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बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं, आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ, अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में, सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल, तब लगता है एक कवि...

सरस्वती वंदना

हम सरिता सम बन जाएँ कविता-सरगम-ताल-राग के सागर में खो जाएँ सात सुरों के रंगमहल में साधक बनकर घूमंे नयनों से मलहार बहे माँ, दादर पर मन झूमे भोर भैरवी संग बिताएँ, सांझहु दीपक गाएँ हम सरिता सम बन जाएँ हे वीणा की धरिणी, हमको वीणामयी बना दो ज्ञानरूपिणी मेरे मन में ज्ञान की...

जीवन को कुछ यूँ जियो

बात यहीं से हो शुरू, और यहीं हो बन्द जीवन को कुछ यूँ जियो, जैसे दोहा छन्द ✍️ चिराग़ जैन

अहसास

मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है ✍️ चिराग़...

मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है ✍️ चिराग़...
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