Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
चीखने से
शोर बढ़ता है
सम्बन्ध नहीं।
सुकून की खटिया
बुनी जाती है
सहजता की बाण से;
इसमें प्रयास की गाँठें हों
तो मुक्त नहीं हो सकती नींद
चुभन से!
जताना
और बताना
व्यापार में होना चाहिए
व्यवहार में नहीं।
और प्यार में…
…वहाँ तो
आँखें मिलते ही
फिफ्थ गीयर लग जाता है
धड़कनों में!
ओंठ व्यस्त रहते हैं
कँपकँपाने और मुस्कुराने में।
शब्द और आवाज़
केवल शोर हैं
प्यार की बातचीत में।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सरकार सदन में चिल्लाती है कि हम जन-कल्याण करेंगे। विपक्ष भी सदन में चिल्लाता है कि हम जन-कल्याण करवाएंगे। दोनों तरफ़ की आवाज़ें ऊँची होती जाती हैं। शोर-शराबा बढ़ता है तो स्पीकर सदन की कार्रवाई स्थगित कर देते हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी आवाज़ लिए सदन के बाहर निकल आते हैं। उन्हें बाहर आता देखकर मीडिया उनके मुँह पर माइक लगा देता है।
पक्ष के प्रतिनिधि माइक देखते ही चिल्लाने लगते हैं। उनको चिल्लाते देखकर विपक्ष भी मीडिया के एकाध माइक लपककर चिल्लाने लगता है। दोनों एक-दूसरे पर अनुशासनहीनता, संवेदनहीनता और जनविरोधी होने का आरोप लगाते हैं। सरकार बताती है कि विपक्ष सदन नहीं चलने दे रहा। विपक्ष बताता है कि सरकार सदन चलाना नहीं चाहती। ख़ूब शोर-शराबा होता है।
दोनों के जन-कल्याण के दावों को सुनकर स्पीकर महोदय दोनों को सदन में बुला लेते हैं। सदन की कार्यवाही शुरू होती है। फिर दोनों तरफ़ के लोग हंगामा करते हैं। फिर सदन स्थगित होता है। फिर मीडिया बाइट लेता है। फिर सदन शुरू होता है… फिर स्थगन… फिर मीडिया… फिर अंदर… फिर बाहर…!
पूरा सत्र बीत जाता है… पूरा कार्यकाल बीत जाता है… पूरे दशक बीत जाते हैं… पूरे युग बीत जाते हैं… विपक्ष सरकार बन जाता है… सरकार विपक्ष में जा बैठती है… अंदर-बाहर के इस खेल में राजनीति का खेत जुतता रहता है… नयी-नयी पार्टियाँ उग आती हैं… कहीं पीपल की डालियाँ कीकरों की गलबहियाँ कर लेती हैं तो कहीं बरगद की कोई डाल अपनी जड़ें जमाकर ख़ुद को बरगद घोषित कर देती हैं… अंदर-बाहर का कार्यक्रम जारी रहता है!
सरकार कहती रहती है कि हम जनकल्याण करके रहेंगे… विपक्ष कहता रहता है तुम्हें जनकल्याण करना ही होगा। जनकल्याण संसद के खम्भों से टेक लगाकर खड़ा-खड़ा ख़ुद स्तम्भ बन चुका है और जनता जब रायसीना के आसपास से निकलती है तो लाल खंभों पर खड़ी एक इमारत की ओर टकटकी लगाकर देखती रहती है। उस समय उसे यह याद ही नहीं रहता कि जितनी देर वह संसद की ओर निहार रही थी, उतनी देर वह गोल-गोल घूम रही थी।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्ण मुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जावे। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्णमुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना समस्त चातुर्य राजा को ख़ुश करने में झोंक दिया। बुद्धिमान हुए, तो बुद्धिमत्ता राजा को ख़ुश करने में जुट गयी।
मतलब यह कि कला, विद्वत्ता, चातुर्य और बुद्धिमत्ता; राजा से स्वर्णमुद्राएँ पाने की होड़ में व्यस्त हो गयीं और राजा इन सबको काम पर लगाकर शासन में अपनी मनमानी करके ख़ुश रहा।
इन्हीं कहानियों ने हमें यह भी बताया कि नगर की समस्त सुंदर कन्याओं का अंतिम उद्देश्य यही है कि राजकुमार उनके सौंदर्य पर मोहित हो जाये। इसलिए आज भी सत्ताधीशों के राजकुँवर सुन्दर कन्याओं पर आकृष्ट होकर, उनका जीवन धन्य करते पकड़े जाते हैं।
इन कहानियों के अनुसार राजा के दो ही काम थे- प्रथम, अपने मंत्रियों से ऊल-जलूल सवाल पूछना और द्वितीय, आखेट करना। इन दोनों से जो समय बचता था, वह रूठी रानी को मनाने में व्यतीत हो जाता था।
मंत्रियों के भी दो ही काम थे। या तो वे सबसे होनहार मंत्री से ईर्ष्या करने में व्यस्त रहते थे या फिर राजा के बेसिरपैर के टास्क पूरे करने में लगे रहते थे। इन दोनों से चिढ़कर ही वे अक्सर राजा को शिकार के समय जंगल में अकेला छोड़कर जानबूझकर भटक जाते थे। लेकिन शिकार में भटकने के बावजूद बिना जीपीएस के ही राजा भटकता हुआ अपने महल पहुँच जाता था।
