Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘व्यू बढ़ाने के लिए कुछ भी करेंगा‘ -यह वाक्य वर्तमान समाज का मूलमंत्र बन गया है। किसी की औक़ात और हैसियत इस बात से मापी जाने लगी है कि उसे कितने लोग फॉलो करते हैं। दुनिया के तमाम काम लाइक, फॉलो, सब्रक्राइब, शेयर और कमेंट जैसे शब्दों तक सीमित हो गए हैं।
आप कितने भी बड़े योगी हों, अगर आपके सोशल मीडिया फॉलोअर्स नहीं हैं, तो आपका योग किसी काम का नहीं। और अगर आपने किसी तरह से सोशल मीडिया पर स्वयं को योगी सिद्ध कर दिया तो फिर योग की कोई सिद्धि हो या न हो, कोई फर्क़ नहीं पड़ता। इसीलिए सफल योगी बनने के लिए योग करने से अधिक आवश्यक है, ट्वीट करना।
आपकी दुकान चले या न चले, फेसबुक चलती रहनी चाहिए। फेसबुक की एक्टिविटी रुक गयी तो दुकान पर ग्राहकों की भीड़ से कोई लाभ नहीं।
आप वाइल्ड लाइफ सफारी पर जाएँ तो पर्यटक बनकर नहीं, फोटोग्राफर बनकर जाएँ। शेर दिखे तो उसे निहारने की बजाय कैमरा निकालकर जिराफ़ बन जाइए। न जाने कौन-सा क्लिक आपको इंस्टा पर फेमस कर देगा।
रील्स देखो तो समझ आता है कि फेमस होने की इस होड़ में न कोई मर्यादा शेष बची है, न ही कोई हिचक। साठ सेकेंड तक दर्शकों को अपनी रील पर रोके रखने के लिए सारी सीमाएं लांघ दी गईं। कूल्हे मटकाकर दर्शकों का मन नहीं बहला तो नंगी पीठ दिखाकर रोक लिया। इससे भी बात नहीं बनी तो भद्दी गालियाँ देकर फेमस होने निकल पड़ी। आजकल स्कर्ट या फ्राक के नीचे के वस्त्र दिखाने तक को नॉर्मल माना जाने लगा है। 30 सेकेंड की इन वीडियो क्लिप को मिलियन और बिलियन व्यू का आँकड़ा दिलाने के लिए युवतियों ने लज्जा को ब्रेन से ब्लॉक कर दिया है।
पुरुष भी इस अपराध में समान उत्तरदायी है। पूरा-पूरा दिन स्क्रॉल करके रील देखनेवाले अंगूठों की रेखाएँ घिसने लगी हैं। मोबाइल की स्क्रीन में क़ैद हो चुकी आँखों में इतनी रौशनी ही नहीं बची है कि हम अपने समाज पर घिर आए अंधेरे को पहचान सकें। जिस युवा पीढ़ी के हाथों में देश की बागडोर होनी थी उसके हाथ टच स्क्रीन मोबाइल की अदृश्य बेड़ियों से बंधे हुए हैं। अफ़ीम के नशे से तो देश बच गया लेकिन मोबाइल के असीम नशे से बचने का कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है।
ट्रेन के आगे लेटने से लेकर अनावश्यक और वीभत्स स्टण्ट करने तक सब कुछ करने की हिम्मत है इस पीढ़ी के पास। फेसबुक लाइव पर आत्महत्या तक देख चुके हम लोग फेमस होने की इस अंतहीन होड़ में अपने वारिसों के स्वर्णिम भविष्य की बलि लिए चले जा रहे हैं। मृत्यु के भयावह वीडियो जब तक गूगल और फेसबुक के आर्टिफिशल इंटेलिजेंस द्वारा अवरुद्ध किए जाते हैं तब तक उन्हें डाउनलोड करके व्हाट्सएप पर वायरल कर दिया जाता है। यूट्यूब का सिस्टम गुप्तांगों की पहचान करने में सक्षम है और ऐसे सभी वीडियो ब्लॉक कर देता है जिनमें स्त्री अथवा पुरुष के गुप्तांगों का स्पष्ट प्रदर्शन हो।
गूगल की इस क्रूरता से लड़ने के लिए हमारे क्रांतिकारी युवाओं ने ऐसे झीने उपाय खोज लिए हैं, जिन्हें गूगल की आँखें न बेंध सकें लेकिन समान्य व्यूअर का मन बहलता रहे। झीना परिधान ख़रीदने की स्थिति न हो तो किसी भी कपड़े पर पानी डालकर अपने फॉलोअर का मन बहलाया जा सकता है।
