमारखां उनकी असहमति के दायरे से अछूता नहीं रह सका। एक बार तो वे मुझसे इस बात पर असहमत हो गए कि मेरा नाम उर्दू का लफ़्ज़ क्यों है। इस बात पर जब उनकी असहमति मेरे माता-पिता के प्रति असम्मान तक पहुँच गई तब मुझे अपने धैर्य देवता को स्तंभित कर काफी जनसुलभ शब्दावली से उनका रुद्राभिषेक करना पड़ा था। तब कहीं जाकर उनके मूल शांत हुए।
वे स्वयं को हिंदी का सबसे बड़ा पक्षधर और हितैषी मानते हैं। साथ ही वे यह बात भी पूरे ज़ोर-शोर से मानते हैं कि जिसे वे नहीं मानते उसका होना व्यर्थ है। इसी कारण विवेकानंद से लेकर कबीर तक उनके द्वारे अपना-अपना साहित्यिक बोरिया लिए पड़े रहते हैं ताकि किसी दिन उनके भाग्य जागें और उनका निरर्थक जीवन सार्थक हो जावे।
चूँकि समस्त साहित्यकारों को पढ़ने के उपरांत वे उनको मान नहीं पाए इसलिए आजकल अपने वक्तव्यों में वे अपनी बहू के मोबाइल सेट, आपनी पोती की सहेलियों, विदेश में सैटल अपने पोते की ई-मेल, अपने चश्मे का नंबर और अपनी बनाई चाय में अदरक की खुशबू जैसे जाने-माने उद्धरणों से काम चलाते हैं।
नई पीढ़ी और नए फैशन आदि से वे बहुत खिन्न रहते हैं। विकास के नाम पर सुविधाभोगी हो चले युवाओं से उन्हें ख़ास चिढ़ है। यह चिढ़ उनके उन लेखों में अधिक मुखर हो उठती है जो वे डायरेक्ट लेपटॉप पर ही लिखते हैं।
एक बार तो किसी शोकसभा में बोलते हुए वे स्वयं दिवंगत आत्मा से असहमत हो गए थे। उन्होंने फूलमाला के बीच से झाँकते चेहरे को देखकर हिकारत से कहा- ‘ये क्या बात हुई भाई, मरना ही था तो पैदा क्यों हुए थे? मुझे समझ नहीं आता कि आजकल के बूढ़े इतने कामचोर क्यों होते जा रहे हैं कि साँस लेने जितना श्रम भी नहीं कर सकते?’ शोकसभा में अन्य लोग यदि तेरह दिन के मातम से ऊबे हुए न होते तो उस दिन शोकसभा के बाहर ‘टू बी कॉन्टीन्यूड’ का बोर्ड लग जाता।
वे साहित्य में चलताऊ बातों से उकता चुके हैं। इसीलिए अब वे उन घिसी-पिटी लकीरों को तोड़ने में जुट गए हैं। वैचारिक तोड़-फोड़ से उन्हें इतना लगाव है कि उन्होंने अपनी एक ही किताब के शीर्षक में दो बार ‘तोड़ो’ शब्द का प्रयोग किया है। उनकी इस तोड़-फोड़ से प्रभावित होकर राजधानी में कुछ टूटी-फूटी हिंदी के साहित्यकारों ने उन्हें दद्दा कहना शुरू कर दिया है। इस स्नेह से फूल कर पिछले दिनों उन्होंने उन मुट्ठी भर कवियों का प्रतिशत निकालकर बताया कि मुझे दद्दा कहकर सम्मान देने वाले इन दस प्रतिशत के अतिरिक्त और कोई कवि है ही नहीं।
उनके साहित्य तथा भाषा प्रेम से मैं अभिभूत हूँ। वे हिंदी भाषा को सहज होते देख खिन्न हो जाते हैं। वे उसे उल्टे पाली और प्राकृत की ओर जाते देखना चाहते हैं। वे हिंदी की मुस्कुराहट से परेशान रहते हैं। उन्हें हिंदी में रोते-पीटते, माथा फोड़ते और गाली-गलौज करते माहौल रुचते हैं। वे हिंदी को दीमक खाए भोजपत्रों से उठकर मोबाइल स्क्रीन पर चमकता देखते हैं तो उस पर गंगाजल छिड़कने लगते हैं। इस चक्कर में वे अपने कई मोबाइल सेट ख़राब कर चुके हैं।
बहरहाल, वे हिंदी के योग्य पुत्र हैं। उनका कर्तव्य है कि वे हिंदी को कमरे के भीतर वाली कोठड़ी में घोंट कर रखें। क्योंकि उनका मानना है कि यदि उनकी हिंदी माता किसी अन्य भाषा के शब्द को गले लगा लेगी तो वह अस्पृश्य हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
कलाएँ, समाज की वन्दनवार हैं। ये इस्तेमाल की जाती हैं, समाज के उत्सवों को श्वास देने के लिए। ये काम आती हैं, समाज की उदासी में मुस्कान भरने के लिए। इन्हें निमंत्रित किया जाता है, समाज का सिंगार करने के लिए। लेकिन जब कोई आपदा आती है तब इन वन्दनवारों को कोई नहीं बचाता। किसी को ध्यान ही नहीं रहता कि जिन तोरणद्वारों से आते-जाते शुभाशीष लिया है, उनका जीवन भी संकट में है।