राजकुमारियाँ सखियों के साथ जलक्रीड़ा और वनभोज (पिकनिक) में व्यस्त रहती थीं। जहाँ कोई भूत-प्रेत या राजकुमार उनके रूप-लावण्य पर मोहित होने पहुँच ही जाता था। (इस सीन में कभी कोई जंगली जानवर नहीं आ सका, क्योंकि जंगली जानवर प्रोटोकॉल के बाहर कभी नहीं जाते।) सो, राजकुमार की एंट्री होते ही राजकुमारी उसके सफेद घोड़े पर सवार होकर दूरदेश चली जाती थी। अक्सर कहानी यहाँ ख़त्म हो जाती थी। राजकुमारी को दूरदेश ले जाकर राजकुमार ने उससे क्या व्यवहार किया; यह हमें किसी कहानी ने नहीं बताया।
जनता इन कहानियों में कभी-कभार ही प्रकट होती थी। उसका उपयोग यही था कि वह कोई ‘समस्या’ लेकर लड़ते-झगड़ते राजदरबार में पहुँचे और राजा के शेष मंत्रियों की ईर्ष्या को धता बताकर सबसे चतुर मंत्री उनके झगड़े का कोई भी ऊल-जलूल समाधान देकर राजा को ख़ुश कर दे।
राजा के ख़ुश होते ही कहानी ख़त्म हो जाती है। फिर जनता की समस्या का समाधान जनता को भाये या न भाये- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। जनता का कहानी में कोई रोल है भी तो उससे यही पता चलता है कि जनता या तो कोई ठग है, जो अपनी चतुराई से राजदरबार का हिस्सा बन जाता है। या फिर कोई निर्धन ब्राह्मण है जिसकी गुणवती कन्या पर मोहित होकर राजा उसका दारिद्र्य दूर कर देता है। या फिर कोई व्यापारी है, जिसकी मिलावटखोरी को राजा के सिपाही पकड़ ही लेते हैं। राजा की सवारी निकलने पर सड़क के दोनों ओर सिर झुकाकर खड़ी भीड़ जनता है। या फिर राजा के कारनामों पर महल के बाहर इकट्ठी होकर राजा का जयजयकार करनेवाला समूह, जनता है।
इन सब संस्कारों को हम इक्कीसवीं सदी तक घसीट लाए हैं। संविधान ने हमें सिंहासन पर बैठा दिया था, लेकिन हमने अपनी आदत के अनुसार अपने लिए एक राजा चुना और उसके महल के बाहर खड़े होकर उसकी जय-जयकार करने लगे।
✍️ चिराग़ जैन
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एक एंकर स्टूडियो में नशा करके ख़बर पढ़ रहा था तो पूरे देश ने उसका मज़ाक़ बनाकर रख दिया। यह सरासर बदतमीज़ी है। ऐसे किसी का मज़ाक़ बनानेवाले समझ लें कि मज़ाक़ बनाने का अधिकार केवल मीडिया के पास है। वह लोकतंत्र, न्यायपालिका, जनभावना, चुनाव प्रक्रिया, राजनीति और यहाँ तक कि किसी की मुर्दनी तक का मज़ाक़ बनाने के लिए स्वतंत्र है।
रिया चक्रवर्ती की निजता, सुशांत राजपूत की आत्महत्या, आर्यन खान की गिरफ्तारी, शशि थरूर की निजी ज़िन्दगी, अभिषेक बच्चन की शादी, सुनील दत्त की शवयात्रा… सबको बेचकर खाने का अधिकार है मीडिया के पास।
कोसी नदी में कब बाढ़ आएगी और क्या तबाही मचाएगी इसको लेकर तीन-चार दिन तक शोर मचता है और फिर अगली ख़बर चलते ही कोसी का गला सूख जाता है। अब टकराएगा तूफान, ऐसे आएगा तूफान, यमुना की बाढ़ में डूब रही है दिल्ली, देश में केवल दो दिन का कोयला बचा है शेष, इतने बजे टकराएगा धूमकेतु, इस तारीख़ को तबाह हो जाएगी धरती… यह सब मज़ाक़ देश के मनोरंजन के लिए थोड़े ही किये जाते हैं। ये तो कवरिंग फायर की तरह चलने वाली ख़बरें हैं जिनकी आड़ में ‘जाने क्या क्या’ जनता की आँख में धूल झोंककर पार कर दिया जाता है।
यह मज़ाक़ देशहित में किया जाता है ताकि देश अनावश्यक तनाव से बचा रहे। इतने राष्ट्रभक्त पत्रकारों का मज़ाक़ उड़ाने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता।
नशा किया तो क्या अपराध हो गया। पहली बात तो यह कि अगले ने दिल्ली या यूपी में शराब पी थी। अगर बिहार या गुजरात में पी होती तब बोलते। तब कह सकते थे कि अपराध हुआ है। आपको भाई का डेडिकेशन ही समझ नहीं आता। इत्ती शराब पीने के बाद भी देश की ऐसी-तैसी करने के इस मौक़े पर भाई लड़खड़ाता हुआ स्टूडियो पहुँचा होगा। फिर सारे स्टाफ के सामने न्यूज़रूम में अपनी छाती ठोककर चिल्लाया होगा- ‘आज बुलेटिन तेरा भाई पढ़ेगा!’