आप किसी भी धर्म से संबद्ध हों, फेमस होने की भूख ने आपके समाज के युवाओं को अभद्र तथा आपके समाज की युवतियों को अश्लील बनाने की पूरी तैयारी कर ली है। सुहागरात की वीडियो बनाकर वायरल करने तक के क़िस्से सामने आ रहे हैं।
प्रेम, वात्सल्य, संवेदना, करुणा और यहाँ तक कि हास्य भी किसी एक इमोजी का मोहताज होकर रह गया है। प्रतिक्रिया के बहाने आपके सोचने-समझने की क्षमता जीवित न हो जाए इसलिए आपका स्मार्टफोन आपको हर बात का उत्तर देने के लिए प्री-फिक्स वाक्यों का सुझाव दे देता है। हर भाव को व्यक्त करने के लिए इमोजी उपलब्ध है, अब आप अपने चेहरे पर भाव लाए बिना भी अपनी प्रतिक्रिया लिखकर भेज सकते हो।
ज़ुबान कट जाए तो जी सकते हैं लेकिन अंगूठा कट गया तो जीना सम्भव न होगा। दवाई छूट सकती है लेकिन पोस्ट नहीं छूटनी चाहिए। बैंक का ब्याज कम हो जाए पर चैनल का ग्राफ नहीं गिरना चाहिए। चैनल की पॉपुलरिटी कम होने लगे तो किसी को गाली दे दो, किसी की चरित्र-हत्या कर दो, ख़़ुद नंगे हो जाओ या किसी को नंगा कर दो… चैनल चलता रहना चाहिए।
कुछ न कर सकें तो भी ‘केवल फेमस होने की भूख से ओतप्रोत’ अनर्गल, अश्लील, भौंडी, भद्दी, अभद्र वीडियो पोस्ट करनेवालों को ब्लॉक करने की पहल भी कर ली तो इस मरती हुई संस्कृति को कुछ साँसें उधार देनेवालों में आपका नाम भी शामिल होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। अराजकता किसी समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। जिन लोगों ने अपने राजनैतिक हित साधने के लिए आपको गाली देना सिखाया है, वे ही अपनी अन्तरराष्ट्रीय छवि बचाने के लिए आपको असभ्यता के आरोप में पार्टी से बाहर कर देते हैं। जिन लोगों के चित्र अपनी प्रोफाइल फोटो में चेपकर आप किसी व्यक्ति अथवा पार्टी विशेष के समर्थक होने का दंभ भरते हैं वे लोग आपके विवेक को हाइजैक करके आपकी प्रोफाइल को ‘यूज़’ कर रहे हैं, और आपको पता भी नहीं चलता।
नफ़रत के बीज बोते समय यह हमेशा स्मरणीय है कि काँटे आपका झंडा देखकर आपको ज़ख्मी नहीं करते हैं। आप कितनी भी सावधानी से दूसरे की ओर लक्ष्य करके नागफनी बोते रहिए, उसका एक न एक फन आपकी ओर ज़रूर मुड़ेगा।
हैदराबाद एनकाउंटर पर पुलिस को बधाई देने वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि पुलिस प्रशासन को न्याय का अधिकार दे दिया गया तो क्या होगा। अदालतों के सिस्टम में व्याप्त ख़ामियों को सुधारने की बजाय स्वयं को अदालत मान लेना बर्बरता की ओर बढ़ने का संकेत है।
जब मॉब लिंचिंग की ओट लेकर हत्याएँ की जा रही थीं, तब हमारा राजनैतिक नेतृत्व अपने-अपने कार्यकर्ताओं को यह नहीं समझा सका कि जेल में बंद अपराधी को भी मारने का अधिकार किसी व्यक्ति या भीड़ को नहीं दिया जा सकता। ऐसे में केवल ‘आरोप’ अथवा ‘संदेह’ के आधार पर ‘फैसला ऑन द स्पॉट’ करनेवालों से लोकतन्त्र को सर्वाधिक ख़तरा है। लिंचिंग की घटनाएँ हो रही थीं और सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी वोटिंग का बहीखाता खोलकर लाभ-हानि का गणित लगाने में व्यस्त थे।
