Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
बंगाल चुनाव की हलचल के बीच ‘लपेटे में नेताजी’ की शूटिंग के लिये कोलकाता जाना तय हो गया। कार्यक्रम के प्रोड्यूसर आशीष पाण्डे ने पिछली बार हुगली नदी में स्टीमर पर शो शूट करने का प्रयोग किया था, जिसकी काफी प्रशंसा हुई। उसी से प्रभावित होकर इस बार भी उसी प्रारूप में शो शूट होना था। 1 अप्रेल को कार्यक्रम की रूपरेखा बनी कि 4 अप्रेल को दो एपिसोड सुबह- सुबह शूट किये जाएंगे और एक एपिसोड शाम को। 3 अप्रेल की दोपहर को दिल्ली से फ्लाइट थी, सो हमारे पास तीन एपिसोड्स की तैयारी करने के लिये कुल 48 घण्टे का समय था।
ऐसी स्थिति पहले भी कई बार हुई है, लेकिन इस बार कठिनाई यह रही कि कोलकाता चुनाव पर ही पहले चार एपिसोड शूट किये जा चुके थे इसलिए चुनावी माहौल की काफी सामग्री हम पिछले शूटिंग शेड्यूल में प्रयोग कर चुके थे। उसी विषय और उसी पात्रों के साथ लगभग वैसे ही घटनाक्रम पर तीन एपिसोड्स तैयार करने थे वो भी केवल 48 घण्टे में।
चारों आमंत्रित कवि अपने अनुभव, निष्ठा तथा क्षमता के बल पर इस चुनौती से जूझ ही लेंगे यह प्रोडक्शन को विश्वास था, और अंततः यह विश्वास बना रह सका। लेकिन यह यात्रा बेहद रोमांचक रही। दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचा तो सुदीप भोला जबलपुर से आकर सुबह से प्रतीक्षारत थे। उन्होंने बताया कि कोरोना की नयी लहर के चलते दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरते ही उनका कोविड टेस्ट किया गया है। हवाई अड्डे पर भी लोगों के चेहरे पर कोरोना का भय और व्यवहार में सावधानी देखकर लगा कि जनता इस वायरस के दूसरे आघात से जूझने के लिये तैयार है।
शाम 6 बजकर 30 मिनिट पर कोलकाता में लैंडिंग हुई। हवाई अड्डे की एक दर्जन कन्वेयर बेल्ट्स में से जिस पर हमारा लगेज आना था, वह अचानक चलते-चलते बन्द हो गयी। लगभग 40-45 मिनिट का समय इस अनचाही परिस्थिति ने नष्ट किया, वह भी उस समय जब हम चारों में से कुछ कवियों को होटल पहुँच कर सुबह 5 बजे शूट होनेवाले 2 एपिसोड्स के लिये कविताएँ पूरी करनी थीं। येन-केन प्रकारेण होटल पहुँचे और जल्दी-जल्दी भोजन की औपचारिकता निभाकर सभी सुबह की तैयारी में जुट गये। लिखना भी ज़रूरी था और स्क्रीन पर फ्रेश दिखने के लिये सोना भी ज़रूरी था। मैं लगभग पूरी तैयारी करके ही घर से निकला था, इसलिए तुरन्त सो गया।
रात में अचानक किसी की उबकाइयो की आवाज़ से नींद खुली। तंद्रा की अवस्था से बाहर आया तो ज्ञात हुआ कि सुदीप भोला कई बार उल्टी कर चुके हैं और बुखार जैसा महसूस कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से पहला संदेह कोविड का ही हुआ। सुबह तक सुदीप परेशान रहे और सुबह तक स्थिति यह हो गयी कि उनका चेहरा शिथिल हो गया।
