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अमर पंक्तियों का व्याकरण

किसी पंक्ति में ऐसा क्या विशेष होता है कि वह अचानक युगजयी हो जाती है! हज़ारों-लाखों लोगों ने पूरा-पूरा जीवन लगा दिया काव्य रचने में, लेकिन पूरी दुनिया में उंगली पर गिने जाने योग्य कविताएँ ही अमर हुई हैं। और जो अमर हुई हैं उन पंक्तियों के शब्द शिल्प में कुछ असाधारण दिखाई भी नहीं देता। उनसे बेहतर भाषा, उनसे बढ़िया व्याकरण, उनसे अधिक अलंकार से सजी पंक्तियाँ अपने रचयिता की देहरी नहीं लांघ सकीं।
इससे यह बात साफ़ है कि काव्य की प्रसिद्धि कम से कम शिल्प पक्ष पर तो निर्भर नहीं है। लेकिन भाव भी कुछ एक्स्ट्रा ordinary नहीं जान पड़ता। कई जगह तो जन समान्य में प्रचलित ‘अच्छी बातों’ की तुकबंदी सी की हुई है। और इन बातों को अधिक प्रभावी बिम्ब विधान से कहने वाले कवि भी उपलब्ध हैं, लेकिन वे अपनी कविता को जन कविता न बना सके। अर्थात भाव पक्ष भी कविता की लोकप्रियता का आधार तत्व नहीं है।
फिर क्या ख़ास है? शायद कहने वाले का व्यक्तित्व? लेकिन ऐसा होता तो किसी कवि की हर कविता अमर हो जाती। लेकिन मीरा के समूचे साहित्य में से एकाध ही पंक्ति क्यों अमर हुई? रैदास, कबीर, तुलसी, रहीम, निराला, पंत, पाश… इनकी कोई एकाध पंक्ति ही क्यों कहावत बन सकी? इनकी कोई एक अर्द्धालि, कोई एक दोहा, कोई एक मिसरा, कोई एक श्लोक ही सूक्ति-सौभाग्य से युक्त क्यों हैं?
कवि जब सर्जना करना प्रारंभ करता है तब वह सदेह होता है, उस समय उसके मन मे लोक की अभिरुचि, जन की पसंद-नापसंद, प्रशंसा की आकांक्षा, आलोचना का भय विद्यमान रहता है। लेकिन ज्यों-ज्यों रचना स्वयं को गढ़ना प्रारंभ करती है तब लोक पीछे छूटने लगता है। फिर उसके कान लोक का कोलाहल नहीं सुन पाते। फिर उसकी चेतना देह से ऊपर उठने लगती है। फिर वह अपने अनहद को सुनने लगता है। फिर उसकी चेतना अपने अनहद की ओर आकृष्ट होने लगती है।