कांग्रेस ने रामदेव के आंदोलन को कुचलने के लिए जो लाठी चलाई थी, उसी के वार से आज कांग्रेस के एक लीडर की पसली टूट गई है। कांग्रेस ने सीबीआई को तोता बनाकर अपने राजनैतिक विरोधियों पर छोड़ दिया था। इसी परम्परा के फलस्वरुप आज भारतीय जनता पार्टी ने ईडी के कंधे पर बंदूक रखकर विरोधियों को निशाने पर ले लिया है।
किसान आंदोलन के समय आंदोलनकारियों को आतंकवादी और ग़द्दार कहनेवाले यह न भूलें कि सत्ता हमेशा किसी की नहीं रहती। आंदोलन के अस्त्र को इतना बदनाम मत करो कि यदि सत्ता से बाहर होकर कभी आपको आंदोलन के अस्त्र का प्रयोग करना पड़े तो इसमें धार ही न बचे।
बुलडोजर चलाकर स्वयं को विक्रमादित्य समझने वाले यह स्मरण रखें कि यदि सत्ता चली गई तो यही जेसीबी बेताल बनकर उनकी कमर तोड़ देगी। पाटीदार आंदोलन के समय गुजरात की सड़कों पर अग्निवर्षा करनेवाले आज तत्कालीन सत्ताधीश के साथ बैठे हैं। उस समय उस अराजकता को समर्थन देने वाले कांग्रेसी भी लोकतन्त्र के अपराधी थे और आज उस अराजकता से उपजे लीडर को साथ बैठाने वाले भाजपाई भी उसी अपराध में संलग्न हैं।
किसी भी सरकारी योजना का विरोध करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है किन्तु उस अधिकार की ओट में अराजक हो जाना कम से कम गांधी के देश में तो बर्बरता ही कहा जाएगा। जिस गांधी को गाली दे-देकर राष्ट्रवादियों ने सोशल मीडिया पाट दिया है, जिस गांधी को ‘यूज़’ करके कांग्रेस ने सत्ता की शतरंज बिछायी है उसी गांधी की ज़रूरत आज फिर आन पड़ी है।
अग्निवीर योजना के मुआमले में यदि आंदोलन को ही ग़लत ठहरा दिया जाए तो भी अनुचित होगा और यदि उस आंदोलन के बहाने की जा रही आगजनी और हिंसा का समर्थन किया जाए तो भी अनुचित होगा।
ऐसे में गांधी का ‘शांतिपूर्ण विरोध’ का मंत्र सामयिक लगता है। टेलिविज़न डिबेट से लेकर राजनैतिक बयानबाज़ी तक एक तरीके के लोग इन आंदोलनकारियों को अनपढ़, असभ्य, राष्ट्रद्रोही और नालायक सिद्ध करना चाह रहे हैं और दूसरी तरह के लोग इस आगजनी को आंदोलन, विरोध, क्रोध और सत्ता की मनमानी का प्रतिफल बताने पर तुले हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि ये सब लड़के हमारे इसी समाज के वे नौनिहाल हैं, जिनको लोकतन्त्र के अधिकारों का पाठ पढ़ाते समय मास्टर जी ने गांधी की अहिंसा का पन्ना हिकारत से पलट दिया था।
✍️ चिराग़ जैन
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कोई मनुष्य अपने भीतर चल रहे प्रत्येक भाव को अभिव्यक्त कर दे, तो समाज उसे तत्काल ‘पागल’ घोषित कर देगा। इच्छाएँ उस मदमस्त गजराज की तरह होती हैं कि उन पर लोकभय का अंकुश न लगाया जाए तो वे पूरा वनप्रदेश तहस-नहस कर सकती हैं। आजकल कुछ लोग अपने मन के भीतर की इन समस्त उत्कंठाओं को अभिव्यक्त करने को आधुनिकता कहते हैं, जबकि अध्यात्म इन इच्छाओं को नियंत्रित करके शांत करने को संन्यास कहता है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि ‘संन्यास’ इच्छाओं को नियंत्रित करने का मार्ग है और ‘मोक्ष’ इच्छाओं से पार पा जाने का बिंदु है, लेकिन इसके बावजूद इच्छाओं से उलझकर जीवन को सुलझाने की उत्कंठा रखनेवाले व्यक्ति के लिए नगर नहीं, वन उपयुक्त बताया गया है।
