Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
वोटों की गिनती भी शुरू नहीं हुई
और एमपी में कमलनाथ को
मुख्यमंत्री बनने की बधाइयां छप गईं
पूरी कांग्रेस पार्टी
इन्हीं हरकतों की वजह से खप गई
अब अगर चुनाव का परिणाम पलट गया
तो उन्हीं बधाइयों के तेल में
हार के पकौड़े तले जाएंगे।
उधर कांग्रेस के स्वघोषित मुख्यमंत्री
राज्यपाल के सामने खीझे थे
क्योंकि जिनके दम पर वे सरकार बनाने चले गए थे
वो तो एग्जिट पोल के नतीजे थे।
पहले कुशवाहा ने साथ छोड़ा
फिर ऊर्जित पटेल ने बम फोड़ा
इससे पहले की सरकार का संतुलन बिगड़ता
लंदन ने सरकार के हाथ में थमा दिया भगौड़ा
एक ही दिन में कितना कुछ घटित हो गया
दिल्ली में सारा विपक्ष संगठित हो गया
एक ही दिन की घटनाओं ने
पूरी राजनीति के सिंहासन हिला डाले हैं
लगता है देश के अच्छे दिन आने वाले हैं
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
दो हज़ार अठारह बीता देकर कितने सारे घाव
कालखंड की चौसर पर ज्यों मौत जीतती जाए दांव
साल अभी प्रारम्भ हुआ था काल दिलों को छील गया
दूर देश में एक हादसा श्रीदेवी को लील गया
अभिनय के घर मातम छाया, इस ग़म की सिसकी थमती
उससे पहले विदा हो गए श्री जयेंद्र जी सरस्वती
अगला सदमा लगा अचानक सूफी की कव्वाली को
विदा किया हमने धरती से प्यारेलाल वडाली को
तभी काव्य की गलियों की ख़ुशियों को पाला मार गया
हिंदी कविता का इक ध्रुवतारा टूटा केदार गया
काल साथ ले चला अचानक शोलों के सहभागी को
काव्य जगत ने खोया अपने बालकवि बैरागी को
इसके बाद कारवां गुज़रा गीतों के जादूगर का
धरती का नीरज बन बैठा अमर सितारा अम्बर का
राजनीति की गलियाँ रोईं दक्षिण के स्वर क्लान्त हुए
चेन्नई की धरती के बेटे करुणानिधि जी शांत हुए
जाने क्या विधि ने ठानी थी, कैसी थी उसकी मर्ज़ी
पाँच दिनों के बाद बिछुड़ गए सोमनाथ जी चटर्जी
ऐसा लगता था ईश्वर ने सारे गौहर बीन लिए
जब निर्मम होकर भारत से अटल बिहारी छीन लिए
एक एक कर हमसे छीने कितने जगमग दीप गए
पत्रकारिता जी भर रोई जब नैयर कुलदीप गए
कड़वे प्रवचन मौन हो गए, ओझल हुआ अमिट आलोक
सारे संत जगत पर छाया संत तरुण सागर का शोक
फिर नारायण दत्त तिवारी, और खुराना लाल मदन
इतने सारे हीरे खोए, घायल है अब अंतर्मन
ये आँसू का साल रहा है अब कोई संघर्ष न हो
ईश्वर से बस यही दुआ है अगला वर्ष हर्ष का हो
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
जनक ने कहा-
“प्रत्यंचा चढ़ाओ!”
तुमने धनुष ही तोड़ दिया।
जनता ने कहा-
“धोबी की पत्नी को न्याय दिलाओ!”
तुमने अपनी पत्नी को ही छोड़ दिया।
धनुष तोड़ कर सीता को तो वर लाए
फिर कभी सुधि नहीं ली
उस टूटे वरदान की,
सीता को त्याग कर उदाहरण तो बन गए
लेकिन चिंता नहीं की
अर्धांगिनी के सम्मान की।
मांगलिक कार्यों में
शस्त्र का खण्डन
और ऋषि का कोप
अपशकुन था राम जी!
और सँवारने की कोशिश में
बिगाड़ कर छोड़ देना
तुम्हारा पुरुषोचित गुण था राम जी!