वन्दनवार भागते-दौड़ते लोगों के माथे चूम-चूमकर अपने अस्तित्व की याद दिलाती हैं, आपदा से लड़ने के लिए भागते हुए समाज को आशीष देने का कर्तव्य निभाती रहती हैं। समाज को, यह मस्तक चूमकर आशीष देना, अखरने लगता है। वन्दनवार माथे चूम-चूमकर टूट जाती हैं और समाज इस जर्जर शुभकामना को छोड़कर स्वयं को सुरक्षित करने में व्यस्त हो जाता है।
आपातकाल व्यतीत करने के बाद, जब तक समाज लौटता है, तब तक उसके मंगल की कामना करते-करते वन्दनवार प्राण त्याग चुकी होती है।
समाज सामान्य होने लगता है और वन्दनवारों की नई पीढियाँ उनके द्वार-देहरियों को आशीष देने के लिए इस्तेमाल होने लगती हैं। इसी प्रक्रिया में कुछ वन्दनवारों के वंश समाप्त हो गए। कठपुतली, नौटंकी, तमाशा, क़व्वाली, नट और न जाने कितने वंश लुप्तप्रायः हैं।
सुना है, ‘सब कुछ सामान्य होने के बाद’ समाज इन वंशों के अवशेषों को महंगे दाम पर बेचता है। सुना है, कला की क़ीमत तब बढ़ती है, जब वह मर जाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
लॉकडाउन की घोषणा हुई तो कोरोना का नाम पूरे वातावरण में मंत्र की तरह गूंजने लगा। कोरोना के प्रति जिज्ञासा पहले रोमांच बनी, फिर भय, फिर निराशा और अंततः उदासी बनकर मन से माहौल तक बिछ गई।
समाचार चैनल कोरोना का रोना लिए बैठे रहे। सोशल मीडिया अनवरत कोरोना से सम्बद्ध सूचनाएँ, सावधानियाँ, जानकारियाँ और अफ़वाहें उपलब्ध कराकर इस उदासी को और अधिक वीरान करने लगा। मुझ जैसे लोग फेसबुक लाइव और अन्य माध्यमों से इस अचानक आए ठहराव को झुठलाने के विफल प्रयास करते दिखे।
चैनल बदल-बदलकर अँगूठा दुखने लगा, मोबाइल की स्क्रीन उंगली की बार-बार छुअन से खुरदरी लगने लगी, लेकिन मन के बहलाने का कोई मार्ग न सूझा। आँखें बंद करता था, तो कोरोना कानों के माध्यम से भीतर के वीराने को सन्न करता रहा, तभी मुझे अज्ञेय याद आए- ‘किसी इमारत में खड़े होकर उस इमारत का चित्र नहीं बनाया जा सकता’! मैंने कोरोना की चर्चा से स्वयं को विलग करने का निर्णय लिया और अधूरे पड़े कार्यों को लेकर बैठ गया।
पहला प्रोजेक्ट जो सामने आया वह था कवि-सम्मेलनों के पुराने वीडियो जनता तक पहुँचाना! इस कार्य में मैं पिछले चार वर्ष से संलग्न हूँ। कवि-सम्मेलनों से सम्बद्ध पुरानी धरोहर, पुराने कवियों के चित्र, उनकी दुर्लभ कविताएँ, पुराने कवि सम्मेलनों के निमंत्रण पत्र, विज्ञापन, चिट्ठियाँ, ऑडियो, वीडियो, अख़बार की कतरनें और अन्य ढेर सारी सामग्री संकलित करता रहता हूँ।
जब इस अभूतपूर्व निठल्लेपन और बोरियत के संयोग में इस ख़ज़ाने को टटोला तो इसमें तीन-चार दशक पुराने वीडियो बरामद हुए। इन वीडियो क्लिप्स को वीडियो कैसेट्स से कंप्यूटर की हार्ड डिस्क तक लाने की यात्रा बड़ी रोमांचक रही। किसी कैसेट में धूल भर गई थी, तो किसी की रील नमी से चिपक गई थी। जिन कवि सम्मेलनों के भाग्य में कैसेट की जगह सीडी में क़ैद होना लिखा था, उनके संग्रहकर्ताओं ने उनकी सीडी पर सन 1998 में जो रबड़ बैंड लगाया था उसे सन 2018-19 तक उतारकर भी नहीं देखा। थक-हारकर रबड़ बैंड को सीडी से प्यार करना पड़ा और वह उसके लैंस से चिपक गया। प्रेम में संलग्न उस सीडी और रबड़ के युगल को अलग करना ख़तरे से ख़ाली नहीं था। वाल्मीकि का शाप मिलना तो निश्चित था ही, सीडी ख़राब होने का भी भय था। फिर