नगर में रहना है तो नगर के नियमों का पालन करना ही होगा, अन्यथा समाज में अराजकता फैल जाएगी। समाज को अराजकता से बचाने के लिए ही समाज को नियमों की बाड़ से बांधा जाता है। यह बाड़ समाज का विकास अवरुद्ध करने के लिए नहीं, अपितु समाज को सुंदर, सुव्यवस्थित तथा सुगढ़ बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
यह बहुत संभव है कि इस बाड़ की कोई कड़ी समाज के सुख को अवरुद्ध करके उसे चोटिल करने लगे तो उसे हटाकर उसका समाधान करने की व्यवस्था भी बाड़ बनानेवाले करते ही हैं। इसीलिए दुनिया के प्रत्येक संविधान में नियमों के बदलाव संबंधी नियम भी सम्मिलित होते हैं। एक सभ्य समाज इन्हीं नियमों का पालन करते हुए किसी सामाजिक नियम के परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त करता है।
बाड़ की कोई डंडी आपको चुभी और आपने अपने समर्थकों की फौज जुटाकर पूरी बाड़ को ही ध्वस्त कर डाला तो आपने अपने नगर में जंगल बोने से अधिक कुछ नहीं किया।
कई बार राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण बाड़ की डंडियों का प्रयोग समाज की प्रताड़ना हेतु होने लगता है। ऐसे में पूरा समाज धीरे-धीरे संगठित होकर पुरानी बाड़ को उखाड़ फेंकता है और नई खपच्चियाँ लगाकर थोड़ी खुली बाड़ लगाने लगता है। बाद में इस नयी बाड़ के खुलेपन में जब गन्दगी सड़ने लगती है तो फिर उस बाड़ को काट-छाँटकर टाइट कर दिया जाता है और समाज व्यवस्थित रूप से मर्यादित हो जाता है।
कमोबेश, यही समाज के संचालन की सामान्य प्रक्रिया है। किंतु सोशल मीडिया के दौर में जब प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में अपना मनोभाव अभिव्यक्त करने का साधन आ गया है, ऐसे में ‘केवल ध्यानाकर्षण के उद्देश्य से’ कुछ लोग न केवल असंयत भावनाओं को ढिठाई से अभिव्यक्त करने लगे हैं बल्कि यह भी मान बैठे हैं कि उनसे बाड़ में वे जिस एक संटी को बदलना चाह रहे हैं, उसी से पूरी बाड़ का चरित्र बदलने की क्रांति हो जाएगी। जिसका जो मन होता है, वह बाड़ पर लिख जाता है। जो चाहे, जिस मर्ज़ी लकड़ी को कोसने लगता है। कोई इन खपच्चियों को आपस में रगड़कर आग लगाने पर उतारू है, तो कोई इन्हें अलग-अलग रंगों में रंगकर रंगदारी वसूलने में लगा है। कोई इन डंडियों को हथियार बना लेना चाहता है तो कोई इन डंडियों पर पाँव रखकर अपना क़द ऊँचा करने में व्यस्त है।
सोशल मीडिया के कारण पूरा समाज इस बाड़ पर अपनी-अपनी क्षमतानुसार प्रहार कर रहा है, किन्तु यह प्रहार किसी आवश्यक क्रांति के लिए लोकतांत्रिक प्रयास न होकर कुछ लाइक्स, कुछ कमेंट और कुछ व्यक्तिगत लाभ बटोरने का उद्देश्य से किये जा रहे कुत्सित आघात हैं। इनके परिणामस्वरूप मर्यादा की बाड़ जगह-जगह से जर्जर हो गयी है। और यदि सोशल मीडिया पर बौराए फिर रहे उन्मादियों के इन आघातों को नहीं रोका गया तो इस बाड़ के उस पार खड़ा जंगल, सूनामी के वेग से समाज में घुस आएगा और उस वेग में सबसे पहले वे लोग ध्वंस होंगे जो अनवरत इस सामाजिक बाड़ को जर्जर कर रहे हैं।
…और तब, अराजकता बो रहे इन मूढ़ों के अस्तित्व की लाश पर सैड वाली इमोजी भी पोस्ट करने कोई नहीं आएगा, क्योंकि इनकी पोस्ट लाइक करने वाला समाज तब अराजकता की सुनामी से जूझ रहा होगा।
© चिराग़ जैन
