विद्वेष और कविता
कविता मुहब्बत की ज़ुबान है। किसी भी परिस्थिति में घृणा के उद्वेग बोने का काम कविता नहीं कर सकती। कविता बलिदान का शौर्यगायन कर सकती है, किन्तु किसी को ‘किसी भी परिस्थिति में’ बलि लेने के लिए उकसा नहीं सकती।
किसी भी वाद या विचार से दूर मनुष्यता को सर्वाेपरि रखना कवि होने की प्रथम वरीयता है। राजनीति और साहित्य में मूल अंतर यही है कि राजनीति आपको मनुष्यता से दूर ले जाकर जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, विचारधारा, वाद, वर्ण, देश और नस्लों के शिकंजों में क़ैद कर लेना चाहती है, जबकि कविता आपको इन सब शिकंजों से मुक्त करके संवेदना के धरातल पर ले आने के लिए कटिबद्ध है।
हिंसा, अराजकता, बर्बरता और वैभत्स्य को हतोत्साहित करने के लिये कविता, करुणा को पोषित करती है। कविता कट्टरता की जड़ों में मट्ठा डालने के लिये रूढ़ियों का उपहास करती है। कविता भय को मिटाने के लिये खिलखिलाने की वक़ालत करती है। कविता विकारों को श्रीहीन करने के लिए श्रृंगार के गीत गाती है।
राजनीति, शक्ति के मद में अकड़ने लगे तो कविता राजनीति पर हास्य करने लगती है। समाज कट्टरता की ज़ंजीरों में जकड़ने लगे तो कविता परंपराओं को रेगमाल की तरह घिसने की पैरवी करती है।
कट्टरता की कीचड़ में पड़े समाज को सड़ांध मारते नियमों से बाहर निकालने की बजाय कीचड़ में सने लोगों के नख-शिख सौंदर्य का गान न तो शायर के लिये शोभनीय है न ही समाज के लिये।
दुर्भाग्यवश यह प्रवृत्ति लगभग प्रत्येक धार्मिक समुदाय में घर करती जा रही है। हमारे समुदाय के व्यक्ति न ग़लत किया या सही, हम उसके साथ होंगे। हमारे धर्म के विषय में कुछ भी कहा, तो काट दिये जाओगे -कौन से धर्म में यह घृणा सिखाई गयी है भाई। क्राइस्ट की सर्वाधिक प्रसिद्ध पेंटिंग में वे ब्रेड और वाइन के साथ दिख रहे हैं। श्रीराम कंचन मृग का शिकार करने जाते हैं। नारद मुनि को बन्दर बनाकर विष्णु उन्हें स्वयंवर में भेजते हैं और उनका उपहास करते हैं। कृष्ण इन्द्र की पूजा के नियम को तोड़ने में नहीं हिचकते। कृष्ण प्रेम करते हैं। कृष्ण युद्ध में छल करते हैं। …यदि हास-परिहास से परहेज किया गया तो ये सब पौराणिक पात्र जड़ हो जायेंगे। फिर अशोक वाटिका ध्वस्त करते हनुमान जी का दृश्य दिखाकर रामलीलाएँ ठहाके न लगा सकेंगी। जैन धर्म का प्रथमानुयोग फिर किसी अंजन को ‘आणं ताणम्….’ बोलते न देख पायेगा।
इस जड़ता से बाहर आइये साहिब। धर्म कोई भी हो, कट्टरता उसके विकास के लिये सर्वाधिक घातक सिद्ध होती है। विश्वास कीजिये हमारे धार्मिक संस्कारों की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि उनको अपमानित करके कोई भी उन्हें ध्वस्त करने में सफल हो जाये। जब हज़ारों मूर्तियाँ खण्डित करके कोई औरंगज़ेब सनातन मंदिरों को नष्ट न कर सका, तो संस्कारों की जड़ें तो मंदिरों की बुनियाद से कहीं अधिक गहरी होती हैं।
