Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar
सामान्य जीवन के सुगम रास्ते को छोड़कर कुछ अलग करने का पागलपन मनुष्य को विशेष बनाता है, लेकिन इस विशेष जीवन का चुनाव करने वाले लोग (चाहे जिस भी क्षेत्र में हों) जो क़ीमत चुकाते हैं, उस पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। बनी-बनाई राह छोड़कर अपनी पगडण्डी स्वयं बनानेवाले ये दीवाने अगर विफल हो जाएँ तो समाज इन्हें मूर्ख कहकर छोड़ देता है। लेकिन यदि ये लोग सफल हो जाएँ तो वही समाज इनकी बनाई पगडण्डी पर चलने लगता है।
जोखि़म उठाने की हिम्मत और पगडण्डी बनाने के लिए झाड़-झंखाड़ से जूझने का जज़्बा विफल होनेवाले में भी उतना ही होता है, जितना सफल होनेवाले में होता है। राजनीति, अध्यात्म, साहित्य, कला, उद्योग, खेल और ऐसे प्रत्येक असामान्य क्षेत्र में काम करनेवाले हर व्यक्ति के भीतर एक ‘मनुष्य’ ज़रूर होता है, जो समाज की साधारण आँखों को कभी दिखाई नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जुलाई 2014 की घटना है। कोटेश्वर से कवि-सम्मेलन करके प्रज्ञा विकास और मैं सुबह-सुबह ऋषिकेश के लिये रवाना हुए। सर्दियां ठीक से शुरू नहीं हुई थीं, लेकिन पहाड़ों की अपनी ताज़गी सुबह-सुबह हल्की ठण्ड का अहसास करा रही थी। पहाड़ की घुमावदार सड़क पर हरे पानी की धारा के साथ-साथ बढ़ते हुए हम देवप्रयाग पहुँचे। पतली-पतली गलियों से सीढ़ियाँ उतरते हुए हम घाट की ओर बढ़े। लगभग सत्तर-अस्सी डिग्री के कोण पर खड़ी सड़क थी जिसके दोनों ओर बाज़ार था। पहला पहाड़ पार किया तो हम एक ऐसे पुल पर पहुँच गए जिसके नीचे भागीरथी का अजस्र प्रवाह था। पुल पर से गुज़रते हुए हमने महसूस किया कि किसी के गुज़रने पर पुल हिलता था। पुल को पार करके हम फिर एक पतली सी पहाड़ी गली से गुज़रते हएु घाट तक आ पहुँचे।
जीवन में पहली बार संगम देखा था। मैं एक ऐसे छोर पर खड़ा था, जहाँ धरती समाप्त होती है और आगे जल ही जल दिखायी पड़ता है। यहाँ भागीरथी और अलकनन्दा का मिलन होता है। यहाँ से पानी की यह धारा ‘गंगा’ कहलाने लगती है।
अहा! एक ओर से भागीरथी दौड़ी चली आ रही थी। उसकी चाल किसी उत्साहित षोडशी जैसी उच्छृंखल थी। उसकी आवाज़ को कलकल नहीं, गर्जन ही कहा जा सकता है। सरकारी स्कूल की आधी छुट्टी में बच्चों का जो कलरव होता है वैसा शोर था भागीरथी की चाल में। यह होता तो शोर ही है, लेकिन मन को आनन्दित करता है।
उधर अलकनन्दा ऐसे चली आती थी मानो किसी ने पानी को संन्यास दे दिया हो। नदी में न कोई लहर, न शोर। पूरी नदी मोटे काँच की किसी प्लेट की तरह गहरे हरे रंग की पारदर्शिता लिए ठहरी-सी जान पड़ती थी। एक ओर बचपन की सी ऊर्जा और षोडशी की चुहल थी तो दूसरी ओर गहन संन्यास की सी शांति।
मेरे दाहिने कान में भागीरथी का रोर था और बाएँ कान में अलकनन्दा का मौन। मेरी आँखों में भागीरथी की उच्छृंखल धारा थी और मन में अलकनन्दा का गाम्भीर्य। दाईं ओर देखता था तो ऐसा लगता था, ज्यों किसी को वधस्थल की ओर ले जाया जा रहा हो और दाईं ओर देखता था तो लगता था कि कोई गहरी समाधि में उतरा हुआ ठहर गया हो। एक ओर जीवन का कलरव था और दूसरी ओर मरघट की शांति।
