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मधुबन पर बस उसका हक़ है

फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है

शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है

मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है

धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है

✍️ चिराग़ जैन

राह के काँटे चुभेंगे

बो रहे हो इस चमन में नागफनियाँ
जिस्म होंगे देखना घायल तुम्हारे
दूब के कोमल गलीचे मत उखाड़ो
पाँव सहलाती मिलेगी कल तुम्हारे

जब तुम्हारी राह के अनुयायियों को
नागफनियों की चुभन से ऊब होगी
राह के काँटे चुभेंगे पीढ़ियों को
तब सभी का पथ हमारी दूब होगी
सिर्फ कोमलता तुम्हारा साथ देगी
क्रूरता उलझाएगी आँचल तुम्हारे

आज जो तुम ताल में विष डालते हो
वह तुम्हारे वंश को पीना पड़ेगा
कल तुम्हारे नौनिहालों को विवश हो
आज के इस दंश को जीना पड़ेगा
कल तुम्हारे अंश को ठगते फिरेंगे
आज के छोड़े हुए ये छल तुम्हारे

आज जिसके ताप से तुम जल रहे हो
वह तुम्हारे ही किसी कल की लपट है
आज जो प्रतिशोध बनकर सामने है
वह तुम्हारे पूर्ववर्ती का कपट है
तुम सुबह की लालिमा में ये न भूलो
कालिमा के दास अस्ताचल तुम्हारे

रोक दो प्रतिशोध की अब ये लड़ाई
ये तुम्हारी पीढ़ियों को पाट देगी
आज तुम दीवार तोड़ोगे जड़ों से
कल कोई बुनियाद तुमको काट देगी
आज जंगल में शहर को घेर लोगे
कल शहर खा जाएंगे जंगल तुम्हारे

✍️ चिराग़ जैन

नाय पलटी सरकार

पायलट ऐसी-तैसी कर गौ, उलटो पर गयो वार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

होटल-होटल नेता दौड़े, दिल्ली दौड़ी आस
सेंटर दौड़ा, जयपुर दौड़ा, सबकी फूली साँस
गुरुग्राम में लोकतंत्र का हो न सका उपचार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

कांग्रेस में गाली गूंजी, बीजेपी में दाम
कैसे अपने लोकतंत्र की भली करेंगे राम
नए नोट हैं सूटकेस में, सत्ता है व्यापार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार

✍️ चिराग़ जैन

संदर्भ: सचिन पायलट को मोहरा बनाकर राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम

रोटी मांगे पेट

राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे

✍️ चिराग़ जैन

राममंदिर का शिलान्यास

पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा

✍️ चिराग़ जैन

बदलाव

जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली

सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली

उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं

✍️ चिराग़ जैन

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