इस्लाम हो या वैष्णव धर्म; किसी भी ओट में मनुष्यता को भुला देना स्वीकार नहीं किया जा सकता। और हाँ, जब भी कोई शख़्स, धर्म की आड़ लेकर विद्वेष फैलाने की बात करने लगे तो समझ जाइये कि न तो वह धार्मिक है, न कवि है…. वह कोरी सियासत कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
आज्ञाकारी कोविड
भारत देश ही ऐसा है कि जो भी यहाँ आता है, जल्दी ही यहाँ के रंग-ढंग सीख जाता है। कोविड कि साथ भी यही हुआ। हमने उसे भारत में रहने के नियम-क़ायदे सिखाने में देर नहीं लगायी। अब कोविड हर रोज़ सुबह उठकर अख़बार पढ़ता है और सरकारी गाइडलाइंस के अनुसार अपनी दिन भर की प्लानिंग करता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान है।
रुकी हुई हवाई सेवाएँ प्रारम्भ करते हुए सरकार ने बताया कि मिडिल सीट ख़ाली रखनी है। हवाई अड्डे पर पहुँचने से पहले वेब चेक इन करना है। आरोग्य सेतु एप में ग्रीन स्टेटस होना आवश्यक है। हेल्थ डिक्लेरेशन वेब चेकइन के समय ही भरवा लिया गया। हवाई अड्डे पर थर्मल स्क्रीनिंग और न जाने क्या-क्या नियम बनाकर कोविड से सुरक्षा के उपाय किये गये।
बाद में पता चला कि इन सब नियमों में एयरलाइंस की कमाई की संभावनाएँ खुल गयी हैं। वेब चेक इन करते समय जहाज में कोई भी सीट निःशुल्क नहीं है। अगर आप एयरपोर्ट आकर चेक इन करेंगे तो एयरलाइंस आपसे 100 रुपये चार्ज करेगी। मतलब कोविड को समझा दिया गया है कि जो सौ रुपये ख़र्च करे, उसके नहीं चिपटना है।
जिस मिडिल सीट को ख़ाली रखना था उस पर डिस्पोजेबल सूट पहनाकर यात्री बैठाये जा रहे हैं। अगर कोई घर के कपड़े पहनकर सोशल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन करेगा तो कोविड उसे पकड़ लेगा। लेकिन अगर किसी कोई सफेद क़फ़न टाइप का ढकोसला लपेटकर दोनों तरफ़ के लोगों से सटकर बैठे तो उससे कोविड ख़ुद डिस्टेंस रखेगा। जिस आरोग्य सेतु एप्लिकेशन के न होने पर प्रारम्भ में लोगों को हवाई अड्डे में घुसने नहीं दिया जा रहा था, उसको अब कोई चैक तक नहीं कर रहा है।
उधर कोविड को यह भी समझ आ गया है कि इस मुल्क में राजनैतिक गतिविधियों से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं है। इसीलिए श्मशान में जलती चिताओं के पास खड़े शोकाकुल परिजनों की गिनती की गयी, बारात में बारातियों की गिनती की गयी, बाज़ार में समान बेचते दुकानदारों के चालान काटे गये लेकिन किसी राजनैतिक पार्टी के सदस्यता अभियान में हज़ारों लोगों की उपस्थिति से कोई समस्या खड़ी नहीं हुई क्योंकि वहाँ कोविड के घुसने पर मनाही थी।