मैं इन दोनों विरोधाभासी धाराओं के मध्य निर्लिप्त-सा खड़ा था। घाट पर बजरंग बली का ग्रामीण सादगी के सौंदर्य से परिपूर्ण मंदिर था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर मैं देर तक दो विलग प्रवृत्तियों को एकाकार होकर ‘जाह्नवी’ बनते देखता रहा।
भागीरथी और अलकनन्दा अपने-अपने स्वभाव की उत्कर्ष अवस्था में विद्यमान थीं। एक पत्थरों से टकराती हुई, भीषण शोर करते हुए, हिरन चौकड़ी भरती हुई दौड़ी चली आ रही थी। और एक इतनी शांत कि हवा भी उसके स्तब्ध-आभासी दर्पण को स्पर्श करने से संकोच कर रही थी। पटल पर एक भी सिलवट नहीं, लेकिन गतिमान थी। यूँ लगता था कि सर्वस्व प्राप्ति के बाद कोई योगिनी भंगिमा पर पूर्णता का सिंगार किये चली आ रही है।
उस दिन एहसास हुआ कि पूर्ण होने के लिए शून्य होना अनिवार्य है। जब चेहरे की समस्त भंगिमाएँ गौण हो जाती हैं तब मुखड़े पर पूर्णता की आभा दमकती है। इस आभा में कहीं कोई रंग नहीं होता, लेकिन फिर भी इसका सम्मोहन सबको आकृष्ट कर लेता है। आम्रपाली का समस्त सिंगार तथागत की इस एक झलक के सम्मुख मिथ्या सिद्ध हो जाता है।
नवम्बर की मीठी ठण्ड में मैं वसुधा, अलकनन्दा और भागीरथी के बीच खड़ा था। पाँव वसुधा पर थे, विचार भागीरथी से होड़ कर रहे थे और मन अलकनन्दा हुआ जाता था। श्वास में घुलकर यह दृश्य स्मृति पर अंकित हो रहा था।
कलकल करती नदी की पवित्र धारा को शहरों से गुज़रते हुए देखने का अनुभव स्मृति में कौंधा और फिर इसकी मीठी यात्रा के खारे समापन का विचार मन को बेचैन कर गया। यकायक मन नदी के साथ बहकर सागर तक की यात्रा कर आया। किसी सुन्दर जीवन के खारे अन्त की इस यात्रा ने वहीं एक गीत की देह धारण की। इस क्षण में एक पूरा जीवन जी लिया था मैंने। मैंने कलरव और शांति को एकाकार होते देख लिया था। मैंने देखा कि मौन जब शोर में समर्पित हो जाता है तो शोर का शोर कम हो जाता है। मैंने देखा कि स्वयं को खोकर भी अलकनन्दा में कोई सिलवट नहीं थी। मैंने देख लिया था कि सिलवटें विलीन होते ही यात्रा पूर्ण हो जाती है।
मैं भागीरथी की तरह किलकता हुआ देवप्रयाग पहुँचा था और अलकनन्दा की तरह गहरा मौन लिए लौट रहा था।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
शायरी का एक जज़्बा आज ख़ामोश हो गया है। हिंदी कवि-सम्मेलन को उर्दू मुशायरों से जो चंद तोहफ़े अता हुए, उनमें से एक आज रुख़सत हो गया। कितने ही खट्टे-मीठे वाक़यात आँखों के सामने तैर रहे हैं। मंच पर उनका जलवा सबने देखा है, लेकिन मंच के इतर जो उनका हास्यबोध था, जो उनकी बेबाक़ी थी उससे सिर्फ़ उनके सहकर्मी ही वाक़िफ़ हैं।