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अधिकारों की ओट में छिपकर उच्छृंखल हो जाना भी उतना ही अश्लील है, जितना संस्कृति की ओट में छिपकर शालीन बनने का ‘दिखावा’ करना। नैतिकता की परिभाषा, काल-पात्र-स्थान के अनुरूप बदल जाती है। शालीनता केवल यौन आचरण तक ही सीमित नहीं है। समय तथा परिस्थिति के अनुरूप आचरण न करते हुए किया गया कोई भी आचरण अश्लील कहलाता है।
लहंगे, जेवर और फूलों से सजी-धजी स्त्री सबको स्वीकार है; किंतु यही स्त्री यदि किसी मातम में ऐसे साज-सिंगार के साथ उपस्थित हो तो असभ्य कही जाएगी। चिड़चिड़ा व्यक्ति कोई यौन दुराचार न भी कर रहा हो तो भी अपने उत्सव-टेलों में उसकी अकारण चढ़ी त्योरियाँ बर्दाश्त नहीं की जा सकेंगी।
कोई बहुत मिलनसार तथा हेल्पफुल मनुष्य भी यदि किसी की सहमति के बिना उसकी देह को स्पर्श करें तो उसे अश्लील कहा जाएगा। उस समय उसके अन्य व्यवहार के कारण उसकी इस अश्लीलता को अनदेखा नहीं किया जा सकेगा। किन्तु चिकित्सक, दर्जी, जिम ट्रेनर या कभी-कभी कोई सहकर्मी भी अनजाने में अथवा विवशता में आपसे स्पर्श हो जावे और आप उसे यौन-शोषण कहकर हंगामा कर दें, तो यह बर्बरता है। आपके बॉस ने आपकी बात नहीं मानी और आपने उसको सेक्सुअल हरासमेंट के पचड़े में घसीट लिया… यह दुराचार है।
हमने दुराचार और अश्लीलता की परिभाषा को सीमित करके बड़ा अपराध किया है। कोकशास्त्र, कामसूत्र तथा खजुराहो के आधार पर जिस समाज की प्रशंसा की जाती है, वहाँ किसी यौन समस्या पर उठे विमर्श को किसी स्त्री के चरित्र का मापदण्ड बना देना भी अश्लीलता है।
हर विमर्श में व्हिसल ब्लोअर ही सही नहीं होता। किन्तु जिसने विमर्श उठाया है, उसकी चरित्र हत्या करनेवाले न तो विमर्श के हित में हैं, न ही समाज के हित में। और तो और, ऐसे लोग जो इस प्रकार का विमर्श उठानेवाली स्त्री को चरित्रहीन कहकर उसकी निजता में प्रवेश कर रहे हैं, ये लोग सभ्यता की ओट में छिपकर अपनी यौन कुंठाओं को तुष्ट करने के लिए प्रयासरत असभ्य बर्बर हैं।
उस समस्या के पक्ष में और विपक्ष में अपना मत सबको देना चाहिए किन्तु ‘आइये हमसे ले लीजिए चरम सुख’; ‘यार बहुत सुंदर है इसको तो मैं ही संतृष्ट कर दूंगा’; ‘बहुत गर्म है यार, इसे मैं ही ठण्डा कर सकूंगा’ -जैसी टिप्पणियाँ करनेवाले अश्लील यौनकुंठितों की मानसिकता इस समाज के लिए किसी भी अश्लीलता से अधिक भयावह है।
सोशल मीडिया पर उपलब्ध स्त्रियों से पूछो तो आपको पता चलेगा कि उनके इनबॉक्स में ऐसे कितने ही संस्कृति और सभ्यता के ठेकेदारों की अश्लील कुंठाएँ नंगा नाच करती हैं।
मैं उन स्त्रियों का कतई पक्षधर नहीं हूँ जो आज़ादी के नाम पर नंगेपन की सीमा तक सड़क पर घूमने की हिमायत करती हैं। शौच तथा संभोग हमारे जीवन का हिस्सा ही नहीं अपितु सृष्टि के संचालन हेतु आवश्यक भी हैं, किन्तु इन क्रियाओं को यदि हम भरे बाज़ार में सड़क पर करने लगें तो हम दोपायों की काया में चौपायों का आचरण कर रहे होंगे।
प्रेम अनुभूति का विषय है जिसकी दैहिक अभिव्यक्ति नितांत निजी होती है। उसे सार्वजनिक करके फेसबुक पर लाइक्स बटोरने की कुत्सित चेष्टा का मैं समर्थक नहीं हूँ। अपनी प्री-वेडिंग शूट पर निर्वसन हो जाने की आधुनिकता मुझे समझ नहीं आती किन्तु ऐसा कर रही लड़की को भी सर्वभोग्या अथवा वेश्या करार देकर, उसके विषय में घृणित बातें लिखने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
