जिनकी धमनियों में डोलता था ज्वालामुखी,
मात-भारती के क्रांति-कोष कहाँ खो गए
राष्ट्र-स्वाभिमान वाली मदिरा का पान कर
होते थे जो लोग मदहोश; कहाँ खो गए
जिस सिंह-गर्जना से बाजुएँ फड़कतीं थीं,
इन्क़लाब वाले जय-घोष कहाँ खो गए
देश को आज़ादी की अमोल सम्पदा थमा के,
नेताजी सुभाषचन्द बोस कहाँ खो गए
✍️ चिराग़ जैन