यहाँ से उसकी सर्जना विस्तार पाती है। उसकी चेतना गहराई में उतरती है और उसकी सर्जना ऊँचाई की ओर बढ़ चलती है। अनवरत बढ़ते-बढ़ते वह अपने अनहद को लिपिबद्ध करने लगता है और जिस पंक्ति पर अनहद लिपिबद्ध हो गया, उसका कालजयी होना सुनिश्चित है। जिस पंक्ति की चेतना जितने गहरे उतरी होगी, उसका आकाश उतना ही अधिक विस्तार पा जाएगा।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो… कुछ भी तो ख़ास नहीं इस काव्यांश में। इसका अर्थ लिखो तो एक अनुच्छेद नहीं लिखा जाएगा किंतु फिर भी यह पंक्ति अमर हो गई! क्योंकि इसको मीरा ने सोचा नहीं होगा। सोचकर लिखा गया काव्य इतना विराट हो ही नहीं सकता। सोचकर लिखे गए शब्दों में इतना अजस्र रस हो ही नहीं सकता। यह तो अनवरत तलाश के बाद बंद पलकों के भीतर किसी को पा लेने का आनंद है जो एक पंक्ति में अनूदित हो गया।
इस पंक्ति का साधारण होना ही इसके विशेष होने का प्रमाण है। और यह भी सत्य है कि इसको रचने वाली मीरा स्वयं इस बात से भिज्ञ न रही होंगी कि इस पंक्ति का वातायन कितना विराट होगा। जान जाती तो इसे और अधिक कलात्मक बनाने की चेष्टा करने लगती। और यही चेष्टा इस महान पंक्ति की हत्या कर देती।
चेष्टातीत होना ही किसी पंक्ति के अमर होने की घोषणा है।
मीरा तो कृष्ण की दीवानी थी, फिर राम रतन धन क्यों? कृष्ण रतन धन क्यों नहीं? क्योंकि जहाँ इस पंक्ति का सृजन हुआ है वहाँ संज्ञाभेद है ही नहीं। वहाँ तो स्वयं मीरा भी राम ही हो गई होंगी। वहाँ तो आनंद का उत्कर्ष घटित हुआ होगा। और आनंद के उत्कर्ष में संज्ञा का क्या काम। वहाँ तो बस नृत्य है। वहाँ तो बस अनहद है। वहाँ जाकर शब्द भी कहाँ सूझता होगा। कभी युगों के बाद ऐसी घटना घटती है कि अनुभूति के उस उत्कर्ष पर पहुंचकर यकायक किसी के मुख से कोई पंक्ति निकल पड़े। बस यही पंक्ति युग की सीमाओं के पार निकल जाती है।
इसे वायरल करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह तो धूप की तरह फैलती है। इसे पूरा करने की भी जरूरत नहीं पड़ती। इसे पूरा कर भी दिया जाये तो यह शेष सचेष्ट को साथ लेकर नहीं चलती। सचेष्ट लेखन इसके साथ दौड़ ही नहीं सकता। राजधानी एक्सप्रेस के इंजन से बैलगाड़ी जोड़ दोगे तो बैलगाड़ी या तो टूट जाएगी, या छूट जाएगी।
इसीलिए मानव सभ्यता के इतिहास में कई टन काव्य लिखा गया लेकिन युग, वर्ग, भाषा, देश, संस्कृति, वाद और विमर्श की सीमा से परे अम्बर के सितारों सरीखी सार्वजनिक पंक्तियाँ उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं।
✍️ चिराग़ जैन

