Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
फूलों का सौंदर्य निरखने
बगिया में दुनिया आती है
रंग लुभाते हैं आँखों को
गंध भ्रमर को ललचाती है
लेकिन हर ललचाने वाला
सुख की घड़ियों का ग्राहक है
जड़ में जिसका लगा पसीना
इस उपवन पर उसका हक़ है
शोभा बढ़ती है उपवन की
रूप निरखने वालों से भी
फूलों का मकरंद निखरता
उसको चखने वालों से भी
लेकिन मधुबन उसका होगा
जो ये फूल उगाने आया
तुम सब खिल जाने पर आए
पर वो इन्हें खिलाने आया
तुम उत्सव के अभिनेता हो
वो संघर्षों का नायक है
जिसने सींचे हैं सब पौधे
बस मधुबन पर उसका हक़ है
मंदिर-मंदिर द्वारे-द्वारे
तुमने केवल हाथ पसारे
ईश्वर के व्यापारी बोलें-
ईश्वर हैं क्या सिर्फ़ तुम्हारे?
पूजक बनकर तुमने केवल
इच्छाओं का भार दिया है
छैनी ने आकार दिया है
शब्दों ने विस्तार दिया है
देवालय में मूरत रखकर
शीश झुकाने वाले सुन लें
जिसने रूप गढ़ा मूरत का
बस भगवन पर उसका हक़ है
धरती उनकी है, जो आए
तिनका-तिनका नीड़ बनाने
उनका क्या जो निकल पड़े हैं
ध्वंस मचाती भीड़ बनाने
जो लालच से अभिप्रेरित है
उसका कुछ अधिकार नहीं है
विक्रेता, सर्जक से ऊँचा!
जीवन है, बाज़ार नहीं है
कंस, कालिया सबने केवल
गोकुल का दोहन करना था
जिसने वंशी के स्वर घोले
वृंदावन पर उसका हक़ है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
बो रहे हो इस चमन में नागफनियाँ
जिस्म होंगे देखना घायल तुम्हारे
दूब के कोमल गलीचे मत उखाड़ो
पाँव सहलाती मिलेगी कल तुम्हारे
जब तुम्हारी राह के अनुयायियों को
नागफनियों की चुभन से ऊब होगी
राह के काँटे चुभेंगे पीढ़ियों को
तब सभी का पथ हमारी दूब होगी
सिर्फ कोमलता तुम्हारा साथ देगी
क्रूरता उलझाएगी आँचल तुम्हारे
आज जो तुम ताल में विष डालते हो
वह तुम्हारे वंश को पीना पड़ेगा
कल तुम्हारे नौनिहालों को विवश हो
आज के इस दंश को जीना पड़ेगा
कल तुम्हारे अंश को ठगते फिरेंगे
आज के छोड़े हुए ये छल तुम्हारे
आज जिसके ताप से तुम जल रहे हो
वह तुम्हारे ही किसी कल की लपट है
आज जो प्रतिशोध बनकर सामने है
वह तुम्हारे पूर्ववर्ती का कपट है
तुम सुबह की लालिमा में ये न भूलो
कालिमा के दास अस्ताचल तुम्हारे
रोक दो प्रतिशोध की अब ये लड़ाई
ये तुम्हारी पीढ़ियों को पाट देगी
आज तुम दीवार तोड़ोगे जड़ों से
कल कोई बुनियाद तुमको काट देगी
आज जंगल में शहर को घेर लोगे
कल शहर खा जाएंगे जंगल तुम्हारे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
पायलट ऐसी-तैसी कर गौ, उलटो पर गयो वार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार
होटल-होटल नेता दौड़े, दिल्ली दौड़ी आस
सेंटर दौड़ा, जयपुर दौड़ा, सबकी फूली साँस
गुरुग्राम में लोकतंत्र का हो न सका उपचार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार
कांग्रेस में गाली गूंजी, बीजेपी में दाम
कैसे अपने लोकतंत्र की भली करेंगे राम
नए नोट हैं सूटकेस में, सत्ता है व्यापार
पूरा जोर लगाया फिर भी नाय पलटी सरकार
✍️ चिराग़ जैन
संदर्भ: सचिन पायलट को मोहरा बनाकर राजस्थान में सरकार गिराने की कोशिश नाकाम
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
राम जी का मंदिर बनैया रे, बनैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
सरयू जी के तट पर रमैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
रामराज की फील करा दो, सब कुछ कर दो सेट
भूखे पेट भजन का करिहैं, रोटी मांगे पेट
कित्ते दिन मंझीरा बजैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
थाली और कटोरी देखें दो रोटी की राह
चूल्हा ठण्डा पड़ा सीगड़ी कब से रही कराह
बैठी-बैठी घूरे कढ़ैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
पैटरोल के दाम डराते, देस रहा है झेल
सारी पूंजी हर कर ले गया, रावण बनकर तेल
कैसे अब गड़िया चलैया रे
देस में बजई हैं बधैया रे
✍️ चिराग़ जैन
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पथराए हुए नयन बोले
देहरी बोली, आंगन बोले
फिर राम अयोध्या लौटे हैं
पुलकित होकर जन-जन बोले
साकेत स्वर्ग हो जाएगा, अब रामराज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब नहीं कहीं कोई अबला, पत्थर बनकर दिन काटेगी
अब नहीं कहीं कोई रेखा, मानव-मानव को बाँटेगी
शबरी के बेर चखें राघव, फिर ये रिवाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
जिस धाम चुनौती उपजेगी, उस धाम उपाय निकालेंगे
नल-नील, गिलहरी सब मिलकर, सागर पर सेतु बना लेंगे
अपने सीमित संसाधन से हर कामकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
अब कहीं किन्हीं सुग्रीवों के अन्तस् में क्षोभ नहीं होगा
अब युद्ध जीतने वाले को, लंका का लोभ नहीं होगा
अपनी-अपनी मर्यादा में, अब राजकाज सम्भव होगा
जिसमें जन-जन हो शोकमुक्त, ऐसा समाज सम्भव होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली
सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली
उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं
✍️ चिराग़ जैन