पाँच बजे शूटिंग के लिये जाना था, लेकिन मैं और कार्यक्रम के संपादक अमृत आनंद जी मुँह अंधेरे ही सुदीप को निकटतम नर्सिंग होम में ले गये। आवश्यक जाँच तथा आवश्यक उपचार देकर एक डेढ़ घण्टे में हम सुदीप को वापिस होटल ले आये। कार्यक्रम सुदीप के बिना करने का निर्णय लिया जा चुका था, लेकिन जब तक मैं नहा-धोकर लौटा तब तक सुदीप शूटिंग पर चलने का मन बना चुके थे।
बिजली की सी फुर्ती दिखाते हुए सुदीप दस मिनिट में नहा-धोकर सेट पर जाने के लिये तैयार थे। कोलकाता की उमस ने सेट पर पहुँचते ही ऊर्जा शोषित करना प्रारंभ कर दिया। पहला शूट प्रारम्भ होते-होते सात-सवा सात का समय हो गया था। उमस का प्रकोप हुगली में तैरते स्टीमर पर भी कम न हो सका। निस्पंद वातावरण में क्षण-क्षण और उग्र होते सूर्य के सम्मुख जैसे-तैसे पहला एपिसोड रिकॉर्ड हो गया। इस मौसम ने सुदीप की जुटाई गई ऊर्जा में सेंध लगा दी। मैंने पहली बार सुदीप के चेहरे पर पीड़ा देखी। अभी नीचे आकर साँस भी नहीं ले सके थे कि दूसरे एपिसोड की तैयारी हो गयी। सुदीप इस बार भी हमारे साथ रहे। सूरज और प्रचंड हो गया था। उमस और प्रबल हो गयी थी। लेकिन शो मस्ट गो ऑन का पालन करते हुए हम शूटिंग करते रहे। डेढ़ घंटे की इस शूटिंग ने हम सभी को ऊर्जाहीन कर दिया। स्थिति यह हुई कि होटल पहुँचते-पहुँचते मेरे शरीर ने हिम्मत छोड़ दी और मैं शिकंजी इत्यादि का सेवन करके बिस्तर पर लंबलोट हो गया। जब उठा तो पता चला कि सुदीप दोबारा अस्पताल गए थे, लेकिन डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह देकर कुछ विटामिन इत्यादि की टेबलेट्स दे दीं। जब मैं उठा तब तक सुदीप सो चुके थे। दवाई उनके सिरहाने रखी थी, लेकिन उन्होंने खाई नहीं थी।
मन घबरा रहा था, सुदीप को कई बार उठाने का प्रयास किया, लेकिन वे हुंकारा भरकर ऐसे सो जाते, ज्यों कोई भयंकर नशे में सो रहा हो। उमस से थके हुए शरीर को वातानुकूलित कमरे में सुला दिया जाए तो उस पर ऐसा ही नशा चढ़ता है, इसका अनुभव मैं पहले भी कोलकाता शहर में कर चुका हूँ, इसलिए सुदीप की नींद से मैं चिंतित नहीं था, लेकिन उनके बिना खाये-पिये रहने से परेशान ज़रूर था।
बहरहाल, शाम के शूट का समय हो गया। इस बार सुदीप को शूट पर नहीं जाना था, यह सुनिश्चित कर दिया गया। सुदीप निद्रा से तंद्रा की अवस्था में आ गए थे लेकिन शो तीन ही कवियों के साथ होना था, सो सुदीप के लिये खिचड़ी ऑर्डर करके हम होटल से निकल गए। सेट पर पहुँचे तो सुबह जैसी उमस का स्थान शाम की मोहक हवा ने ले लिया था। पूरा जहाज रौशनी से जगमगा रहा था। टीएमसी, भाजपा और सीपीआई के नेतागण आ चुके थे, श्रोताओं की उपस्थिति हो चुकी थी और कवियों और एंकर ने मेकअप भी ले लिया था। उसी वक़्त अचानक मंद समीर ने झंझावात का रूप ले लिया। हुगली की लहरों में जैसे कोई भूकंप आया गया हो। आसमान को चीरती बिजली कड़कने लगी और हवा ने जहाज पर लगे सेट को तहस-नहस करना शुरू कर दिया। आनन-फानन में कैमरे और लाइट्स छत से उतारकर नीचे लाई गईं। यूनिट के लोगों ने भाग-भागकर कुर्सियाँ इत्यादि उड़ने से बचाई। सारा तामझाम यूनिट एक छोटे से कमरे में समा गए। ऑडिएंस और लीडर, नदी किनारे किसी सुरक्षित स्थान पर तूफान के रुकने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