आस्था का अपमान

जो आस्था न तोड़ सका उसने मन्दिर तोड़े और जो विचार को न मिटा सका वह किताबें जलाने लगा। लेकिन यह कृत्य वीरता का नहीं, अपितु स्वयं के परास्त होने की घोषणा है। अभिमन्यु की हत्या करके कौरवों ने पाण्डवों को आतंकित नहीं किया था अपितु आश्वस्ति प्रदान की थी कि कौरवों का नैतिक बल समाप्त हो गया है।
जब तर्क करते-करते कोई तर्क के स्थान पर बल अथवा क्रोध का प्रयोग करने लगे तो यह सूचना है कि उसके तरकश में तर्क का कोई तीर शेष नहीं है। यह ऐसे ही है जैसे कोई धनुष से तीर छोड़ने के स्थान पर धनुष ही फेंककर मार दे।
किसी ग्रंथ की प्रतियाँ जलाना, किसी धर्म का आस्था केंद्र ध्वस्त करना, अपने विपक्षी की चरित्र हत्या करना, अपने विरोधी का नाम बिगाड़कर बोलना -यह सब इस बात की सूचना है कि तर्क के संग्राम में हमारे पार तर्क ही नहीं कुतर्क भी समाप्त हो चुके हैं।
यह सब कुछ बहुत बचकाना है। रामचरितमानस की प्रतियाँ जलाने से मानस में विराजित राम कैसे अपमानित हो सकते हैं? आप तुलसी की चौपाई पर तर्क करें, वह आपका अधिकार है किन्तु पुस्तक जलाकर आप उस ग्रंथ को मिटाना चाह रहे हैं तो यह आपके मूढ़ होने का प्रमाण है।
ये डिजिटल युग है भाई। दो कौड़ी की तुकबंदी करने वाले भी रेडियो तरंगों और बाइनरी में रूपान्तरित होकर अनन्त काल तक सुरक्षित रहने के जुगाड़ कर लेते हैं, ऐसे में आप हार्डकॉपी जलाकर रगों में दौड़ती रामचरितमानस को मिटाने का दंभ भर रहे हैं! हास्यास्पद है यह।
युद्ध में अनैतिक आचरण करनेवाला योद्धा, जन सहानुभूति खो देता है। बाबा तुलसी के जिस लेखन को आप फूंकना चाह रहे हैं, वह किसी काग़ज़ के टुकड़े पर नहीं बल्कि मानस पटल पर अंकित है।
जब कोई भाजपा का प्रवक्ता राजनैतिक बहस में विपक्षी नेताओं के नाम बिगाड़कर बोलता है तब यह साफ़ समझ आता है कि इस व्यक्ति के पास विचार का घोर अभाव है इसलिए यह हरकतों से ध्यान बंटाने की चेष्टा कर रहा है। राहुल गांधी को ‘पप्पू’ कहनेवाले; नरेंद्र मोदी को ‘फेंकू’ कहनेवाले; रवीश को ‘रबिश’ या ‘खबीस’ कहनेवाले दरअस्ल राहुल, मोदी या रवीश को नहीं चिढ़ा रहे होते हैं, ब्लकि अपनी पराजय पर एक बेहूदा हँसी का पर्दा डालने की कोशिश कर रहे होते हैं।
ठीक इसी प्रकार मानस की प्रतियाँ जलानेवाले मानस को भस्म नहीं कर रहे अपितु एक पूरे विमर्श को स्वाहा करने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
किसी को मानस के किसी अंश पर शंका हुई- इसमें कोई अपराध नहीं है। किसी अन्य ने अपने ज्ञान के अनुसार उस शंका का उत्तर दे दिया, इसमें भी कुछ ग़लत नहीं है। शंका करने वाला उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ- यह भी बेहद समान्य घटना है। निवारण करने वाला झल्लाहट और क्रोध से भर गया- यह भी स्वाभाविक है। चर्चा, शास्त्रार्थ में बदल गई; सन्दर्भ स्पष्ट किए गए -इस सबमें कोई बुराई नहीं थी। वरन् यह तो किसी सभ्य समाज के सविवेक होने का द्योतक है।
किन्तु इस चर्चा में शंका करनेवाले को अपमानित करना अनैतिक था और इस चर्चा के दौरान मानस की प्रतियां जलाना अपराध था।
तुलसी, राम और मानस; ये तीनों ही अग्नि के प्रभाव क्षेत्र से बहुत दूर निकल चुके हैं। मान-अपमान जैसे लौकिक शब्द भी इनके आभामंडल के तेज में विलुप्त हो जाते हैं। किंतु इनके विषय में चर्चा करते हुए अभद्रता या अराजकता की लक्ष्मण रेखा लांघनेवाला अपने संस्कारों का आधार कार्ड अवश्य सार्वजानिक कर देता है!
इस घटना पर इसके अपराधियों को लज्जित होना चाहिए और इस पर प्रतिक्रिया करने से पहले राम में आस्था रखने वाले हर मनुष्य को यह चौपाई अवश्य स्मरण रखनी चाहिए :

सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे॥

✍️ चिराग़ जैन

वसन्त का मौसम

सर्द हवाओं के प्रकोप से निकलकर, देह जब मंद समीर के स्पर्श से खिल उठती है; तब वसंत घटित होता है। कोहरे की सत्ता में दबी-दुबकी धरती जब रश्मियों के गुनगुने स्पर्श से रोमांचित हो उठती है; तब वसंत घटित होता है। जाड़े का ऊनी बोझा छोड़कर जब बदन, सरसों का तेल मलकर धूप सेंकते हुए मीठी नींद में गोते लगाता है, तब वसंत घटित होता है।
वसंत का आगमन पूरी सृष्टि को संकुचन के श्रम से मुक्त करके विस्तार के आनंद का आमंत्रण देता है। वसंत इस सत्य की सूचना है कि विपत्ति में जो वनस्पति बदरंग होकर बदसूरत दिखने लगती है, समय बदलने पर उसी की रंगत से वसुंधरा सिंगर सकती है।
खेतों में फूली हुई सरसों, बाग में महक उठी गुलदाउदी, क्यारियों में मोती की चादर बनकर पसरी हुई जिप्सी ग्रास, अपनी नाज़ुक डालियों पर इतराकर खिल उठा गेंदा, हज़ारों रंगों की कल्पनाएँ साकार करता ट्यूलिप, पीले और हरे रंग के लाजवाब संयोजन से खिल उठे डूरंटा व फ़ाइकस और न जाने कितने ही पौधे उतावले हो होकर वसुंधरा को सुन्दर बनाने पर तुल जाते हैं। लाल चम्पा उचककर गुलाब की पाँखुरियों को चिढ़ाने लगती है। उधर गुडहल हाथ बढ़ाकर अपने होने का शोर मचाने लगता है। गुलाब अपनी राजसी ठसक के साथ अपने कंटीले सुरक्षाचक्र में बैठा हुआ कनखियों से इन सबको देखता रहता है।
खेत गोभी के गुलदस्ते से सज उठते हैं और मटर की झालरों से क्यारियों की किस्मत सँवर जाती है। मेंढ़ पर गाजर, मूली, चुकंदर, शलगम, की पत्तियाँ बाँहें खोलकर सूर्य की किरणों का स्वागत करती दिखाई देती हैं। उधर आम, महुआ, चीकू और लोकाट सरीखे वृक्ष सृष्टि को सर्दी की भीषण तपस्या का फल देने की तैयारी करने लगते हैं। इस ऋतु में बादल आकाश से ग़ायब नहीं होते, बल्कि छितराकर आकाश मे वंदनवार की तरह लटक जाते हैं।
सूर्य की किरणों से पहाड़ी बर्फ पिघलती है तो नदियों के संगीत में हर्ष और उल्लास के साज जुड़ जाते हैं। मौसम खुलता है तो मन भी अपनी एक-एक पाँखुरी खोल देता है। किसी बगीचे की तरह ही मन में भी प्रेम और भोग के फूल खिल उठते हैं। फूलों के आभूषण से सजा अनंग, अंग-अंग में लास्य कर उठता है। हरियाली देखकर आँखों की चमक बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, पाँचों इंद्रियों की क्षुधापूर्ति के लिए इस ऋतु में रस उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि रसराज और ऋतुराज का संयोग सहज लगता है। वाणी रसराज से विभूषित होती है और धरती ऋतुराज से। यहाँ तक कि धवला माँ सरस्वती भी पीले गेंदे और नीले अपराजिता को स्वीकार कर लेती हैं। एक ओर वीणा के तार छिड़ जाते हैं तो दूसरी ओर बाँसुरी बज उठती है। योग और भोग का सुंदर समागम है वसंत। श्वेत और पीत का अलौकिक संयोग है वसंत। वसंत इस सत्य का उद्घाटन है कि सृष्टि का कोई भी तत्व यदि संतुलन की मर्यादा न छोड़े तो वह जगत् के शृंगार का कारण बन जाता है।
सो आइये, अवचेतन को अध्यात्म की देहरी पर विराजित करके, चेतना की पाँचों इंद्रियों को वसंत का भोग करने का आमंत्रण दें। स्पर्शन को धूप का गुनगुना एहसास दें। रसना को खेतों की ताज़गी भोगने दें। घ्राण को प्रकृति की गंध का भोग लगाएं। चक्षु को बगीचे के रंगों का सुख दें और कर्ण को पंछियों के कलरव से लेकर नदियों की कलकल तक का आनंद उठाने दें।

