Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
बचपन में पाठ्यक्रम में एक रेखाचित्र पढ़ा था- ‘गौरा’। इसे पढ़कर गाय के प्रति तो मन आकृष्ट हुआ ही; महादेवी जी के प्रति भी मन प्रेम से भर उठा। फिर तो मैंने खोज-खोजकर महादेवी जी को पढ़ना शुरू कर दिया। उनका गद्य मेरे लिए प्रेरणास्रोत बनता गया और उनका पद्य मेरे संवेदी तंतुओं की ख़ुराक़ बन गया।
महादेवी जी से मेरा प्रथम परिचय शब्दों के माध्यम से ही हुआ था। कई वर्ष तक उन्हें पढ़ता रहा किन्तु कभी उन्हें देखने की उत्कंठा उत्पन्न नहीं हुई। हाँ, ज्यों-ज्यों उन्हें पढ़ता; उनके प्रति प्रेम और प्रगाढ़ होता जाता था।
मैंने उन्हें पढ़-पढ़कर उनकी एक छवि अपने मन में बना ली थी, जिसमें सिर पर पल्ला किये एक सम्भ्रांत महिला का आकार-सा तो था किंतु चेहरे के नैन-नक्श की कोई मूर्ति नहीं थी। यूँ कहें कि मन इतना जुड़ गया था कि चेहरे की कभी आवश्यकता ही महसूस न हुई। उन दिनों गूगल नहीं था, इसलिए किसी साहित्यकार का चित्र देखना इतना सरल नहीं था, जितना अब है।
बहुत वर्ष बाद, एक दिन पुस्तक मेले में महादेवी जी की तस्वीर एक एलबम में देखी। देखकर मुझे कोई आश्चर्य न हुआ। बल्कि अनुभूति हुई कि दैव ने सौंदर्य के एक-एक तत्व का समावेश उनके मन के निर्माण में कर दिया, अतएव देहयष्टि के लिए सौंदर्य का कोष बचा ही न रहा होगा।
उस दिन महादेवी जी की तस्वीर को बहुत देर तक निहारा और उनकी तमाम रचनाओं को उस मुखाकृति के साथ पुनः अनुभूत किया… उस दिन से मुझे महादेवी जी से और अधिक प्रेम हो गया।
एक दिन श्री रामनिवास जाजू जी की पुस्तक डिज़ाइन करते समय मोहन गुप्त जी ने मुझे महादेवी जी का खिलखिलाता हुआ चित्र दिया। उस दिन मैंने महीयसी को पहली बार खिलखिलाते हुए देखा… मैं और अधिक प्रेम से भर उठा। उनकी खिलखिलाहट में उनकी पीड़ा और भव्य हो उठी थी। वह चित्र आज भी मेरे कोष में सुरक्षित है और उस चित्र की खिलखिलाहट आज भी पीड़ा की उस साकार मूर्ति के प्रति मुझे सम्मोहित कर देती है।
आज सब महादेवी जी के विषय में कुछ-कुछ लिख रहे हैं। मेरा भी मन हुआ… तो उनके प्रति अपनी मनोदशा यथावत लिख डाली। और हाँ, यह लिखते हुए मैं महादेवी जी के प्रति और भी अधिक प्रेम से भर उठा हूँ!
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़।
होली के दिन आपमें कृष्ण साकार होते हैं। मैं बचपन से कृष्ण के दैहिक वर्ण का विचार करता रहा हूँ। सुविधा के लिए साँवरे के विग्रह को काले या नीले रंग से दिखाने की परम्परा है किन्तु मैंने अपने आसपास इतना काला या ऐसा नीला रंग किसी मनुष्य की काया का देखा नहीं है।फिर एक दिन होली खेलते समय मुझे अनुभूत हुआ कि गुलाबी, बैंगनी, हरा, लाल, पीला, नीला और भगवा रंग जब स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे में समाहित हो जाते हैं तो इस सम्मिलन से जो अनोखा सा रंग चढ़ता है, वही साँवरे का रंग है। जिसके लिए रंग शास्त्रियों ने कोई नाम तय नहीं किया है। यही साँवरा है। यही कन्हैया है। यही ब्रज का रंग है। यही फागुन का रंग है।
नियम और नीतियों ने नाप-तोलकर जिस मनुष्य को सभ्यता के शोकेस में सजा रखा है, उसको कुछ क्षण के लिए मन से जीने का अवसर देता है, होली का त्योहार। विवशता के रिंग मास्टर ने जिस शेर को सर्कस का जोकर बनाकर छोड़ दिया है, उसे एक बार पूरे सिंहत्व के साथ जंगल में दहाड़ने का मौक़ा देता है होली का पर्व।
नीतियों के इशारे पर किसी मशीन की तरह जिये जा रहे इंसान को एक बार उच्छृंखल होने का निमंत्रण देता है होली का दिन। अपने भीतर घुट रहे पागलपन को बाहर निकाल फेंकने का महोत्सव है होली।
