सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा खोजना, अपनी अलग कहन तैयार करना और अपनी पठन्त के प्रभाव से अपनी विधा के नवागन्तुकों की महत्वाकांक्षा का लक्ष्य बन जाना किसी को ‘विशेष’ बनाता है। इसी वैशिष्ट्य का नाम है, डॉ. हरिओम पंवार।
मैं जब से कवि-सम्मेलन जगत् में प्रविष्ट हुआ हूं, तब से अब तक इनके लिए अनेक विशेषण और उपाधियां सुनने को मिलीं। किसी ने इन्हें ‘ओज का हिमालय कहा’ तो किसी ने ‘वीर रस का भीष्म पितामह’। किसी ने इन्हें ‘कवि-सम्मेलन की सफलता की गारण्टी’ कहा तो किसी ने ‘अग्नि की लपटों का शब्दानुवाद’। इन सब उपाधियों से सहमति प्रकट करते हुए मैं डॉ. हरिओम पंवार को एक ऐसे कवि के रूप में देखता हूं, जो जनमन की सबसे सटीक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं।
सामान्य-जन की चर्चा से जनमत का सबसे सटीक अनुमान सुन लेने की दक्षता हैं, डॉ. हरिओम पंवार। अख़बार की सुर्खियों में राजनीति का भविष्य टटोल लेने की दृष्टि का नाम है डॉ. हरिओम पंवार। हवा की दिशा देखकर देश की दशा भांप लेने का कौशल हैं डॉ. हरिओम पंवार।
उनकी इसी प्रतिभा ने उन्हें आधी सदी से भी अधिक समय से अनवरत अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बनाए रखा है। डॉ. हरिओम पंवार की कविताओं का यदि देश-काल-समय के मापदण्ड पर विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि वे हमेशा उस वृक्ष को सिंचित करते दिखाई दिए हैं, जिसमें सशक्त हो जाने की क्षमता हो। यही कारण है कि वे किसी भी मुद्दे पर सत्ता या विपक्ष के साथ खड़े होने की बजाय जनमन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
समकालीन विषयों पर लेखनी चलाना, तलवार की धार पर चलने से अधिक दुष्कर कार्य है। घट रही घटना पर कलम चलाने से यश मिलने की जितनी प्रबल संभावना होती है, अपयश की भी उतनी ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे में आलोचना से अक्षुण्ण रहकर आधी सदी का सामाजिक जीवन बिता देना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है।
डॉ. हरिओम पंवार के अमृत महोत्सव पर मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि स्वस्थ रहने का नुस्खा इस व्यस्त कवि की जीवनगाथा में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। सामाजिक जीवन जीते हुए सहयात्रियों के साथ मतभेद और कटुता के क्षण पूरी तरह समाप्त नहीं किये जा सकते। लेकिन इन क्षणों को डील करने के लिए जो सूत्र चाहिए, वह डॉ. हरिओम पंवार के पास नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। वे परस्पर व्यवहार में अपने किसी मनोभाव को अभिव्यक्त करने में लीपापोती करने में विश्वास नहीं करते। मन के भीतर कड़वाहट का विष निर्माण करने से बेहतर है, शब्दों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करके सहज हो जाया जाए।
यही कारण है कि उनके साथ यात्राएं करनेवाले जानते हैं कि वे जितनी जल्दी क्रुद्ध होते हैं, उतनी ही सरलता से क्रोध को बिसार भी देते हैं। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ की नीति का सबसे सटीक चित्रण कहीं मिलता है तो वह उनका आचरण है। किसी बात पर अड़ने की उनकी अवधि कुछ मिनिटों का दायरा कभी नहीं लांघती।
मैं डॉ. हरिओम पंवार जी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनके दीर्घायु और स्वस्थायु होने की कामना करता हूं। तथा एक युग का अमृतग्रंथ तैयार करने का विचार संजोनेवाले संपादन मण्डल के श्रम का अभिनंदन करता हूं।
✍️ चिराग़ जैन