यकायक तेज़ बारिश शुरू हो गयी। स्पष्ट हो गया कि अब शो नहीं हो सकेगा। अब सब बारिश रुकने का इंतज़ार केवल इसलिए कर रहे थे कि अपने-अपने घर जा सकें। सारी मेहनत पर पानी फिर गया था लेकिन यूनिट और हमारे माहौल तनाव या क्षोभ के स्थान पर इस आकस्मिक स्थिति का हंसी-ठट्ठा चल रहा था। बारिश हल्की हो रही थी और मौसम खुशनुमा हो चला था। अचानक आशीष पांडे लाइट्स टेक्नीशियन से बोले- ‘दोबारा सेटअप लगाने में कितना समय लगेगा?’ आशीष जी के इस सवाल ने संकेत दे दिया कि शूटिंग रद्द नहीं होगी। जिस फुर्ती से सेट समेटा गया था, उससे दोगुनी ऊर्जा के साथ सेट दोबारा तैयार किया गया। एक-डेढ़ घंटे में दोबारा रौशनी नाचने लगी। जहाज फिर से जगमगा उठा। देर से ही सही, लेकिन शूटिंग शुरू हुई। शानदार एपिसोड शूट हुआ।
ऐसा लगा कि सुबह प्रकृति ने जो ऊर्जा सोख ली थी, वह दस गुनी करके हम पर बरसा दी। ऊर्जा से भरे हुए होटल लौटे तो देखा सुदीप के चेहरे पर भी कुछ रंगत लौटने लगी थी। रात के भोजन के नाम पर नाममात्र का कुछ खाकर सब सो गए। सुबह 7 बजे एयरपोर्ट के लिए निकलना था।
दिल्ली हवाई अड्डे पर सुदीप का जो कोविड टेस्ट हुआ था, उसकी रिपोर्ट अभी तक भी नहीं आई है। एयरपोर्ट ले जाने के लिए जो टैक्सी आई, उसका टायर पंक्चर हो गया। एयरपोर्ट पहुँचे तो ज्ञात हुआ कि जिस जहाज से जाना है, उसमें तकनीकी ख़राबी आ गयी। 10 बजे उड़नेवाली फ्लाइट ने 1 बजे उड़ान भरी और इस पंक्ति के लिखते-लिखते दिल्ली हवाई अड्डे पर टच-डाउन हो गया है। शानदार लेंडिंग हुई।
सुदीप कल सुबह की फ्लाइट से जबलपुर चले जाएंगे। और मैं अभी घर पहुँचते ही कुंडली बाँचूंगा कि किस मुहूर्त में घर से निकले थे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar
सामान्य जीवन के सुगम रास्ते को छोड़कर कुछ अलग करने का पागलपन मनुष्य को विशेष बनाता है, लेकिन इस विशेष जीवन का चुनाव करने वाले लोग (चाहे जिस भी क्षेत्र में हों) जो क़ीमत चुकाते हैं, उस पर कभी किसी का ध्यान नहीं जाता। बनी-बनाई राह छोड़कर अपनी पगडण्डी स्वयं बनानेवाले ये दीवाने अगर विफल हो जाएँ तो समाज इन्हें मूर्ख कहकर छोड़ देता है। लेकिन यदि ये लोग सफल हो जाएँ तो वही समाज इनकी बनाई पगडण्डी पर चलने लगता है।
जोखि़म उठाने की हिम्मत और पगडण्डी बनाने के लिए झाड़-झंखाड़ से जूझने का जज़्बा विफल होनेवाले में भी उतना ही होता है, जितना सफल होनेवाले में होता है। राजनीति, अध्यात्म, साहित्य, कला, उद्योग, खेल और ऐसे प्रत्येक असामान्य क्षेत्र में काम करनेवाले हर व्यक्ति के भीतर एक ‘मनुष्य’ ज़रूर होता है, जो समाज की साधारण आँखों को कभी दिखाई नहीं देता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