✍️ चिराग़ जैन

भविष्य का अनुमान

किसी समाज के वर्तमान का आकलन उसके वैभव से किया जाता है, किंतु उसके भविष्य का अनुमान केवल उसके विवेक से लगाया जा सकता है। घटनाएँ और दुर्घटनाएं यदि समाज के लिए कुछ दिन तक न्यूज बुलेटिन की स्टोरी भर बनकर रह जाएं और उनसे बेहतर समाज के निर्माण का कोई विमर्श नहीं उपजे तो समझ लीजिए कि हमारी पीढ़ियां ख़तरे में हैं।
यह वर्ष प्रारंभ हुआ और देश की राजधानी में एक जीती-जागती लड़की सड़कों पर घसीटकर मार दी गई। पूस की सर्द रात में 12 किलोमीटर तक किसी इंसानी जिस्म के खुरदरी सड़क पर घिसटने की कल्पना से लोगों की रूह काँप गई।
सुबह होने से पहले लड़की दुनिया से जा चुकी थी और ख़बर दुनिया पर छा चुकी थी। अब शुरू हुआ हेडलाइंस और पब्लिक सिम्पैथी का घिनौना खेल।
न्यू ईयर के जश्न के तुरंत बाद मीडिया को एक सेंसेशनल स्टोरी मिली तो ‘पुलिस की लापरवाही’; ‘स्त्री सुरक्षा’ और बलात्कार जैसे शब्दों के साथ रिपोर्टिंग की जाने लगी। चूँकि ख़बर में पुलिस को विलेन बनाना था, इसलिए हर ख़बर में लड़की को ‘पीड़िता’ कहकर संबोधित किया जा रहा था।
दस बजते-बजते राजनीति गरमा गई और आरोपियों में से एक का भाजपा कनेक्शन भुनाने के लिए आम आदमी पार्टी एक्टिव हो गई। उधर दिल्ली के एलजी और केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने घटना पर अफसोस ज़ाहिर करते हुए दिल्ली पुलिस से घटना की अपडेट लेनी शुरू कर दी।
दो दिन तक मीडिया मृतका की माँ के रोते-बिलखते फुटेज, सौरभ भारद्वाज की प्रेस कॉन्फ्रेंस, दिल्ली पुलिस के उच्च अधिकारियों की प्रेस स्टेटमेंट और थाने के बाहर जमा भीड़ की बाइट चलाकर काम चलाता रहा। उस रात के चश्मदीदों की क्लिप भी हर तीन-चार मिनिट में रिपीट होती रही, जिससे यह सिद्ध हो रहा था कि दिल्ली पुलिस नाकारा है। कुछ बड़े चैनल्स ने स्कूटी से टक्कर और गाड़ी के नीचे फंसी लड़की की एनीमेशन भी चलाई। एक डिवाइडर से यू टर्न लेती गाड़ी की सीसीटीवी फुटेज भी सैंकड़ों बार चलाई गई। बारह किलोमीटर तक घिसटकर मर चुकी लड़की को मीडिया दो दिन तक घसीटता रहा।
अदालत में सुनवाई होने से पहले ही आरोपियों को अपराधी घोषित कर दिया गया। पुलिस की चार्जशीट का तो पता नहीं लेकिन जल्दबाज़ रिपोर्टर्स ने उन्हें बलात्कारी कहने में देर नहीं लगाई।
लड़की की पहचान, उसके परिवार की पहचान, उसकी सहेली की पहचान सब कुछ मीडिया ने सार्वजानिक कर दी और विधि-पत्रकारिता के नियम-कायदे मुँह बाये देखते रह गए।
उधर एक आरोपी का भाजपा से सम्बंध होने के कारण भाजपा इस पूरे मुद्दे पर बैकफुट पर रही।
दो दिन बाद सुधीर चौधरी ने अपने ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में यह दावा किया कि कंझावला कांड में एक नया एंगल सामने आया है कि उस रात दुर्घटना में मरने वाली लड़की के साथ एक सहेली भी थी। सुधीर चौधरी ने यह भी बताया कि उस सहेली से उनके चैनल ने एक्सक्लूसिव बातचीत करके पता चला लिया है कि मृतका उस रात होटल के कमरे से शराब पीकर निकली थी और उसका उसकी सहेली से झगड़ा भी हुआ। होटल के स्टाफ से यह भी पता चल गया कि वह लड़की पहले भी इस होटल में आती रही है, कि उस लड़की से मिलने (थोड़ी देर के लिए) उसके पुरुष मित्र भी आए थे…!
