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हर इक मर्यादा के उस पार न हो जाएँ
इक रोज़ कहीं हम सब, बीमार न हो जाएँ

लाइक्स और कमेंट्स बटोरने की ललक सोशल मीडिया यूज़र्स से जो न करवा दे, वही कम है। इस होड़ में किसी की चरित्र हत्या होती हो, तो होती रहे; किसी की जीवन भर की साधना पर कालिख़ पुतती हो तो पुत जाये; किसी का जीवन बर्बाद होता हो तो हो जाये; किसी का परिवार नष्ट होता हो तो हो जाये; हमें तो बस इससे मतलब है कि हमारी पोस्ट की रीच कितनी हुई!
और पढ़नेवाले भी इतनी जल्दबाज़ी में रहते हैं कि लिखनेवाले की बात का पूर्णार्थ और भावार्थ ग्रहण किये बिना ही लाइक ठोककर आगे बढ़ जाते हैं। कुछ लोग तो पढ़ने की जेहमत भी नहीं उठाते और हर पोस्ट को लाइक करते हुए अभियान की तरह फेसबुक का दौरा करते हैं। इस प्रवृत्ति के कारण सोशल मीडिया की विश्वसनीयता और नैतिकता लगभग ध्वंस हो चली है।
इण्डियन आइडियल नामक एक रिएलिटी शो में श्री संतोष आनन्द जी को अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया तो संतोष जी के अनुभव तथा जीवन यात्रा को सुनकर लोगों की आँखें भर आईं। इस भावुकता में नेहा कक्कड़ ने संतोष जी को पाँच लाख रुपये की राशि ‘भेंट’ करने की पेशकश की तो संतोष जी ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि ‘मैं बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हूँ इसलिए यह राशि स्वीकार नहीं कर सकता।’ इस पर नेहा ने रुंधे हुए गले से कहा कि मैं आपकी पोती हूँ और आप मेरी ख़ुशी के लिए यह राशि स्वीकार करें।
इस घटना को कुछ लाइक-लोलुपों ने यह कहकर फेसबुक पर पोस्ट किया कि ‘इतना मशहूर गीतकार भीख मांगकर गुज़ारा कर रहा है।’
उफ़, इस एक शब्द ने नेहा कक्कड़ के वात्सल्य और संतोष आनंद जी के स्वाभिमान; दोनों को गाली दी। हमें याद है जब संतोष जी के परिवार पर सबसे बड़ा दुःख टूटा था तब भी हमने संतोष जी को टूटते हुए नहीं देखा। अपने जवान बेटे की श्रद्धांजलि सभा में जब संतोष जी ने माइक थामा तो उनके बूढ़े जिस्म के सम्मुख उनका आत्मविश्वास तथा उनका जीवट सूर्य की तरह दमक रहा था। जिन संतोष आनंद का जीवन हिम्मत और स्वाभिमान के लिए अलंकृत होना चाहिए उनके जीवन को दया की कहानी बनाने का कुप्रयास किसी पाप से कम नहीं है।
कलाकार समाज की धरोहर भी होता है और उत्तरदायित्व भी। कलाकार समाज के एकाकी क्षणों का सम्बल होता है। कलाकार किसी व्यक्ति के भीतर चल रहे घमासान में उसके आत्मबल की ढाल होता है। न जाने कब, कौन-सी कविता, किसी मनुष्य को आत्मघात से बचा लाती है। न जाने कब कौन-सी पंक्ति किसी मनुष्य को अपराधी होने से रोक लेती है। न जाने कब कौन-सा संगीत भीतर ही भीतर घुट रहे मनुष्य को अभिव्यक्त होने में सहायता कर देता है।
कला की यह सामाजिक उपयोगिता समझनेवाले लोग कलाकारों का सम्मान करते हैं। इन अनुभवों से गुज़रे हुए लोग जब अपने प्रिय कलाकार को कोई राशि अर्पित करते हैं तो वह ‘भीख’ नहीं, ‘भेंट’ कहलाती है। सड़क किनारे ठण्ड में ठिठुर रहे किसी निर्धन के प्रति करुणा से भरकर उसे चादर या कम्बल ओढ़ाने में और अपने पिता को दुःशाला ओढ़ाने में जो अन्तर है; वही अन्तर ‘भीख’ और ‘भेंट’ में है।
सोशल मीडिया की जल्दबाज़ प्रवृत्ति से किसी के स्वाभिमान पर कैसा वज्रपात होता है; काश यह बात लोग समझ सकें।
किसी की निजता को बदनाम करके अपने पेज की रीच बढ़ाना कितना घातक चलन है; काश यह बात लोग समझ सकें।
काश यह बात लोग समझ सकें कि शब्दों के घाव कभी नहीं भरते। काश, कुछ भी लिख देने से पहले यह बात लोग समझ सकें कि संन्यास लेकर भी सम्राट अशोक अपने हाथों मारे गये लोगों को जीवित नहीं कर सके थे।

✍️ चिराग़ जैन

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