जुलाई 2014 की घटना है। कोटेश्वर से कवि-सम्मेलन करके प्रज्ञा विकास और मैं सुबह-सुबह ऋषिकेश के लिये रवाना हुए। सर्दियां ठीक से शुरू नहीं हुई थीं, लेकिन पहाड़ों की अपनी ताज़गी सुबह-सुबह हल्की ठण्ड का अहसास करा रही थी। पहाड़ की घुमावदार सड़क पर हरे पानी की धारा के साथ-साथ बढ़ते हुए हम देवप्रयाग पहुँचे। पतली-पतली गलियों से सीढ़ियाँ उतरते हुए हम घाट की ओर बढ़े। लगभग सत्तर-अस्सी डिग्री के कोण पर खड़ी सड़क थी जिसके दोनों ओर बाज़ार था। पहला पहाड़ पार किया तो हम एक ऐसे पुल पर पहुँच गए जिसके नीचे भागीरथी का अजस्र प्रवाह था। पुल पर से गुज़रते हुए हमने महसूस किया कि किसी के गुज़रने पर पुल हिलता था। पुल को पार करके हम फिर एक पतली सी पहाड़ी गली से गुज़रते हएु घाट तक आ पहुँचे।
जीवन में पहली बार संगम देखा था। मैं एक ऐसे छोर पर खड़ा था, जहाँ धरती समाप्त होती है और आगे जल ही जल दिखायी पड़ता है। यहाँ भागीरथी और अलकनन्दा का मिलन होता है। यहाँ से पानी की यह धारा ‘गंगा’ कहलाने लगती है।
अहा! एक ओर से भागीरथी दौड़ी चली आ रही थी। उसकी चाल किसी उत्साहित षोडशी जैसी उच्छृंखल थी। उसकी आवाज़ को कलकल नहीं, गर्जन ही कहा जा सकता है। सरकारी स्कूल की आधी छुट्टी में बच्चों का जो कलरव होता है वैसा शोर था भागीरथी की चाल में। यह होता तो शोर ही है, लेकिन मन को आनन्दित करता है।
उधर अलकनन्दा ऐसे चली आती थी मानो किसी ने पानी को संन्यास दे दिया हो। नदी में न कोई लहर, न शोर। पूरी नदी मोटे काँच की किसी प्लेट की तरह गहरे हरे रंग की पारदर्शिता लिए ठहरी-सी जान पड़ती थी। एक ओर बचपन की सी ऊर्जा और षोडशी की चुहल थी तो दूसरी ओर गहन संन्यास की सी शांति।
मेरे दाहिने कान में भागीरथी का रोर था और बाएँ कान में अलकनन्दा का मौन। मेरी आँखों में भागीरथी की उच्छृंखल धारा थी और मन में अलकनन्दा का गाम्भीर्य। दाईं ओर देखता था तो ऐसा लगता था, ज्यों किसी को वधस्थल की ओर ले जाया जा रहा हो और दाईं ओर देखता था तो लगता था कि कोई गहरी समाधि में उतरा हुआ ठहर गया हो। एक ओर जीवन का कलरव था और दूसरी ओर मरघट की शांति।
मैं इन दोनों विरोधाभासी धाराओं के मध्य निर्लिप्त-सा खड़ा था। घाट पर बजरंग बली का ग्रामीण सादगी के सौंदर्य से परिपूर्ण मंदिर था। मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर मैं देर तक दो विलग प्रवृत्तियों को एकाकार होकर ‘जाह्नवी’ बनते देखता रहा।
भागीरथी और अलकनन्दा अपने-अपने स्वभाव की उत्कर्ष अवस्था में विद्यमान थीं। एक पत्थरों से टकराती हुई, भीषण शोर करते हुए, हिरन चौकड़ी भरती हुई दौड़ी चली आ रही थी। और एक इतनी शांत कि हवा भी उसके स्तब्ध-आभासी दर्पण को स्पर्श करने से संकोच कर रही थी। पटल पर एक भी सिलवट नहीं, लेकिन गतिमान थी। यूँ लगता था कि सर्वस्व प्राप्ति के बाद कोई योगिनी भंगिमा पर पूर्णता का सिंगार किये चली आ रही है।
