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भारत में इन दिनों शादियों का सीज़न चल रहा है।
हमारे यहां शादी एक ईवेंट भर नहीं बल्कि बाकायदा एक बोर्ड परीक्षा है, जिसमें आपकी कमर से लेकर आपकी प्लेट और आपका धैर्य तक सब नप जाता है।
सबसे अलग कार्ड बनाने के चक्कर में शादियों के कार्ड में इतनी क्रिएटिविटी घुसेड़ दी जाती है कि जिस इन्फॉर्मेषन के लिए कार्ड भेजे जाते हैं, उसे लैंस लेकर ढूंढना पड़ता है।
आप घर से किसी शादी में जाने के लिए निकलो तो गाड़ी में बैठते ही मोबाइल पर कार्ड खोलकर वेन्यू तलाषा जाता है। कार्ड खुलते ही पहले घंटियां बजती हैं। फिर सितार बजता है, फिर एक-एक अक्षर हौले-हौले आसमान से अवतरित होता है। अपने धैर्य के चरम तक पहुंचकर आपको पता चलता है कि नेविगेषन में क्या लिखकर गाड़ी स्टार्ट करनी है।
घंटों के मेकअप से सजी-धजी औरतें और ट्रैफिक जाम से इर्रिटेट होकर जले-भुने आदमी जब तक विवाह स्थल तक पहुंचते हैं तब तक उनके बीच एकाध गाड़ी-युद्ध हो चुका होता है। ‘चाचा की छादी में जलूल-जलूल आना’ -कहनेवाले बच्चे मम्मी-पापा का महासंग्राम देखकर सहमे हुए छादी में पहुंच पाते हैं।
आयोजन स्थल की सजधज देखकर आपको लगता है जैसे आपका रिष्तेदार रातोंरात अम्बानी हो गया है। गेट पर चार-पांच कैमरामैन एक साथ आपकी फोटो खींचते हैं। आप खुद को सेलिब्रिटी समझते हुए पूरे तेवर के साथ पोज़ देते हैं। इतिहास गवाह है कि विवाहस्थल पर खींची गई ये वेलकम फोटो आज तक किसी ने नहीं देखी।
भीतर बड़े से लॉन में सब लोग अलग-अलग गोलमेज सम्मेलन कर रहे होते हैं। महिलाएं एक-दूसरे की ड्रेस देख रही होती हैं और पुरुष एक-दूसरे की महिलाएं।
कुछ रिष्तेदार स्नेक्स से लेकर मेन कोर्स तक एक-एक काउंटर का ऐसे मुआयना कर रहे होते हैं जैेसे हस्तिनापुर के युवराज महाभारत के युद्ध के लिए वेन्यू का मुआयना कर रहे हों।
डेढ़ दो घंटे स्नेक्स से काम चलाने के बाद जैसे ही इनके हाथ में खाने की प्लेट आती है, ये उसका ऐसा सिंगार करते हैं जैसे किसी ने फेसबुक, इंस्टा, यूट्यूब, ट्वििटर और लिंक्डइन एक ही स्क्रीन पर खोल लिए हों। वेक्यूम क्लीनर की स्पीड से भोजन निपटाकर वर-वधू को आषीर्वाद देने की सुधि आती है।
वर-वधू स्टेज पर ऐसे रखे होते हैं जैसे किसी ने पापड़ बेलकर धूप में डाल दिए हों। स्टेज के सामने एक कोने में डीजे लगा होता है। फ्लोर पर नाचनेवाले माइकल जैक्सन सारी दुनिया को भूलकर बेतहाषा नाचते रहते हैं।
ढाई-तीन घंटे में नाच-गाना-खाना वगैरा निपटाकर सभी उत्साही रिष्तेदार ‘चल खुसरो घर आपने’ का अनुसरण करते हुए घर लौट जाते हैं।
वर-वधू अपने-अपने परिवार और जबरदस्ती रोक लिए गए दो-चार खास रिष्तेदारों के साथ फेरों पर बैठ जाते हैं। शेरवानी और लहंगे का वजन अब तक दोनों को थकाकार चूर कर चुका होता है।
इधर फेरे हो रहे होते हैं और उधर हलवाई से लेकर बैंक्व्ट हॉल तक के कर्मचारी अपना-अपना सामान बटोरने लगते हैं।
रथ की तरह सजी मारुति और जूठे पतीले उठाकर ले जाने वाली ठेली साथ-साथ खड़ी होती है तो लगता है कि समाजवाद आ गया।
विदाई कराकर एक दिन के अम्बानी वापस अपने बसेरों में लौट जाते हैं। और उस वेन्यू पर अगले दिन फिर किसी परिवार को ‘अम्बानी फील’ देने की तैयारी होने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन

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