ये होती है अपने काम के प्रति निष्ठा। सारे कांग्रेसी चमचे बेचारे राष्ट्रवादी पत्रकार के पीछे पड़ गए हैं। आर्यन की तरह ड्रग्स तो नहीं ली ना दीपक जी ने। आपने यह तो देख लिया कि वे लड़खड़ाती हुई ज़ुबान से विपिन रावत और वीके सिंह में अंतर नहीं कर पाए… अरे यही तो है सच्चा राष्ट्रवाद। देश का सैनिक हो, केंद्रीय मंत्री हो या फिर सीडीएस ही क्यों न हो… माननीय दीपक जी सबको एक नज़र से देखते हैं। और जो उनके माथा पकड़ने का झूठा प्रचार किया जा रहा है वह दरअस्ल सिर झुकाकर शहीदों को नमन किया जा रहा था। आप कांग्रेसी क्या समझेंगे इस भावना को कि सेल्यूट मारने के लिए दीपक जी ने एक नहीं दोनों हाथ अपने माथे तक उठा लिए और इस प्रक्रिया में उन्हें जैसे ही संस्कृति की याद आई उन्होंने दोनों हाथों से सेल्यूट मारते हुए सिर नीचे झुका लिया था। इसे कहते हैं सैनिकों का सम्मान। तुम क्या जानो इस भावना को।
तुम क्या चाहते हो कि इनकी जगह राहुल गांधी से न्यूज़ पढ़वाई जाए। उसे एक वाक्य तो ठीक से बोलना नहीं आता। उसको न्यूज़ स्टूडियो में बैठा दिया तो वो वहाँ भी कुर्ते की जेब फाड़ लेगा। अरे एहसान फरामोशों। अब से पहले ‘ड्रंक न्यूज़ एंकर’ सर्च करने पर गूगल में एक भी भारतीय चेहरा नहीं दिखता था, अब टॉप पर गूगल सर्च में दीपक जी छाए हुए हैं। राष्ट्र का नाम कितना ऊँचा हुआ है। पता-वता कुछ है नहीं; …चले आए हैं माननीय दीपक जी का मज़ाक़ बनानेवाले।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
‘आज तक में पेश हैं अभी तक की ख़बरें’ से शुरू हुआ ‘न्यूज़ एंकरिंग’ का सफ़र लड़खड़ाती हुई ज़ुबान में माथा पकड़कर ख़बर पढ़ते न्यूज़ एंकर तक पहुँच गया है।
टीवी पर समाचार पढ़नेवाले समाचार वाचक जब भावना शून्य चेहरे, सपाट स्वर, क्लीन्ड शेव, टाई, कोट जैसे सुनिश्चित गेट-अप में समाचार पढ़ते थे, तब दाढ़ी बढ़ाकर, ख़बर की संवेदना के साथ बदलती भाव भंगिमा और स्वर के उतार-चढ़ाव का कौशल प्रयोग करके सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने पत्रकारिता में एक नयी विधा जोड़ दी थी। वे ख़बर को इतनी शिद्दत से महसूस करके पढ़ते थे कि उपहार सिनेमा के अग्निकांड की ख़बर पढ़ते हुए उन्हें हृदयाघात हो गया था। उस रात पत्रकारिता ने संवेदना से हाथ मिलाया था। ये थी ख़बरें आज तक, इंतज़ार कीजिये कल तक…!