उस दिन एहसास हुआ कि पूर्ण होने के लिए शून्य होना अनिवार्य है। जब चेहरे की समस्त भंगिमाएँ गौण हो जाती हैं तब मुखड़े पर पूर्णता की आभा दमकती है। इस आभा में कहीं कोई रंग नहीं होता, लेकिन फिर भी इसका सम्मोहन सबको आकृष्ट कर लेता है। आम्रपाली का समस्त सिंगार तथागत की इस एक झलक के सम्मुख मिथ्या सिद्ध हो जाता है।
नवम्बर की मीठी ठण्ड में मैं वसुधा, अलकनन्दा और भागीरथी के बीच खड़ा था। पाँव वसुधा पर थे, विचार भागीरथी से होड़ कर रहे थे और मन अलकनन्दा हुआ जाता था। श्वास में घुलकर यह दृश्य स्मृति पर अंकित हो रहा था।
कलकल करती नदी की पवित्र धारा को शहरों से गुज़रते हुए देखने का अनुभव स्मृति में कौंधा और फिर इसकी मीठी यात्रा के खारे समापन का विचार मन को बेचैन कर गया। यकायक मन नदी के साथ बहकर सागर तक की यात्रा कर आया। किसी सुन्दर जीवन के खारे अन्त की इस यात्रा ने वहीं एक गीत की देह धारण की। इस क्षण में एक पूरा जीवन जी लिया था मैंने। मैंने कलरव और शांति को एकाकार होते देख लिया था। मैंने देखा कि मौन जब शोर में समर्पित हो जाता है तो शोर का शोर कम हो जाता है। मैंने देखा कि स्वयं को खोकर भी अलकनन्दा में कोई सिलवट नहीं थी। मैंने देख लिया था कि सिलवटें विलीन होते ही यात्रा पूर्ण हो जाती है।
मैं भागीरथी की तरह किलकता हुआ देवप्रयाग पहुँचा था और अलकनन्दा की तरह गहरा मौन लिए लौट रहा था।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
शायरी का एक जज़्बा आज ख़ामोश हो गया है। हिंदी कवि-सम्मेलन को उर्दू मुशायरों से जो चंद तोहफ़े अता हुए, उनमें से एक आज रुख़सत हो गया। कितने ही खट्टे-मीठे वाक़यात आँखों के सामने तैर रहे हैं। मंच पर उनका जलवा सबने देखा है, लेकिन मंच के इतर जो उनका हास्यबोध था, जो उनकी बेबाक़ी थी उससे सिर्फ़ उनके सहकर्मी ही वाक़िफ़ हैं।
हमने शायरी के इस सितारे को बहुत क़रीब से देखा है। उनका अक्खड़पन, उनकी शरारतें और उनका बेलौस लहजा उनके क़िरदार पर ख़ूब फबता था। जब कभी मंच पर उन्हें महसूस होता था कि उन्हें ढंग से नहीं सुना जा रहा है तो वे अपनी अदा से डाँट-डपटकर पूरी कोशिश करते थे, लेकिन जैसे ही उन्हें यह आश्वस्ति हो जाती थी कि यहाँ कोशिश करना बेकार है, तो वे बेहद ख़ूबसूरती से अपनी पारी अचानक समाप्त करके बैठ जाते थे।
उनकी इसी आदत से अनुमान लगा रहा हूँ कि ज़िन्दगी के इस मुशायरे में उन्होंने मौत की हूटिंग को काबू करने की भरपूर कोशिश की होगी लेकिन जब तमाम कोशिशें बेकार होती दिखी होंगी, जब उनका दिल टूट गया होगा तो पूरी शानो-शौक़त के साथ मौत के गले में बाँहें डालकर चलते बने।
…मैं उनकी इस बेईमानी का कभी समर्थक नहीं रहा लेकिन इस बेईमानी की अदा इतनी ख़ूबसूरत होती थी कि मन ही मन अच्छी भी लगती थी। पर आज, मुआफ़ करना राहत भाई! …आज ये बेईमानी अच्छी नहीं लगी।
