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आज संतत्व का एक उदाहरण साकार से निराकार हुआ है। आज तपश्चर्या का एक बिम्ब अंतर्धान हुआ है। निश्छल दिगंबरत्व की एक गाथा का पटाक्षेप हुआ है। आज आस्था और विवेक के एक अद्वितीय संगम की समाधि हुई है। आध्यात्मिक ऊर्जा के विराट केंद्र का स्थानांतरण हुआ है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी का देह से विदेह हो जाना हमारी लौकिक आस्था को आहत कर रहा है। दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए आचार्य श्री का स्मरण यह एहसास कराता था कि एक देह में हमारे हिस्से के आशीष का वास इस धरती पर विराजमान है।
यह एहसास अभी भी यथावत रहेगा, किन्तु कल्पनाओं के चित्रपट पर अब वह चित्र नहीं उभरेगा जिसमें एक 77 वर्षीय बालक खिलखिलाता हुआ अपनी हथेलियाँ उठाकर आस्था को आशीर्वाद के अमृत से तृप्त कर देता था।
आचार्य श्री की हथेलियाँ जब आशीर्वाद के लिए ऊर्ध्वगामी होती थीं, तब उनकी उंगलियाँ जुड़ने की बजाय फैल जाती थीं। मानो, एक पिता अपने बालकों की समृद्धि के लिए अपना जी खोलकर वात्सल्य लुटा देना चाहता हो। उनके अधरों से मुस्कराहट कभी गौण नहीं होती थी, मानो एक बुज़ुर्ग अपनी फुलवारी को फलते-फूलते देखकर आह्लादित हुआ जाता हो।
…अब वह दिव्य मुस्कान अलभ हो गई। अब आचार्य श्री के अस्तित्व से भौतिक नयन वंचित हो गए हैं। अब आचार्य श्री की अनुभूति से भौतिक इन्द्रियाँ नदीदी हो गई हैं। अब आचार्य श्री तक पहुँचने के लिए लौकिक यातायात साधन असमर्थ हो गए हैं। अब तक आचार्य श्री को निहारनेवाली आँखों को उनके दर्शन के लिए अब मुंदना होगा। अब आचार्य श्री बाहर कहीं नहीं मिलेंगे। अब आचार्य श्री तक के लिए चलना नहीं, ठहरना होगा।
जैन आगम के अनुसार समाधि पर रोना नहीं चाहिए। जैन आगम के अनुसार मृत्यु को महोत्सव मानना चाहिए।
किन्तु मेरी आँखें रह-रहकर नम हुई जा रही हैं, मेरे लिए एक अनवरत महोत्सव की मृत्यु हुई है।
आचार्य परमेष्ठी को नमोस्तु!

✍️ चिराग़ जैन

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