हमें कम से कम इतना विवेक तो जागृत करना ही होगा कि हम किसी प्रश्न का उत्तर देते समय अपनी भाषा तथा शालीनता का उत्तरदायित्व निभा सकें। किसी की गाली का उत्तर गलौज से देने वाला व्यक्ति भी गाली देनेवाले से कम अशिष्ट नहीं है।
हर यौनाचार अश्लीलता नहीं होता और हर अश्लीलता यौनाचार नहीं होती। किन्तु सोशल मीडिया के युग में किसी महिला द्वारा किसी यौन-समस्या पर चर्चा करने भर से पूरे समाज की जो नंगी आवाज़ें कमेंट्स और ट्रोल-प्लेटफार्म्स पर गूंज रही हैं उनसे यह अवश्य कहा जा सकता है कि हम मुँह में घास के तिनके दबाए बैठे रंगे सियारों को देवदूत मान बैठे हैं, जो ज़रा सी हुआँ-हुआँ सुनते ही भूल जाते हैं कि वे देवदूत बनकर भाषण झाड़ने निकले थे।
✍️ चिराग़ जैन
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अपराध करने जा रहे व्यक्ति को सबसे ज़्यादा डर अपने-आपसे लगता है। यही कारण है कि चोर, हत्यारे, जेबकतरे, झूठे, षड्यंत्रकारी, मिलावटखोर, रिश्वतखोर, बलात्कारी और अन्य प्रकार के अपराधी अपराध करने के लिए एकांत तलाशते हैं। यह एकांत अन्य किसी से नहीं, बल्कि स्वयं से चाहिए होता है।
चोरी करते व्यक्ति को यदि कोई हल्की-सी आहट भी सुनाई दे जावे तो वह भयभीत हो जाता है। उसका यह भय लोगों के जाग जाने का भय नहीं होता, अपितु अपनी आत्मा के जाग जाने का भय होता है। वह जानता है, कि यदि ज़मीर जाग गया तो खुली तिजोरी में से भी वह एक तिनका न उठा सकेगा। वह आश्वस्त है कि आत्मा ने करवट ली, तो सब बटोरा हुआ सामान वापस वहीं रखना पड़ेगा। इसलिए हर अपराधी आहट सुनकर पसीना-पसीना हो जाता है।
पूरी दुनिया का साहित्य समाज में व्याप्त विद्रूपताओं के लिए इसी आहट की भूमिका अदा करता है। एक बार इस आहट से चेतना कुलबुला जाए, फिर किसी दण्ड संहिता की आवश्यकता न रह जाएगी। बलात्कार को उन्मत्त व्यक्ति बलात्कृता का मुँह नहीं, अपनी आत्मा के कान भींच रहा होता है। उसे भय रहता है कि कहीं इसकी दर्द भरी आवाज़ ने उसकी आत्मा को छू लिया तो फिर वह कुछ न कर सकेगा। वह जानता है कि उसके भीतर का मनुष्य जाग गया, तो फिर उसके सिर पर सवार पशु मूक हो जाएगा।
यही कारण है कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ किसी समस्या का समाधान सौंपने का प्रयास नहीं करतीं, बल्कि समस्या की आत्मा का द्वार झखझोरकर मौन हो जाती हैं। यही कारण है कि श्रेष्ठ फिल्मों में ‘हैप्पी एंडिंग’ या ‘ट्रेजिक एंडिंग’ की आवश्यकता नहीं होती। वे तो समस्या को पूरी ताक़त से दहला कर फेड आउट हो जाती हैं। समस्त व्यंग्य साहित्य समस्या के ज़मीर पर चोट करता है। समस्त हास्यरस समस्या की चेतना को गुदगुदाकर जगाना चाहता है।
उमराव जान फ़िल्म के समापन पर नायिका यह भाषण नहीं देती की अन्यान्य परिस्थितियों के कारण कोठों तक पहुँची लड़कियाँ निरपराध हैं, यदि वे कभी लौट आएँ तो उनके आंगनों को उनका स्वागत करना चाहिए, न कि तिरस्कार..! यह संदेश तो झीनी चिक में से झाँकती नायिका की आँखों पर स्पष्ट लिखा है। फ़िल्म का कुल उद्देश्य यही है कि समाज की आत्मा जागकर इन आँखों का दर्द पढ़ने योग्य बने।