इसके बाद अचानक सोशल मीडिया के ग्रुप्स में कुछ ऐसा पोस्ट किया जाने लगा जिससे ख़बर के प्रति लोगों का नज़रिया एकदम बदल गया। जो बिलखती माँ अपनी बेटी के हत्यारों को मृत्युदंड देने की मांग कर रही थी, वही अब अपनी मरी हुई बेटी को छीछालेदर से बचाने की कोशिश करती मिली।
मेरा प्रश्न यह है कि हम आख़िर कब तक इस प्रचार तंत्र के हाथों की कठपुतली बने रहेंगे? नीचे जो प्रश्न मैं पूछ रहा हूँ उनको गंभीरता से सोचकर अपने आप से उनके उत्तर पूछने का प्रयास करना :-
1. अगर वह लड़की किसी तथाकथित अपराध में लिप्त रही भी हो (जो सुनिश्चित करना न्यायालय का कार्य है) तो भी क्या उसे मार देने की छूट किसी अन्य नागरिक को दे देनी चाहिए?
2. अगर वह नशे की हालत में किसी गाड़ी से टकरा ही गयी थी, तो भी क्या उसे 12 किलोमीटर तक सड़क पर घसीटना जस्टीफाई किया जा सकता है?
3. रात के समय यदि कोई लड़की सड़क पर किसी भी स्थिति में मृत पाई जाए, तो क्या उस स्थिति में यह मान लेना चाहिए कि उसका बलात्कार ही हुआ होगा?
4. इस दुर्घटना के बाद क्या हमारे समाज को इस बात पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए कि देर रात तक बाहर रहने वाले लोगों की गतिविधियों पर कम से कम पारिवारिक अंकुश की पहल की जाए।
5. स्कूटी पर जा रही स्त्री हो या गाड़ी में घूम रहे पुरुष; दोनों ही के लिए भीषण सर्दी की रात में सुनसान सड़कों पर निकलना असुरक्षित क्यों नहीं है?
6. पुलिस की मुस्तैदी और कार्यशैली पर पूरी व्यवस्था को गंभीरता से पुनर्विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
7. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिसकर्मी से शिकायत करने पर यदि पुलिसवाला उल्टे आपको ही डाँटकर भगा दे तो आप कुछ नहीं कर पाते।
8. क्या यह सत्य नहीं कि पुलिस अपनी जनता से सुरक्षाकर्मी जैसा नहीं अपितु तानाशाह जैसा व्यावहार करती है।
9. क्या यह सत्य नहीं है कि आरोपियों में एक व्यक्ति के भाजपा सम्बंध से भाजपा विरोधियों को ‘अवसर’ मिल गया?
10. क्या यह सत्य नहीं की लड़की की सहेली की गवाही से भाजपा समर्थकों को ‘अवसर’ मिल गया?
11. क्या यह सत्य नहीं कि हमें हमारी सड़कों को दिन-रात सुरक्षित और निर्भय बनाए रखने के प्रयासों को वरीयता देनी चाहिए।
12. क्या यह आवश्यक नहीं कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को मनुष्य होने की न्यूनतम अर्हता का ध्यान रखना चाहिए!
मेरा विनम्र अनुरोध है कि इस पोस्ट पर कोई भी टिप्पणी करने से पहले यह अच्छी तरह जाँच लें कि आप जो लिखने जा रहे है वह खुले हुए ज़ख़्म पर मरहम लगाने जैसा है, यदि आपकी उंगली ने रिसाव के किसी भी संवेदनशील तन्तु को छू दिया तो घाव की टीस, चित्कार बनकर मनुष्यता के कान फोड़ देगी!