जब अस्पताल में भरती होने के बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर मैसेज पोस्ट किया तो उनके तेवर उसी जिंदादिल शाइर के तेवर थे, जिसका बेलौस लहजा लोगों को आसानी से हजम नहीं होता था। उनकी शायरी कितने ही लोगों के दिल की धड़कन रही, लेकिन आज वे अपनी ही धड़कन को कोई शेर सुनाकर वापिस न ला सके।
✍️ चिराग़ जैन
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बात 2011 की है। उन दिनों मैं जम्मू में नौकरी करता था। पहली बार अपने घर से दूर, अकेला रह रहा था। सत्वारी के लक्ष्मी निवास में पेइंग गेस्ट की तरह रहता था। बिना बतियाए न रह पाने की आदत के कारण सप्ताहांत काटना पहाड़ जैसा लगता था।
उस घर का आंगन बहुत बड़ा था। यह आंगन मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था। अकेलेपन का अभिशाप झेलने को विवश; मैंने आंगन की फुलवारी से दोस्ती कर ली।
जम्मू की भूमि बहुत उर्वरा है। लीची, आम, अंगूर, अमरूद, नारंगी, नाशपाती और अखरोट के पेड़ लगभग हर आंगन का हिस्सा हैं। मैंने लक्ष्मी निवास के आंगन की फुलवारी से बतियाना शुरू किया। तरह-तरह के पॉम, गोल्डन डुरंटा की हैज, वॉल स्टिक और तमाम पौधों के साथ समय बीतने लगा। ख़ूब चित्र खींचता अपने इन दोस्तों के।
एक दिन बरसात की बूंदें, आंगन की फुलवारी के साथ खेलने आईं। मैं भी कैमरा लेकर इस उत्सव को सहेजने लगा। उस दिन पहली बार, मैंने आनन्द को बरसते हुए देखा। उस दिन पहली बार, मैंने पोर-पोर तृप्त होने का अर्थ समझा। उस दिन पहली बार,मुझे आभास हुआ कि प्यास बुझने का सुख कैसा होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
कलाकार नीलकण्ठ होता है। सारी दुनिया का विष पचाकर उसे जीवित रहना होता है। मुस्कुराते ओंठो के कारण जो आँखों का संकुचन होता है उसमें कितने ही आँसू छिपा लिए जाते हैं। हर सफल कलाकार के निजी जीवन में झाँककर, दुनिया उस पर कीचड़ उछालना चाहती है। लेकिन उसके निजी जीवन के घावों पर मरहम रखने कोई नहीं जाता।
लोग अपने-अपने निष्ठुर निर्णय लेकर अभी भी लिख देंगे कि आत्महत्या किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। मैं स्वयं इस बात से सहमत हूँ, लेकिन एक बार, सिर्फ़ एक बार हम अपने समाज को, अपने तंत्र को, अपनी सामाजिकता को और अपनी दुनिया को टटोलकर तो देखें कि किन परिस्थितियों में किसी को मौत ज़िन्दगी से आसान लगने लगती होगी। किन परिस्थितियों में कोई संवेदनशील मन चीख़कर कहता होगा कि – ‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है, तुम ही संभालो ये दुनिया!’
अलविदा दोस्त!
मुझे नहीं पता कि तुमने क्या झेला, मुझे नहीं पता कि तुम सही हो या ग़लत, मुझे यह भी नहीं मालूम कि किस स्थिति में तुमने यह कदम उठा लिया। मैं तो बस इतना जानता हूँ कि तुम्हारी मुस्कुराहट इस बात की गवाही है कि यह क़दम उठाने के लिए तुमने ख़ुद को बहुत मुश्किल से मनाया होगा।
✍️ चिराग़ जैन