बिहार में चुनावी रैलियों में भीड़ आती है तो राजनेता इतराते हुए उसकी फोटो ट्वीट करके अपनी लोकप्रियता का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। क्योंकि कोविड को पहले ही समझा दिया गया है कि ‘देखो भाई, तुम्हारा वोटर कार्ड नहीं बना है इसलिए रैली के आसपास भी मत दिखना।’
कोविड समझता है कि सरकारी कामकाज में अड़ंगा लगाया तो उसको जेल में बन्द कर दिया जाएगा। इसलिए कोविड सरकारी नियमों का पालन करता है। सरकार ने सिनेमाघरों में एक सीट छोड़कर बैठने की इजाज़त दी है तो कोविड को समझ आ गया है कि उसके लिये सिनेमाघरों में स्थान छोड़ दिया गया है, अब वह उस छोड़ी हुई सीट के दोनों ओर बैठे लोगों को तंग नहीं करेगा।
कोविड जानता है कि जलती हुई चिता के आसपास लोग भीड़ लगाकर खड़े हो जाते हैं, उनको पकड़ना चाहिए, लेकिन रैली में लोग लोकतंत्र के लिए जान हथेली पर रखकर आते हैं। इन देशभक्तों का सम्मान करना चाहिए।
किसी से हाथ मिलाओगे तो कोविड फैल सकता है लेकिन चुनावी रैली में कोई नेता पोडियम के साथ खड़ी रोती हुई महिला को गले लगाकर चुप कराता है तो कोविड भावुक होकर दूर खड़ा रहेगा।
वह दिन दूर नहीं जब कोविड बाक़ायदा रसीद बुक लेकर सड़कों पर खड़ा होगा और आते-जाते लोगों को रोककर उन्हें कहेगा कि 100 रुपये की रसीद कटवा लो, वरना क्वारन्टीन करवा दूंगा।
✍️ चिराग़ जैन
लॉकडाउन की दिवाली
मार्किट ठंडा
घर-घर मंदा
जेब सभी की ख़ाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
कोरोना की दहशत ऐसी अबकी गिफ्ट नहीं आये
इसके डिब्बे उसके घर में होकर शिफ्ट नहीं आये
ख़ूब घुमंतू सोन पापड़ी घर पर बैठी ठाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
कोरोना ने लक्ष्मी जी को कैसा क्वारंटाइन किया
धनतेरस के धन्वंतरि ने पूरा सिस्टम जॉइन किया
आतिशबाजी के जलने से पहले जली पराली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
एनजीटी ने पॉल्यूशन का बढ़ता ग्राफ दिखाया है
फ्यूल कॉस्ट ने महँगाई को रस्ता साफ़ दिखाया है
हेल्थ मिनिस्ट्री ने एक्टिव केसों की लिस्ट निकाली है
चारों ओर दिवाला निकला
कैसी आई दिवाली है
✍️ चिराग़ जैन
इलेक्सन
क्या करना है कारोबार
कल और इलेक्सन होंगे
कल और इलेक्सन होंगे, घनघोर इलेक्सन होंगे
हर ओर इलेक्शन होंगे, पुरजोर इलेक्शन होंगे
सब कुछ मुफ्त मिलेगा यार
कल और इलेक्सन होंगे
एमपी वाले चावल देंगे, दिल्ली वाई-फाई
पटना जाकर फोकट में ले लेंगे यार दवाई
मेहनत के मुँह पर पोतेंगे, उंगली की सब स्याही
जब उंगली से काम चले तो काहे देह हिलाई
महंगा वोटों का बाजार
कल और इलेक्सन होंगे
हर नेता में होड़ लगी है, ख़ूब लुटाओ पैसा
राजनीति में सब जायज़ है, इसमें खटका कैसा
भैंस उसी की, जिसने अपने खूंटे बांधा भैंसा
उसने ऐसी-तैसी की थी, हमने ऐसा-तैसा
जी भर जीमो बिना डकार
कल और इलेक्सन होंगे