हमने शायरी के इस सितारे को बहुत क़रीब से देखा है। उनका अक्खड़पन, उनकी शरारतें और उनका बेलौस लहजा उनके क़िरदार पर ख़ूब फबता था। जब कभी मंच पर उन्हें महसूस होता था कि उन्हें ढंग से नहीं सुना जा रहा है तो वे अपनी अदा से डाँट-डपटकर पूरी कोशिश करते थे, लेकिन जैसे ही उन्हें यह आश्वस्ति हो जाती थी कि यहाँ कोशिश करना बेकार है, तो वे बेहद ख़ूबसूरती से अपनी पारी अचानक समाप्त करके बैठ जाते थे।
उनकी इसी आदत से अनुमान लगा रहा हूँ कि ज़िन्दगी के इस मुशायरे में उन्होंने मौत की हूटिंग को काबू करने की भरपूर कोशिश की होगी लेकिन जब तमाम कोशिशें बेकार होती दिखी होंगी, जब उनका दिल टूट गया होगा तो पूरी शानो-शौक़त के साथ मौत के गले में बाँहें डालकर चलते बने।
…मैं उनकी इस बेईमानी का कभी समर्थक नहीं रहा लेकिन इस बेईमानी की अदा इतनी ख़ूबसूरत होती थी कि मन ही मन अच्छी भी लगती थी। पर आज, मुआफ़ करना राहत भाई! …आज ये बेईमानी अच्छी नहीं लगी।
जब अस्पताल में भरती होने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर मैसेज पोस्ट किया तो उनके तेवर उसी जिंदादिल शाइर के तेवर थे, जिसका बेलौस लहजा लोगों को आसानी से हजम नहीं होता था। उनकी शायरी कितने ही लोगों के दिल की धड़कन रही, लेकिन आज वे अपनी ही धड़कन को कोई शेर सुनाकर वापिस न ला सके।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बात 2011 की है। उन दिनों मैं जम्मू में नौकरी करता था। पहली बार अपने घर से दूर, अकेला रह रहा था। सत्वारी के लक्ष्मी निवास में पेइंग गेस्ट की तरह रहता था। बिना बतियाए न रह पाने की आदत के कारण सप्ताहांत काटना पहाड़ जैसा लगता था।
उस घर का आंगन बहुत बड़ा था। यह आंगन मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अकेलेपन का अभिशाप झेलने को विवश; मैंने आंगन की फुलवारी से दोस्ती कर ली।
जम्मू की भूमि बहुत उर्वरा है। लीची, आम, अंगूर, अमरूद, नारंगी, नाशपाती और अखरोट के पेड़ लगभग हर आंगन का हिस्सा हैं। मैंने लक्ष्मी निवास के आंगन की फुलवारी से बतियाना शुरू किया। तरह-तरह के पॉम, गोल्डन डुरंटा की हैज, वॉल स्टिक और तमाम पौधों के साथ समय बीतने लगा। ख़ूब चित्र खींचता अपने इन दोस्तों के।
एक दिन बरसात की बूंदें, आंगन की फुलवारी के साथ खेलने आईं। मैं भी कैमरा लेकर इस उत्सव को सहेजने लगा। उस दिन पहली बार, मैंने आनन्द को बरसते हुए देखा। उस दिन पहली बार, मैंने पोर-पोर तृप्त होने का अर्थ समझा। उस दिन पहली बार,मुझे आभास हुआ कि प्यास बुझने का सुख कैसा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
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6 मार्च। आज एवरेस्ट को क़रीब से देखा। बादलों के बीच घिरा श्वेत हिमालय, उस पर सोने सी पिघलती सूरज की रौशनी, नीले चोगे में लिपटे आकाश पर सफेद बादलों की बूंदी का प्रिंट। साथ में अपने भौगौलिक ज्ञान से परिपूर्ण महेंद्र अजनबी जी, जीवन के प्रति बेहद दार्शनिक सकारात्मक दृष्टिकोण से युक्त आशकरण अटल जी और प्रकृति के प्रत्येक बिम्ब में गीत की मूल पीड़ा तलाश लेने वाली डॉ सीता सागर। छोटे से देश नेपाल में जीवन की सबसे अनुभवसिक्त यात्रा भोग रहा हूँ। कवि-सम्मेलनों का धन्यवाद!