गाय की पूँछ पकड़कर स्वर्ग जानेवाला होरी सामाजिक रूढ़ियों पर चोट करके केवल समाज की आत्मा को जगाना चाहता है। वह गोदान के पक्ष अथवा विरोध में कोई फैसला सुनाता नहीं दिखाई देता।
साहित्यकार से सामाजिक अथवा राजनैतिक समस्याओं समाधान मांगनेवाले लोग न तो साहित्य से परिचित हैं, न ही समाज से। जिस साहित्यिक कृति को गाली देने का उन्हें कोई स्कोप नहीं मिलता, वहाँ वे समाधान का पुछल्ला उठा लाते हैं।
साहित्यकार केवल समस्या को रेखांकित करके समाज के सम्मुख प्रस्तुत करता है। किसी अन्याय के अनदेखा रह जाने की स्थिति से जूझकर उसे सार्वजनिक पटल पर उपस्थित करता है। उसे देखकर कोई अपनी आत्मा को जगाने की बजाय, उल्टे साहित्यकार का ही पंचनामा करने लगे तो यह ऐसे ही है ज्यों किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को अस्पताल पहुँचानेवाले की थाने में पेशी होना।
साहित्यकार समाधान का मार्ग बता सकता है, उस पर चलना तो समाज को स्वयं ही होगा। निराला इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती महिला से समाज का साक्षात्कार ही करा सकते हैं। यदि समाज यह कहने लगे कि निराला उसे पत्थर तोड़ते देखकर कविता लिखने क्यों बैठ गए, उसकी सहायता क्यों नहीं की। तो यह उलाहना समष्टि के पथ पर बढ़ चले रचनाकार को व्यष्टि तक सीमित कर देने का कुप्रयास होगा।
बाबा तुलसी ने रामकथा में राम का चरित्र समाज के सामने रखा। उससे अर्थ ग्रहण करके रामराज की स्थापना का कार्य तुलसी का नहीं, समाज का है। वेदव्यास ने द्वापर में घटित महायुद्ध के कारण तथा मानसिकता समाज के सम्मुख प्रकट की। अब उन स्थितियों से अपने समाज को बचाए रखना समाज का काम है।
कबीर की सभी रचनाएँ कर्मकाण्ड और ढोंग पर चोट करती हुई आगे बढ़ जाती हैं। वे किसी मुल्ला या किसी पण्डित को प्रवचन नहीं देते, बल्कि उनकी क्रियाओं पर कटाक्ष करके उनके ज़मीर का द्वार खटखटाते हैं।
साहित्यकार समाज को विवेकी बनाना चाहता है। यदि समाधान भी साहित्यकार ही सौंप देगा तो समाज अपने विवेक का प्रयोग करने की क्षमता खो बैठेगा। फिर समाज की दशा उन मवेशियों की तरह हो जाएगी जो किसी के हाँकने पर किसी दिशा में बढ़ जाते हैं। फिर साहित्यकार और प्रवचनकार में कोई अंतर न रह जाएगा। फिर आत्मा को जगाने की बजाय भीड़ जुटाने को वरीयता दी जाने लगेगी। फिर सभ्यता के विकास की बजाय अपने-अपने दोपाये मवेशियों के क़बीले लेकर प्रत्येक साहित्यकार ‘लीडर’ बना बैठा होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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जो शांति का उपाय खोजने के लिए अन्तिम प्रयास तक जूझता रहे, उसे शांतिदूत कहा जाता है। जब दोनों ही पक्ष ख़ून-ख़राबे के उन्माद में हों तथा किसी तरह शांति का उपाय न सूझ रहा हो, उस समय भी शांति का उपाय खोजना ऐसा ही है, ज्यों सींग भिड़ाए खड़े दो बिजारों को लड़ने से रोकना हो। इस स्थिति में स्वयं के लहूलुहान होने का संकट रहता है।
