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बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी। जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर...

धैर्य

हे अर्जुन, सूर्यास्त को देखकर न धैर्य छोड़ो, न धनुष; हो सकता है सूर्य गया हो जयद्रथ को बुलाने! ✍️ चिराग़...

कुलगीत IIIT Vadodara

उन्नत शिक्षा हेतु समर्पित इस धरती का अभिनंदन इस परिसर से ज्ञान प्रसारित इसके कण-कण का वंदन जननी-तनय सरीखे ही हैं, आवश्यकता-आविष्कार अनुभव का अवलंबन थामे बढ़ता अधुनातन आचार भौतिकता के चक्र, कल्पना-अश्व, साधना का स्यंदन इस परिसर से ज्ञान प्रसारित इसके कण-कण का वंदन...

तोंद गाथा

जब 25वां साल चढ़ा तब अपना भी पेट बढ़ा जो खाता, वो लगता था प्रतिदिन पेट निकलता था लड़कीवाले आते थे तोंद देख भग जाते थे इक दिन इक लड़की के घर जा पहुँचा रिश्ता लेकर साँस खींचकर बैठा था पेट भींचकर बैठा था बटन काज में अटका था दिल में हर पल खटका था तभी अचानक वो आईं मुझे...

स्वावलंबी प्रकृति

हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है। जिसे कार्य करना होता है, वह...
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