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प्रधानमंत्री की सुरक्षा में चूक की घटना पर दोनों तरफ़ के लोग जो ट्रोलिंग कर रहे हैं, वह अधिक दुःखद है। यह विषय देश के सर्वाेच्च नेतृत्व की सुरक्षा से जुड़ा है। इसमें परिहास और उपहास की कोई गुंजाइश नहीं है। बल्कि आदर्श स्थिति तो यह थी कि इसमें राजनीति की भी संभावनाएँ न खोजी जातीं।
सीधा-सा मसअला है कि जो विभाग अथवा अधिकारी इसके लिए उत्तरदायी हैं, उन पर कार्रवाई की जावे। लेकिन इसकी बजाय दोनों ओर के लोग इस दुर्घटना को पंजाब चुनाव में भुनाने के लिए कांग्रेसी और भाजपाई होकर दौड़ पड़े हैं।
यह घटना शर्मनाक है। दोनों तरफ़ अतिवाद हावी है। मोदी जी के समर्थक चन्नी की तुलना नवाज़ शरीफ़ से और पंजाब की तुलना पाकिस्तान से करने लगे हैं। तो मोदी विरोधियों ने इसे किसान आंदोलन में हुई मौतों का बदला करार दे दिया। दोनों ही घृणास्पद हैं।
राजनीति जब इस देश के लोक को लोकतंत्र और संविधान का सम्मान सिखाने की बजाय भाजपाई और कांग्रेसी होना सिखा रही थी तब शायद उसे यह नहीं पता था कि इस राह पर कैसे-कैसे मोड़ आ सकते हैं।
बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के पैर का प्लास्टर मीम और जोक्स का विषय बना था तब भाजपाइयों को यह इल्म न रहा होगा कि उनके लीडर भी हाड़-मांस के ही बने हैं और चोट किसी को भी लग सकती है। कांग्रेसी जब नरेंद्र मोदी के लड़खड़ाने पर चुटकियाँ ले रहे थे तब वे भूल गए थे कि यही जनता, रैली में पत्थर फेंककर एक प्रधानमंत्री की नाक घायल कर चुकी है। तब वे भूल गए थे कि घृणा की जिन वादियों में राजनीति के बीज बोए जाते हैं उनका शिखर ख़ून से लथपथ हो जाता है।
द्वेष और स्वार्थ की इन क्यारियों में लोकतंत्र का बगीचा नहीं फूल पाएगा। हम धीरे-धीरे नहीं, बहुत तेज़ी से वर्गों में बँटते जा रहे हैं। हम इतने संवेदनहीन होते जा रहे हैं कि जब दूसरे पक्ष के आंगन में मातम होता है तो हम अपने चौक में जश्न मनाने लगते हैं। हम इतने निष्ठुर हो गए हैं कि शवयात्रा पर भी पत्थर फेंकने से नहीं कतराते।
हम मृत्यु के अवसर पर भी अपने-अपने झंडे उठाए गाली-गलौज करने लगते हैं। राहत इंदौरी, ऋषि कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, रोहित सरदाना, विनोद दुआ और न जाने कितने दिवंगतों ने अपनी अंतिम यात्रा में ये बदबूदार गालियाँ झेली हैं।
हमारी राजनैतिक महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ गयी है कि हमने श्मशान और कब्रिस्तान तक को अखाड़ा बना लिया है। हिंदू-मुस्लिम से अधिक बड़ा द्वंद्व कांग्रेसी-भाजपाइयों में चल पड़ा है। मोदी समर्थक और मोदी विरोधी के मध्य तलवारें खिंच रही हैं। सौहार्द और समन्वय की बात करने वाले गाली खा रहे हैं। ऐसे में पंजाब की घटना से पूरे देश के राजनेताओं को यह सीखना पड़ेगा कि जिन रास्तों में नागफनी बोई जा रही है, उनसे कभी ख़ुद भी गुज़रना पड़ सकता है।
ईश्वर एक मनुष्य के रूप में प्रत्येक राजनीतिज्ञ को भी स्वस्थ तथा दीर्घायु रखे और मेरे देश की जनता को विवेक का वरदान दे!

✍️ चिराग़ जैन

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