हमारे पौराणिक साहित्य में शांति के ऐसे प्रयासों के दो विशिष्ट उदाहरण मिलते हैं। प्रथम, राम की सेना लंका को घेरे खड़ी है और सीता की खोज, लंका दहन तथा सेतुनिर्माण सरीखी अविश्वसनीय घटनाओं से रावण का मनोबल टूटा हुआ है। वानर सेना आत्मविश्वास से भरी हुई है। ऐसे में भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अंगद को शांतिदूत बनाकर लंका की राजसभा में भेजा। अंगद ने जब राघव का प्रस्ताव रावण के सम्मुख रखा तो रक्ष-शक्ति के बलाभिमान से उन्मादी हुए रावण को लगा कि राम युद्ध से डरकर शांति की बात कर रहे हैं। इसी उन्माद में रावण ने शांतिदूत अंगद का अपमान किया किन्तु अंगद ने अपना बल प्रदर्शित कर रावण के अहंकार को चूर कर दिया। ध्यान से देखें तो समझ आता है कि रावण के दरबार में पैर जमाने वाले अंगद कोई करतब नहीं कर रहे थे, अपितु वे उन्मादी अहंकार को यह जताना चाह रहे थे कि जिस रक्षशक्ति के बूते वह युद्ध में विजयी होने का दम्भ भर रहा है, उसके सर्वश्रेष्ठ योद्धाओं को अकेला एक अंगद परास्त करके जा रहा है। अंगद रावण को यह बताना चाह रहे थे कि शांति की बात करनेवाले को कायर नहीं, दूरदर्शी समझना चाहिए। उसका धन्यवाद करना चाहिए कि वह उस महाविनाश को देखकर, उससे एक युग को बचा लेना चाहता है, जिसे उन्मादी आँखें नहीं देख पा रही हैं।
दूसरे, जब यह तय हो गया कि अब कौरव और पाण्डव कुरुक्षेत्र में घात-प्रतिघात से पूरे द्वापर को लहूलुहान कर देंगे, तब स्वयं नारायण श्रीकृष्ण ने यह निर्णय लिया कि इस युद्ध को रोकने का एक प्रयास और किया जाना चाहिए। युगनायक वासुदेव श्रीकृष्ण स्वयं ‘शांतिदूत’ बनकर हस्तिनापुर पहुँचे और पाण्डवों की ओर से संधि का उपाय सुझाया। किन्तु इस क्षण भी अपने बाहुबल के मद से ग्रसित सुयोधन ने न केवल शांतिदूत का अपमान किया अपितु श्रीकृष्ण को बंदी बनाने की भी चेष्टा की। इस स्थिति में भी श्रीकृष्ण ने विराट स्वरूप प्रदर्शित कर उसके उन्माद की गति को विराम देने का ही प्रयास किया था। नारायण सरीखे व्यक्तित्व को आत्मश्लाघा की डींगें हाँकने की कोई आवश्यकता नहीं थी, वे तो युद्धोन्मत्त मूढ़ों को यह बताना चाहते थे कि जिस बाहुबल पर वह बौराये फिर रहे हैं, उससे अधिक शक्तिशाली होकर भी हम शांति की भाषा बोल रहे हैं।
शांति की बात करने के लिए अधिक बल की आवश्यकता होती है। युद्ध की राह पर धकेलने के लिए तो केवल बाहुबल चाहिए, जबकि शांति की राह पर लाने के लिए बाहुबल के साथ-साथ बुद्धिबल तथा आत्मबल भी आवश्यक होता है। इसीलिए शांति की राह सुझाने वाला युद्धोन्मत्त उन्मादी से तीन गुना अधिक बलवान होता है।
यही कारण है कि जिसने शांति की बात करनेवाले को कायर समझकर उसका अपमान किया है, उसे समूल नाश की दुर्दशा झेलनी पड़ी है।
युद्ध से रक्तरंजित हुए समाज पर मातम और वैधव्य का जो सन्नाटा पसरता है, वह किसी शकुनि या मंथरा से यह प्रश्न नहीं करता कि लाशों की उस अतिवृष्टि को जन्म देनेवाले बादल किस कुचक्र के आकाश में निर्मित हुए थे, वह तो हमेशा भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र, युधिष्ठिर और कृष्ण से ही पूछता है कि जब वे बादल घुमड़ रहे थे तब इनकी छतरियाँ क्या कर रही थीं!
सड़क पर भिड़ने जा रहे दो बिजारों को दूर करनेवाला व्यक्ति करुणा से उत्पन्न साहस से संचालित होता है। उसके शांतिप्रयासों का अपमान करके उसी पर धावा बोलनेवालों को या तो अहंकारी रावण कहा जाएगा, या अशिष्ट सुयोधन या फिर उसे कोरा जानवर कहा जाएगा… ‘जानवर’!
✍️ चिराग़ जैन