हज़ारों वर्ष तक सभ्यता लपेटे घूम रहे व्यवस्थितों को देखकर शनैः-शनैः हमारा पूरा समाज सभ्यता लपेटकर घूमने लगा। जो पदार्थ कम उपलब्ध हो उसकी क़ीमत बढ़ने लगती है। प्राकृतिक रूप से जी रहे मानव ने जब करीने के परिधान से सज्ज मानव देखे होंगे तो उन जैसा बनने की होड़ लग गई होगी। यह होड़ बहुत ख़तरनाक होती है। इसका परिणाम यह हुआ कि पूरा समाज सभ्यता ओढ़कर घूमने लगा।
मानव इस हद्द तक सभ्य हो गया कि सभ्यता से ऊब होने लगी। इसलिए ज्यों ही होली पर कोई शंकर जी का बाराती बना बेलौस दिखाई देता है तो हम तुरंत उसकी देखादेखी अपना सभ्यता का आवरण उतार फेंकते हैं।
सभ्य से सभ्य मनुष्य भी जिस क्षण झिझक का खोल तोड़ता है ठीक उसी क्षण वह पूर्णतया प्राकृतिक हो उठता है। शादी-ब्याह में जब नाचने का अवसर आता है तो सभ्यता की झिझक से बंधे लोग किनारे खड़े तरसते रहते हैं और झिझक छोड़कर सहज हुए मनुष्य बेतरतीब नाचने लगते हैं। इस झिझक ने हमें अनेक आनन्दों से वंचित किया है।
होली इस झिझक के खोल से बाहर निकलने का महोत्सव है। चुटकी, रंगबाज़ी, हुड़दंग, ठिठोली, छेड़छाड़, मज़ाक़, गाली-गलौज… ये सब सभ्यता और नैतिकता के व्यामोह को ग़ायब कर देते हैं। हाइजीन-कॉन्शियस लोग जब रंगे हुए हाथों और पुते हुए दाँतों से गुंजिया खाते हैं तो मैनर्स का भूत किसी फटे हुए गुब्बारे-सा ज़मीन पर लोटता दिखाई देता है।
अनावश्यक संबोधनों पर अपनत्व की गालियाँ हावी होने लगती हैं। कल्फ़ लगे कपड़े पहननकर एटिकेट्स के साथ साइलेंटली चलने-फिरने वाले पुतले यकायक भीगे, फटे और रंगे हुए कपड़ों में नाचते हुए सड़कों पर जीवंत हो उठते हैं।
मोबाइल के स्पीकर को होंठों से चिपकाकर न्यूनतम स्वर में बात करने वाले जेंटलमैन अपने गले को लाउडस्पीकर बनाकर जब हो-हल्ला करते हैं तो आवाज़ अपना वास्तविक अर्थ ग्रहण करती है।
होली का यह अवसर हँसने का अवसर होता है। जो दिखे, उस पर हँसी छूट जाती है। और आनन्द यह कि जब हम उस पर हँसने के लिए दाँत निकालते हैं तो हमारे दाँतों की शेड देखकर वह हम पर हँसने लगता है। उसे स्वयं पर हँसते देखकर हम और हँसते हैं।
अपमान, उपहास, बेइज़्ज़ती, इन्सल्ट और ईगो जैसे शब्द इस समय बेमआनी हो जाते हैं। नियमों की क़ैद से मुक्त होकर पूरा वातावरण ठहाके लगाने लगता है। छद्म शालीनता रंगों की बरसात में धुल जाती है। हवा में उड़ता गुलाल बालों के बीच विराजने लगता है तो सिर पर चढ़ चुका ‘लोग क्या कहेंगे’ का भय भाग जाता है।
कदाचित भारत के अतिरिक्त भी कुछ समाज, मनुष्य के भीतर के पागलपन को बाहर निकालने के लिए कोई आयोजन करते हैं; किन्तु संबंधों के भीतर पनप गयी कुंठाओं को उखाड़ फेंकने के लिए होली से बेहतर कोई अन्य अवसर किसी के पास नहीं है।
अगर आपने अब तक होली से परहेज किया है और आज तक स्वयं को इस उत्सव-धारा से अछूता रखा है तो मुट्ठी में अबीर लेकर अपनी ही उंगलियों से ख़ुद के गालों पर लगा लो… आपको ख़ुद से मुहब्बत हो जाएगी।
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Poetry
होली के हुड़दंग में
रंग में भंग पड़ गयी
इधर ठण्डाई गले से नीचे उतरी
उधर भांग सिर पर चढ़ गई
भोले की बूटी ने ऐसा झुमाया
कि हाथ को लात
और सिर को पैर समझ बैठा
चूहा भी ख़ुद को शेर समझ बैठा
नशे की झोंक में लफड़ा बड़ा हो गया
पत्नी के सामने तनकर खड़ा हो गया
पत्नी ने आँखें दिखाई
तो डरने की बजाय अकड़ने लगा भाई
तू क्या समझती है
तेरी आँखों से डर जाऊंगा
तू जो कहेगी, वो कर जाऊंगा
ख़ुद को बड़ी होशियार समझती है