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
हवा में
ज़हर घुलता जा रहा है।
वो सारी गंदगी
जो आग के ज़रिए
हवाओं में कहीं ग़ुम हो गई थी;
वही अब साँस के ज़रिए
हमारे फेफड़ों में जम रही है।
हमारी साँस की सरगम सुनाती धौंकनी से
अचानक आह की आवाज़ आने लग गई है।
कोई तो है
जो अपने साथ बीती ज़्यादती का
हमारी नस्ल से दिन-रात बदला ले रहा है।
कोई तो है
जो हमसे ही हमारी कौम को बर्बाद करने के लिए
बारूद-असला ले रहा है।
कोई तो है जिसे मालूम है
कमरे को ठंडा कर रहे
हर देवता का दूसरा चेहरा
बड़ा भभका उठाता है।
कोई तो है जिसे एहसास है
हर आँख में पलती
हर इक अय्याश हसरत की
कोई मजलूम ही क़ीमत चुकाता है।
हमारा ढोंग खुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है।
सुना है
पेड़ बादल को बुलाने के लिए
बाँहें उठाते थे।
सुना है प्यास से थक कर परिंदे
बारिशों की मिन्नतों के गीत गाते थे।
सुना है
सर्दियों में खेत कोहरे की रिजाई ओढ़ लेते थे।
सुना है
फूल गुलशन में टहलती तितलियों को
रोक लेने की सुबह से होड़ लेते थे।
सुना है
एक मुद्दत से किसी भी फूल से मिलने
कोई तितली नहीं आई।
सुना है
एक अरसे से
सिमटते जा रहे तालाब पर
बदली नहीं छाई।
सुना है
पूस की ठंडी ठिठुरती रात में भी
खेत नँगा सो रहा है।
सुना है कोयलें सब ग़ैर-हाज़िर हो चुकी हैं;
सुना है बांझ होते जा रहे फलदार पेड़ों की
पुराना बाग़ लाशें ढो रहा है।
सुना है
हर नदी नाराज़ हैं।
हवाएं रोज़ बेइज़्ज़त हुई हैं।
ज़मीं के ख़ूबसूरत जिस्म पर
तेज़ाब फेंका है हमारी हसरतों ने।
सुना है पेड़ अब इस बेअदब इंसान को
छाया नहीं देते।
जिन्हें हम पूजते थे देवता कहकर
बहुत बेफ़िक्र थे हम लोग जिस आगोश में रहकर
सुकूँ देता था जिनका साथ, जिनका संग
बहुत गहरा था जो इक दोस्ती का रंग
वो गहरा रंग धुलता जा रहा है
हवा में ज़हर घुलता जा रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Poetry
भारत का योग्य सपूत गया
मानवता का अवधूत गया
नैतिकता का क़िरदार गया
हिम्मत का लम्बरदार गया
संसद का उन्नत भाल गया
भारत माता का लाल गया
इक अद्भुत इच्छाशक्ति गई
सद्भावों की अनुरक्ति गई
जनहित का अथक प्रयत्न गया
भारत का अनुपम रत्न गया
दुनिया से बाज़ी मार गया
युग “अटल सत्य” से हार गया
धरती रोई, अम्बर रोया
हर इक आँगन, हर घर रोया
भीगी हैं करगिल की पलकें
संस्कृति के भी आँसू छलके
है मौन पोखरण की धरती
कविताओं की आँखें झरती
वक्तव्य कला का ताज गया
चुटकी का एक रिवाज़ गया
रसपूरित वाणी मौन हुई
तर्कों की भाषा गौण हुई
दिल्ली सूनी, संसद सूनी
जन-जन की पीर हुई दूनी
वह अनुशासन का पालक था
भीतर से निश्छल बालक था
जय-विजय खूंटियों पर टांगी
गरिमा की लीक नहीं लांघी
अन्तस् में नहीं दुभात चला
वह सबको लेकर साथ चला
कुछ पक्ष-विपक्ष नहीं जाना
मानव को बस मानव माना
वह राजधर्म का साधक था
भारत भू का आराधक था
जीवन जीकर भरपूर गया
वह शून्य क्षितिज पर पूर गया
लग गया श्वास लय पर विराम
हे दिव्य तुम्हें शत-शत प्रणाम
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Ek Adad Kirdar, Poetry
ये निशा आज फिर नीरज-निशा कहाएगी
बस क्षोभ यही; इसमें अब वैसा नूर नहीं
ग़ज़लें बाक़ी हैं, गीत बचे हैं अनगिन पर
ये आज तुम्हारे स्वर सुख से भरपूर नहीं
तुम गीत नहीं रचते थे, जादू करते थे
दर्शन की देहरी पर श्रृंगार सजाते थे
रस की गगरी के चातक बड़े छबीले थे
शब्दों की टोली से कितना बतियाते थे
जब आज शाम मैंने सूरज को देखा था
वह लिए शरारत भरे नयन इतराता था
अब जाना उसकी इस इतराहट का मतलब
वह तुम्हें मनाकर साथ लिवाए जाता था
जग को लगता है यही कि ’नीरज’ मौन हुआ
दरअस्ल कारवाँ और बढ़ाने निकले हो
धरती की गोद हरी कर के कविताओं से
अब नभ भर को गीतिका सुनाने निकले हो
थक जाना या चुक जाना; वह भी ’नीरज’ का
मालूम नहीं जलवा नादान ज़माने को
महफ़िल-महफ़िल तुम स्वयं बताते फिरते थे
सदियाँ कम हैं ’नीरज’ की याद भुलाने को
✍️ चिराग़ जैन