मैंने एक रिस्क लिया। सीडी तो वैसे भी ख़राब ही थी, सो कोशिश करने में कोई ख़ास हानि नहीं थी; और वाल्मीकि जी को यह कहकर समझा लिया कि अगर इन्हें अलग नहीं किया तो इसमें बंद तुलसी के वंशजों को कैसे मुक्त किया जाएगा! बात फिट बैठी। हेयर ड्रायर की ऊष्मा मिली तो सीडी पर चिपका रबड़ बैंड पिघल गया और सीडी का साथ मरते दम तक न छोड़ने की ज़िद छोड़ दी। लेकिन रसरी आवत जात ते सीडी के लैंस पर जो निशान पड़े थे, उनसे सारा डाटा लॉस होने का पूरा योग बन रहा था। फिर भी लैंस को मुलायम कपड़े से यथासंभव साफ करके प्लेयर में डाला, सीडी एक निश्चित स्थान पर जाकर रुकने लगी। फिर तकनीक को धोखा देते हुए, पॉज और प्ले का धैर्यपूर्वक प्रयोग करते हुए मैं वह सामग्री सहेजने में सफल हो गया।
ऐसे तमाम वाक़यात घटित हुए और मैं थोड़ी निराशा और थोड़ी प्रसन्नता के साथ अधिकतम सामग्री सहेजने में सफल रहा। ‘जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया’ के सिद्धांत पर ‘काफ़ी’ डाटा जुटा लिया और ‘कुछ’ गँवा भी दिया।
मुड़ी-तुड़ी फोटोग्राफ्स जिन पर इस बात के प्रमाण भी मौजूद थे कि पहले लोगों को फ़ोटो एलबम देखते हुए दाल खाना और चाय पीना बहुत पसंद था; उनको स्कैन करके, उन पर पड़े लापरवाही के पदचिन्हों को फोटोशॉप में यथासंभव साफ करते हुए इस बात का पूरा ध्यान रखा कि एक भी चित्र की मूल भावना और सहजता प्रभावित न होने पाए। जब भी कुछ सहेजा तो ‘हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के’ वाला अनुभव हुआ।
जब इस पिटारे को खोला तो माउस के हर क्लिक पर मन एक सौंधी महक से भर गया। ऐसा लगा जैसे रसोईघर में पुराने बासमती का पुलाव बन रहा हो। इसलिए मैंने तुरंत एक वीडियो सीरीज़ प्रसारित करने का निर्णय लिया और उसका शीर्षक रखा ‘पुराने चावल’!
पिछले पाँच दिन से रोज़ सुबह 8 बजे नहा-धोकर कम्प्यूटर के सामने बैठता हूँ और उस धरोहर को व्यवस्थित करने में जुट जाता हूँ। दिन कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता। भारत भूषण जी, रमानाथ अवस्थी जी, किशन सरोज जी, ओमप्रकाश आदित्य जी, गोपालदास नीरज जी, आत्मप्रकाश शुक्ल जी, संतोष आनन्द जी, देवराज दिनेश जी, देवल आशीष जी, सत्यपाल सक्सेना जी, माणिक वर्मा जी, उदयप्रताप जी, राधेश्याम प्रगल्भ जी, निर्भय हाथरसी जी, शैल चतुर्वेदी जी, श्याम ज्वालामुखी जी और न जाने कितने पुरखों की जवानी के काव्यपाठ सुनता रहता हूँ और एडिट करके प्रसारणीय बनाता रहता हूँ।
आज दिन में संतोष आनन्द जी से उनके एक गीत के विषय में पूछा तो पता चला कि उन्हें याद ही नहीं कि उन्होंने ऐसा कोई गीत लिखा है। मैं आश्चर्य में पड़ गया। मैं संतोष जी को मंच से जो गीत पढ़कर जमते हुए देख रहा था, वह उन्हें स्वयं को याद नहीं है। मुझे संतोष हुआ कि इस कार्य में मैं वीडियो ही नहीं अनेक कविताएँ भी सहेज पाऊंगा।
उदयप्रताप जी को मैंने आत्मप्रकाश शुक्ल जी के एक छंद के किसी शब्द की पुष्टि के लिए फोन किया तो उन्होंने बाकायदा समय लेकर उस शब्द को रिकॉल किया और उसके प्रयोजन के साथ मुझे बताया। इस प्रक्रिया में उन्हें लगभग एक घंटा मत्था-पच्ची करनी पड़ी। साथ ही उन्होंने कितने ही कवियों के संस्मरण सुनाए। मैं अभिभूत हो गया कि कविता के एक शब्द के लिये भी इस आयु में उन्होंने पूरी ऊर्जा लगा दी।
इस सीरीज को एडिट करते समय मुझे हर पल काफी कुछ सीखने को मिल रहा है। ऐसा लग रहा है कि पुरखों के मंदिर में तीर्थ करने निकला हूँ। और यह भी पता चल रहा है कि हमारे बड़े कवि इतने बड़े क्यों हैं!
