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साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो मेडिकल प्रोसेस में पैथोलॉजी लैब की होती है। साहित्य, समाज के भीतर व्याप्त व्याधियों को ढूंढकर तंत्र के सम्मुख रखता है और फिर तंत्र अपने अनुभव, ज्ञान तथा मशीनरी के माध्यम से उस व्याधि का उपचार करता है।
कभी किसी मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट देखेंगे, तो पाएंगे कि लंबी-चौड़ी रिपोर्ट में केवल उन्हीं बिंदुओं को बोल्ड अक्षरों में लिखा जाता है, जहाँ नियत मापदंडों के अनुसार परिणाम नहीं होते।
अब अगर कोई यह कहे कि पूरी रिपोर्ट में इतना कुछ बढ़िया चल रहा है, वह किसी को नहीं दिखता, एक जगह कोलेस्ट्रोल बढ़ा हुआ आया है तो उसे बोल्ड करके दिखाया जा रहा है। या कोई यह रिपोर्ट देखकर पैथोलॉजिस्ट का गिरेबान पकड़ ले कि साले तू नेगेटिविटी फैला रहा है, तूने बीमारी ढूंढी है अब तू ही सर्जरी भी कर।
आजकल कुछ ऐसे भी लोग हैं जो अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखकर भड़क कर कहते हैं कि रामलाल की रिपोर्ट में तो केवल यूरिक एसिड बढ़ा हुआ दिखाया था, मेरी रिपोर्ट में किडनी की गड़बड़ बता रहा है। ये लैब वाला रामलाल का चमचा है।
विश्वास कीजिए, पैथोलॉजी लैब आपके स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है। यदि रोगी इन लैब्स से ही इलाज पूछने लग जाएंगे तो उपचार नहीं, विध्वंस हो जाएगा।
✍️ चिराग़ जैन

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