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आख़िर क्यों माँ?

माँ दुनिया तुझको अक्सर ममता की इक मूरत कहती है मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का क़द्रदान हूँ। लेकिन माँ इतना बतला दे तब वो सारी नेह-दिग्धता भीतर का सारा वात्सल्य कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने जब तूने इक सच्चे दिल से दोनों हाथ बलैयाँ लेकर अपने रब से दुआ करी थी इक बचपन...

आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में बहुत बड़ा आयोजन हुआ जिसमें सर्वप्रथम भारत माँ के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्वलन और फिर मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ। भाषण में अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था भाषण का सार कुछ यूँ था- “भैंसा दल के अध्यक्ष श्री कालूूप्रसाद जी! टबासीन मछलियो! रंग-बिरंगी...

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई और आग में जलती देश की कमाई मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश? क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन...

गुड्डी

गुड्डी के पापा लन्च में टिफ़िन खोलते समय मूंद लेते हैं आँखों को क्योंकि देख नहीं पाते हैं रोटियों से झाँकते तवे के सुराखों को। ईमानदार क्लर्क समझ नहीं सकता है क़िस्मत की गोटियों को इसलिए चुपचाप निगल लेता है बोलती हुई रोटियों को। गुड्डी अक्सर लेट पहुँचती है स्कूल नहीं...

मानवता

अपने आप से दूर हो रहे लोग इंसानियत से अधिक आवश्यक हो रहे भोग अदालतों में टूटता भाई-बहन का प्यार अस्सी साल की नारी का बलात्कार पश्चिम की धुनों पर थिरकता यौवन चुनाव-दर-चुनाव बढ़ता प्रलोभन बेटियों को बेचकर ख़रीदा गया राशन धर्ममंचों से पढ़ा जा रहा राजनैतिक भाषण स्कूलों के...

क्या हम हिन्दुस्तानी हैं?

क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है ग़रीबी से सिसकती जान और भूख से निकलते प्राण को देखा है? …ज़रूर देखा होगा बरसात में फुटपाथ पर भीगता हुआ हिन्दुस्तान जिसे पास भीगने को सिर है पर छिपने को घर नहीं है। जिसने अपने चीथड़ों के एक-एक रेशे को उधड़ते हुए देखा है। क्या आपने...
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