✍️ चिराग़ जैन

डॉ विष्णु सक्सेना

बात उस दौर की है, जब हिन्दी कवि सम्मेलनों के समापन काव्य पाठ की डोर पर से गीतकारों की गिरफ्त ढीली पड़ रही थी। राजनैतिक परिप्रेक्ष्य और सामरिक परिदृश्य ने तनाव इतना बढ़ा दिया था कि मंच के एक कोने में बैठने वाला हास्य-कवि जनता को आकृष्ट करने लगा था। कवि सम्मेलन बदलकर ‘हास्य कवि सम्मेलन’ होने लगे थे।
घनाक्षरी और दोहे जैसे छन्द हास्य के परिधान पहन कर इतराने लगे थे। हास्य गीत, पैरोडी, बतरस, चुटकियां और चुटकुले लोकप्रियता के सिंहासन पर विराजमान थे। भीगी कोरों और गुलाबी मुस्कानों के स्थान पर ‘ठहाकों’ ने श्रोता दीर्घा को आलिंगनबद्ध कर लिया था।
यद्यपि गीत के अनेक पुराने अलमबरदार मंच पर अभी भी उपस्थित थे किंतु हास्य की प्रभावशाली सत्ता के कारण मंच पर आनेवाले नए रंगरूटों का आकर्षण, गीत के स्थान पर हास्य की ओर अधिक था।
इस स्थिति में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक नौजवान अपनी आवाज़ में खनक और संस्कारों में बृज का परिवेश लेकर मंच पर चढ़ा। इस युवा की भाषा इतनी सरल थी कि ठहाके के मोहपाश में बंधे हुए श्रोता भी शृंगार के इस स्वर को अनसुना न कर सके। श्याम रंग में रंगा यह गीतकार, अपना इकहरा बदन लिए जब माइक तक आता था, तो समान्य देहयष्टि के कारण बहुत समान्य ही प्रतीत होता था किंतु जैसे ही अपनी सधी हुई आवाज़ में डुबोकर शब्दों का उच्चारण करता था तो श्रोता दीर्घा को सम्मोहित कर लेता था।
बीच में ऐसे भी दौर आए जब कारगिल युद्ध के समय लोगों ने अपने मूल स्वभाव को छोड़कर वीर रस लिखना शुरू कर दिया। लेकिन डॉ विष्णु सक्सेना ने हर दौर में, हर हाल में बस प्रेम ही गाया।
इस एकाग्र साधना के परिणामस्वरूप आज कवि-सम्मेलन जगत् में उनका न केवल अलग मुकाम है, अपितु विशेष पहचान भी है। डॉ विष्णु सक्सेना उन अंगुलगणित कवियों में शुमार हैं, जिनका अपना नैसर्गिक फैन्स क्लब है।
गीत और सृजन के प्रति उनकी निष्ठा तथा अनवरत सक्रियता उन्हें अनुकरणीय बनाती है। लगभग चार दशक के उनके कवि सम्मेलनीय जीवन मे कई खरगोश उन्हें चुनौती देते हुए दौड़ गए, किंतु अपने छोटे-छोटे कदमों से धरती नापते हुए वे लगातार चल रहे हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि कौन इस ट्रैक पर उनसे आगे दौड़ रहा है और कौन उन्हें ओवरटेक कर रहा है!
तकनीक के बदलते चेहरे पर अपनी साधना का तिलक लगाने के लिए वे आजकल अनवरत कार्य कर रहे हैं। कवि-सम्मेलन की यात्राओं के बावजूद निरंतर सृजनरत रहकर कला की पूंजी को समृद्ध करनेवाले चुनिंदा लोगों में से एक डॉ विष्णु सक्सेना का आज जन्मदिन है।
ईश्वर उनकी एकाग्र साधना में त्राटक सिद्ध करे! सृजन की ईमानदार साधना उनकी सकारात्मकता के तंतुओं को पुष्ट करे! प्रेम की सुगंध का आवरण उन्हें कपट की खरपतवार से अछूता रखे -इसी शुभेच्छा के साथ उन्हें जन्मदिन की lovely बधाइयाँ।

✍️ चिराग़ जैन

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