…इंतज़ार का वो कल फिर कभी नहीं आया। सुरेन्द्र प्रताप सिंह का यह सूर्यास्त न्यूज़ एंकरिंग की पूरी दुनिया को अंधकार में खड़ा छोड़ गया।
यहाँ से शुरू हुआ वह दौर, जिसने आज न्यूज़ एंकर्स को वीभत्स, अश्लील, असभ्य तथा अमर्यादित बनाकर छोड़ दिया है।
एस पी सिंह की आवाज़ ख़ामोश हुई तो उनके जैसी दाढ़ी बढ़ाकर उन जैसा दिखने का प्रयास करनेवालों ने उनकी तरह बोलने का अभिनय शुरू किया लेकिन मूल संवेदना के अभाव में यह अभिनय बहुत जल्दी ही भौंडा और उबाऊ लगने लगा।
स्वर का जो उतार-चढ़ाव एस पी सिंह के पास था, वह ख़बर की आत्मा से प्राप्त संवेदना से स्वतः उभरता था। लेकिन अंधेरे में खड़े दाढ़ीवान पत्रकारों ने इसे चीख-चिल्लाहट में बदल डाला।
बुलेटिन ‘एक्शन फिल्म’ की तरह रोमांचक बनते गए। टीवी डिबेट में ‘विषय’ के अतिरिक्त सब कुछ दिखने लगा। राजनैतिक दलों ने इन अंधेरे के वासियों को अपनी उंगली थमाई तो ये बेचारे उस उंगली पर झूल गए। अब ये अपने-अपने भाग्य में आई उंगली पर झूलते हुए ख़बर पढ़ने लगे। इस अवस्था में जब ये दल के पक्ष में पींग लेते हैं तो बेहद लिजलिजे दिखने लगते हैं, और जब झूला इनके राजनैतिक आका के विपक्ष में जाता है तो ये असभ्य हो जाते हैं।
पिछले दिनों हमने एक ऐसा भी पत्रकार देखा जिसे उसके राजनैतिक आका ने अपने पक्ष में झूले समेत ज़मीन से आठ-दस फीट ऊपर हवा में टाँक दिया था। और वह वहीं से स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करता हुआ दो-ढाई फीट और उछलता हुआ ख़बरें पढ़ता रहा।
हमने ऐसी भी एंकर्स देखी हैं जो तीन सौ ग्राम लिपिस्टिक और एक धड़ी मेकअप पोतकर अपनी आयु से लगभग दोगुनी आयु के राजनेताओं से पूछती हैं कि ‘तुम होते कौन हो इस देश की राजनीति पर बात करनेवाले?’
अपने बुलेटिन को नम्बर वन बनाने की जुगत में किसी की चरित्र हत्या, किसी के सामाजिक अपमान में इन अंधकार-उलूकों को कोई हिचक नहीं होती। अफ़वाह को ‘ख़बर’ कहकर परोसने में इन्हें कोई संकोच नहीं होता। साम्प्रदायिक विद्वेष को हवा देना इनके बाएँ हाथ का खेल है। किसी की निजता में प्रवेश करने में इन्हें लज्जा नहीं आती। और अब तो देश के सर्वाेच्च सैनिक की श्रद्धांजलि की ख़बर पढ़ने की ललक में मद्यपान कर के स्टूडियो पहुँचने के कीर्तिमान भी स्थापित हो गये हैं। टीआरपी का घपला करते हुए ये पहले ही पकड़े जा चुके हैं। कार्यस्थल पर यौन-आचरण के इनके चैट और वीडियो वायरल होते ही रहते हैं। महानायक के घर के निजी उत्सव की कवरेज के समय इन्हें ‘बाक़ायदा’ वाचडॉग से डॉगवाच होते देखा जा चुका है। न जाने किसके इशारे पर ये पूरी प्रजाति एक साथ किसी ख़बर को टिपर से ही ग़ायब करने को तैयार हो जाती है। स्वार्थ और अवसरवाद की सीमा यहाँ तक है कि इनके साथ के ही किसी पत्रकार के साथ अन्याय हो तो भी ये चुपचाप अपने स्वामी की ओर मुँह उठाए पुंछ-ध्वज फहराते रहते हैं।
पत्रकारिता को पत्रकारिता बनाए रखने का दायित्व केवल पत्रकारों के कंधों पर नहीं है, बल्कि जिन दर्शकों की कृपा से इन भौंडे न्यूज़ बुलेटिन्स को नम्बर वन का खि़ताब मिल जाता है, वे भी इस अपराध में बराबर के भागीदार हैं। लेकिन फिर भी यह प्रश्न तो उठता ही है कि जनता की अभिरुचियों के अनुसार बुलेटिन ‘डिज़ाइन’ करते समय क्या कभी पत्रकारिता की आत्मा नहीं जागती।
…तो साहब, यह प्रश्न बेमआनी है। क्योंकि अगर पत्रकारिता के पास आत्मा होती तो राजनैतिक बेताल, विक्रम के सिर पर चढ़कर कहानी न सुना रहे होते।