कवि-सम्मेलनीय धरोहर की यह सबसे बड़ी श्रृंखला पिछले पाँच दिन से जारी है। ईश्वर ने चाहा तो अब तक का सारा संकलन व्यवस्थित करके ही दम लूंगा। यह सीरीज़ फेसबुक पेज कविग्राम पर भी प्रसारित हो रही है और कविग्राम के यूट्यूब चैनल पर भी उपलब्ध है।
आपके पास भी यदि ऐसी कोई विरासत हो तो मुझे उपलब्ध कराएँ। मैं और मेरा कुनबा आपका आभारी रहेगा! यदि इस श्रृंखला की प्रत्येक गतिविधि की सूचना प्राप्त करना चाहें तो मुझे इनबॉक्स में अपना व्हाट्सएप नंबर उपलब्ध कराएँ। मैं आश्वस्त करता हूँ कि इस श्रृंखला से जुड़ी प्रत्येक सूचना आपको मिलती रहेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय सिनेमा की बुनियाद में जो नगीने जड़े हुए हैं, उनमें कवि प्रदीप भी एक हैं। जिन दिनों स्वाधीनता संग्राम चरम पर था, तब भारतीय सिनेमा भी राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। जनता में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भरने के लिए सिनेमा ब्रिटिश हुक़ूमत के खि़लाफ़ मुखर हो उठा।
सन 1940 में बंधन फ़िल्म के लिए कवि प्रदीप ने हिम्मत से भरी चेतावनी को गीत में पिरो दिया। गीत के बोल थे, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है’! यही भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मूल स्वर भी था। अपनी क़लम के इस तेवर से जब वे ब्रितानिया हुकूमत की आँखों में खटकने लगे तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें भूमिगत रहना पड़ा।
प्रदीप जी की लेखनी आमूल-चूल राष्ट्रबोध से सुसज्जित थी। युवाओं में जोश भरने के लिए ‘चल-चल रे नौजवान’ भी लिखा और बच्चों को भारत का दर्शन कराने के लिए ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की’ भी लिखा; गांधीहत्या से आहत होकर ‘दे दी हमें आज़ादी’ भी लिखा और गिरते हुए मानवीय मूल्यों से त्रस्त होकर ‘आज के इस इंसान को ये क्या हो गया’ भी लिखा; आज़ादी की क़ीमत ज़ाहिर करने के लिए ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ भी रचा और भारत-चीन युद्ध के शहीदों को नमन करते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ भी लिखा। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसा उत्साहवर्धक गीत भी प्रदीप जी की ही लेखनी का वरदान था और ‘सैंया प्यारा है अपना मिलन’ सरीखा प्रेमगीत भी उसी लेखनी का क़माल है।
कवि प्रदीप ने फिल्मों में कुछ गीत गाए भी हैं- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’; ‘पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’ और ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ’ जैसे गीत उनके कण्ठ से सँवर उठे हैं।
जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में चीन युद्ध के शहीदों की याद में कार्यक्रम आयोजित हुआ, तब लता जी ने एक गीत प्रस्तुत किया- ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आँख में भर लो पानी’; भावुक माहौल में वह गीत लोगों के दिल को छू गया। प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की आँखें छलछला आईं। पण्डित जी ने अधिकारियों से कहा कि इस गीत के रचनाकार को बुलाओ। अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया। इतना सुनते ही पंडित जी नाराज़ हो गए, और अधिकारियों को डाँटते हुए बोले- ”कवि की कविता इस्तेमाल करते हो और कवि को निमंत्रण भी नहीं भेजते।“
सुनते हैं कि नेहरू जी पहली फ़ुरसत में ही मुंबई जाकर कवि प्रदीप से मिले, उस गीत की रचना के लिए उन्हें बधाई दी और अधिकारियों की लापरवाही के लिए क्षमा मांगी। समंदर के किनारे बैठकर माचिस की डिब्बी पर लिखा गया विचार एक अमर गीत में कैसे तब्दील हुआ यह कहानी कवि प्रदीप ने लम्हा-लम्हा जी है। भारतीय गीतों के इतिहास में कवि प्रदीप का योगदान नक्षत्रों के चूर्ण से अंकित है।
✍️ चिराग़ जैन