9 मार्च। नेपाल के तीन शहरों में हिंदी कविता का महोत्सव हुआ। एकल विद्यालय के संपर्क अभियान के उपलक्ष्य में आयोजित इन कवि-सम्मेलनों के आयोजन में जिन लोगों को कार्यकर्ता बनकर व्यवस्था करते देखा उनमें एस्सल समूह के उपाध्यक्ष श्री लक्ष्मीनारायण गोयल, जिंदल इंडस्ट्रीज़ के चेयरमेन श्री सुरेन्द्र कुमार जिंदल, श्री बिट्ठल माहेश्वरी, श्री महावीर घिराइया, श्री अशोक बैद, श्री गणेश खेतान, श्री अशोक सर्राफ, श्री विनोद पोद्दार, श्री शिव गोयल और श्री ओमप्रकाश लोहिया जैसे लक्ष्मीपुत्र सम्मिलित थे। जो लोग गलीचों से नीचे क़दम नहीं रखते उन्हें बीरगंज के जीतपुर गाँव की कीचड़ भरी गलियों में नंगे पाँव चलते देखा। जिनसे मिलने के लिए लोगों को अपॉइंटमेंट लेना पड़ता है उन्हें गाँव की कच्ची मढ़ैया में बैठकर लोगों से बिनती करते देखा कि वे अपने बच्चों को पढ़ने दें। जिनके पास करोड़ों के बिज़निस प्रोपोज़ल लिए लोगों की लाइन लगी रहती है उनको भरे सभागार में हैंड्स माइक लेकर लोगों से डोनेशन मांगते देखा।
‘जो विद्यालय नहीं जा सकते, उनके पास विद्यालय को ले जाना होगा’ -इस पुनीत उद्देश्य से कार्यरत एकल विद्यालय के इन कार्यक्रमों में पहली बार देखा कि भामाशाह स्वयं महाराणा प्रताप की तलाश में दर-दर भटक रहा है।
क्रमशः काठमांडू, बिराटनगर और बीरगंज में हज़ारों लोग इन कार्यक्रमों में सम्मिलित हुए। कविता के रस भी छलके, ठहाकों का महोत्सव भी हुआ और एकल विद्यालय के पुनीत कार्य के लिए हजारों लोगों को एकसूत्र में बंधते भी देखा।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
डॉ अनुज त्यागी पेशे से प्राध्यापक हैं किंतु सत्संगति के साथ ही कुसंग भी प्रभावित करता है, सो आगरे के कवियों के साथ रहकर कवि सम्मेलनों का शौक़ पड़ गया और रमेश मुस्कान के साथ रहकर पूरी कविता का कंटेंट वन-लाइनर में निपटा देने की लत लग गई। इस लत ने ‘फन्नी ढाबा’ खुलवा दिया और निरंतर व्यंग्य पकने लगे। ‘फन्नी ढाबा’ प्रसिद्ध होता गया और डॉ अनुज त्यागी के कटाक्ष तीखे होते गए। ‘फन्नी ढाबा’ की इसी लोकप्रियता से प्रभावित होकर डॉ अनुज त्यागी ने होली के अवसर पर ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ करवाने का निर्णय लिया है। आगरे के काव्य प्रेमियों के लिए बहुत मेहनत करके डॉ त्यागी ने एक मंच और निर्मित कर दिया है।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपनी ग़लत टाइमिंग की वजह से इस ढाबे के फन्नी व्यंजनों का स्वाद चखने से चूक गए हैं। इससे वे ख़ासे निराश भी हैं। कांग्रेस के उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी ने फोन करके डॉ अनुज त्यागी को शुभकामनाएँ दीं और कहा कि अगर उनके भाग्य में हँसी लिखी होती तो वे कवि सम्मेलन सुनने ज़रूर आते। उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने बताया कि होली खेलने के लिए चुराई हुई टोंटियों की फिटिंग करवा रहा हूँ, अगर शाम तक प्लम्बर ने काम पूरा कर दिया तो वे ज़रूर आएंगे। दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल जी ने बताया कि दिल्ली में होली पर बढ़नेवाली पानी की मांग को देखते हुए वे अपने बासठ विधायकों के साथ जमुना से मटकियाँ भर-भर कर स्टोर कर रहे हैं, ताकि जनता को फ्री पानी की कमी न पड़े। दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्री मनोज तिवारी ने यह कहकर असमर्थता जताई कि वे कवियों से पंगा लेकर पहले ही बहुत दुःखी हैं। हाईकमान ने उन्हें कवियों से दूर रहने का आदेश दिया है।
सबसे दुःखी होकर डॉ अनुज त्यागी ने आगरा की जनता को आमंत्रण दिया और सभी राजनैतिक स्वार्थों से दूर रहनेवाला आम आदमी ख़ुशी-ख़ुशी आज शाम ‘फन्नी ढाबा कवि सम्मेलन’ में ठहाकों के पकवान खाने पहुँच रहा है।
✍️ चिराग़ जैन