✍️ चिराग़ जैन
लॉकडाउन की सिचुएशन में वरिष्ठ कवि
सिचुएशन: देश के बड़े-बड़े कवियों को लॉकडाउन की सिचुएशन से गुज़रना पड़ा। उनकी पत्नी ने उन्हें घर के काम में हाथ बंटाने को कहा तो उन कवियों ने क्या गुल खिलाए। हर कवि एक विशेष काम कर रहा है और उसका वर्णन अपने अंदाज़ में कर रहा है।
मैथिलीशरण गुप्त
प्राची से ज्यों दिनकर निकला
यों अग्निमिलन को दुग्ध चला
हे क्षीर न इह विधि व्यर्थ बहो
इस भाँति करो न अनर्थ अहो
मत विकल करो मेरे मन को
नर हूँ, न निराश करो मन को
अब और न अधिक सहूंगा मैं
इस क्षण तव पान करूंगा मैं
अन्यथा देवि उठ जायेगी
मुझ पर कितना चिल्लायेगी
धिक्कारेगी मम जीवन को
न रहो, न निराश करो मन को
रामधारी सिंह दिनकर
कोने-कोने में घूम-घूम
गीले कपड़े से चूम-चूम
सारा घर-आंगन स्वच्छ किया
निज कर से सब प्रत्यच्छ किया
इक मकड़ी जाला लटका था
सीलिंग पर जाकर अटका था
आँखों से ओझल था वह खर
हाथों की सीमा से ऊपर
वह एक चूक मेरे सर थी
उर्वशि की दृष्टि उसी पर थी
जब नाश मनुज पर छाता है
तब इक जाला बच जाता है
भीतर तक टीस रहा हूँ मैं
अब चटनी पीस रहा हूँ मैं
काका हाथरसी
किसी काम ना आ रही, सम्मेलन की ड्रेस
काकाजी ख़ुद लग गये, करने कपड़े प्रेस
करने कपड़े प्रेस, गन्ध महकी घर भर में
‘क्या फूंका’ का मंत्र गुंजा काकी के स्वर में
जब तक काकी ने कमरे के भीतर झाँका
कपड़े नहीं, इस्तरी फूंक चुके थे काका
गोपालदास नीरज
हींग भी गली न थी कि हाय छौंक जल गया
क्या हुआ जो फ्राइपेन का कलर बदल गया
सब्ज़ियाँ मचल गयीं, मटर-मटर उछल गया
ये हसीन सीन घर की लक्ष्मी को खल गया
सात सुर पिछड़ गये
छन्द सब बिगड़ गये
फिर रसोई की तरफ़
किसी के पाँव बढ़ गये
और हम डरे-डरे, श्लोक सुन खरे-खरे
गैस की मशाल का क़माल देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे
ओमप्रकाश आदित्य
काम न करूंगा कोई, हाथ न बँटाऊंगा मैं
मेरे हिस्से कोई काम डाल नहीं सकती
काव्य की अनन्य प्रतिभा से मैं दमकता हूँ
प्रतिभा ये कपड़े खंगाल नहीं सकती
भाव में पगा के शब्द काव्यभोग भोगता हूँ
लेखनी ये दाल तो उबाल नहीं सकती
घर से निकालेगी तो थाने चला जाऊंगा मैं
मुझको तू घर से निकाल नहीं सकती
किशन सरोज
लॉकडाउन के समय में चौंककर
दाल-सी इक नायिका को छौंककर
देख क्या पाता किसी के हाथ की मेहंदी
छौंक से झलते नयन, मलता रहा मन
धर दिए अब और बर्तन चार करने साफ
काम कर-करके मेरा जलता रहा मन
जगदीश सोलंकी
जिनका सरफ एक बार धुल जाए
उनको फिर से सरफ वाले ढेर में न रखना
पूजा के जो कपड़े हैं, उनको अलग धोना
और उन्हें धो के अपने पैर में न रखना
रंग छोड़ते हैं, नए कॉटन के क्लॉथ; सुनो
उन्हें और कपड़ों के फेर में न रखना
हाथ से रगड़कर जल्दी-जल्दी रख देना
धीरे-धीरे धो के देर-देर में न रखना
✍️ चिराग़ जैन