मुझे अनाड़ी, मूरख, गँवार समझती है
अरे, तेरी बेवकूफियों को हज़ारों बार इग्नोर कर चुका हूँ
क्योंकि तुझसे शादी करके
सबसे बड़ी बेवकूफी तो मैं ख़ुद कर चुका हूँ
जब नशा उतरा
तो उसकी दुनिया का पूरा भूगोल डोल गया
लेकिन मन ही मन ख़ुश था
कि नशे में ही सही
एक बार तो पत्नी से सच बोल गया।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जीत और हार के शोर-शराबे के बाद यकायक राजनैतिक गलियारों में सन्नाटा पसर गया है। जीतनेवाले इतने स्पष्ट बहुमत से जीते हैं कि मीडिया के पोस्ट इलेक्शन अलायंस और हॉर्स ट्रेडिंग जैसे कैप्सूल धरे के धरे रह गये हैं।
यही स्पष्ट बहुमत वर्तमान लोकतंत्र की दरकार है। आरोप-प्रत्यारोप जैसे तमाम हो-हल्ले पर चुनाव परिणाम ने पूर्णविराम लगा दिया है।
इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि अब जीतनेवाले सरकार चलाएँ और बाक़ी सबकी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो गयी। जो नहीं जीत सके हैं, उनका उत्तरदायित्व अब और अधिक हो गया है। विपक्ष लोकतंत्र को आकार देनेवाली हथेली है। यदि विपक्ष अपना काम ठीक से न करे तो सत्ता के चाक पर घूमती सरकार बेतरतीब आकार लेने लगेगी।
वर्तमान राजनैतिक चर्चाओं में विपक्ष को सरकार का शत्रु मानने की परंपरा चल निकली है, जबकि विपक्ष लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग होते हुए प्रकारांतर से सरकार का हिस्सा ही है।
विपक्ष को यह समझना होगा कि उसकी भूमिका चाक पर घूमती मिट्टी को लोई को आवश्यक छुअन और दबाव से सार्थक आकार देने तक सीमित है। यदि हथेली मिट्टी की लोई को हटाकर स्वयं चाक पर घूमने का प्रयास करेगी तो स्वयं भी घायल होगी और भविष्य के निर्माण को भी ध्वस्त कर देगी।
इसी प्रकार सरकार को भी यह समझना होगा कि तेज़ गति से घूमती लोई पर यदि कोई अंगुली का दबाव महसूस होने लगा है तो इसका अर्थ है कि अब तंत्र के एक निश्चित आकार में ढलने का समय आ गया है।
हथेली मिट्टी से स्वयं को रिप्लेस न करे और मिट्टी हथेली की छुअन से परहेज न करे तो लोकतंत्र के चाक की गति निर्माण का कारण बन जाएगी।
जनता ने विधायिका की नियुक्ति कर दी है। अब इसके बाद जनता का भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई, आपिया या अकाली होना समीचीन नहीं है। अब जनता को भी जनता होकर हर जीते हुए प्रत्याशी को अपना प्रतिनिधि मानकर उसे तंत्र के प्रचालन का अधिकार देना होगा। अब हर जीते हुए प्रत्याशी को भी जनता को ‘पाँच वर्ष के लिए अनावश्यक’ समझने की बजाय सर्वाेच्च सत्ता समझते हुए प्रत्येक निर्णय से पूर्व इस सर्वाेच्च सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व बोध से युक्त रहना होगा।
-सत्ता को यह मानना होगा कि सवाल पूछनेवाला हर व्यक्ति सरकार का विरोधी नहीं है।
-विपक्ष को यह मानना होगा कि सरकार के प्रत्येक निर्णय का विरोध आवश्यक नहीं है।
-जनता को यह जानना होगा कि विपक्ष के अभाव में कोई भी सत्ता जनता की बात नहीं सुन सकती।
-मीडिया को यह समझना होगा कि हर बुलेटिन में शोर भर देने का नाम पत्रकारिता नहीं है।
-साहित्य को यह स्वीकारना होगा कि नारे, जयकारे, आरती, चालीसा और गाली को कभी साहित्य नहीं कहा जाएगा।
© चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक
याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक
जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक
लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक
सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक
✍️ चिराग़ जैन