Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Unpublished
जिनकी कविताएँ पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है, उन सब युवाओं की पिछले दो-तीन दिन की क़वायद ने बुझती हुई आँखों में नयी रौशनी भर दी है। दिन-रात लगकर ये सब अनजान लोगों की मदद के लिये सबके आगे हाथ फैला रहे हैं।
न खाने का होश है न पीने की चिंता। बस यहाँ ऑक्सीजन, वहाँ इंजेक्शन, वहाँ डोनर, वहाँ प्लाज़्मा और यहाँ तक कि किसी के घर खाना कैसे पहुँचे इसकी भी ज़िम्मेदारी उठा ली है इन मासूम कंधों ने।
इनसे कोई पूछ ही नहीं रहा कि तुम्हारी अपनी तबीयत तो ठीक है ना! जब किसी तक मदद पहुँचाने में सफल हो जाते हैं तो इनके स्टेटस में लिखे शब्द बल्लियों उछलने लगते हैं और जब कहीं निराशा हाथ लग जाती है तो निढाल हो जाते हैं।
कोई छल-कपट नहीं है इनमें। इनके ये प्रयास किसी मन्दिर की आरती और मस्जिद की अज़ान से ज़्यादा पवित्र जान पड़ते हैं। जिसकी मदद की गुहार सुनते हैं, उसका धर्म-जाति, भाषा वगैरा कुछ भी सोचे बिना बस उसके शहर का नाम पढ़ते हैं और धड़ाधड़ सम्पर्क साधने में जुट जाते हैं। ये इस देश का असली जज़्बा है। इन्हें जिसकी सहायता करनी है, मतलब करनी है। उसके लिए डीएम से लेकर सीएम तक जिसका नम्बर मिल जाए, ये धड़ल्ले से उसे फोन खटका देते हैं। ऐसा ही देश सोचा होगा हमारे पुरखों ने।
क़ीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी है लेकिन इस बीमारी के कारण मेरे देश की फुलवारी ने वटवृक्षों को सहारा देना सीख लिया है। इनके हौसले को बनाए रखने में जो मदद हो सके, ज़रूर कीजिये।
इन्हें ध्यान से देखो, हर बालक में एक कन्हैया दिखाई देगा जिसने अपने गोकुल की रक्षा के लिये अपनी नन्हीं उंगली पर गौवर्द्धन उठा लिया है।
इति शिवहरे, ललित तिवारी, रुचि चतुर्वेदी, प्रिंस जैन, दीपाली जैन, पार्थ नवीन, सृष्टि सिंह, प्रियांशु गजेंद्र, भूमिका जैन, सुनील साहिल, अजय अंजाम, अवनीश त्रिपाठी, स्वयं श्रीवास्तव, सुदीप भोला, रामायण धर द्विवेदी, रश्मि शाक्या, कमलेश शर्मा, अनुज त्यागी, नंदिनी श्रीवास्तव, दीपक पारीक, नीर गोरखपुरी, विनोद पाल, दुर्गेश तिवारी, कुमार सागर, पूजा यक्ष, सरगम अग्रवाल, शालिनी सरगम, गौरव चौहान, संदीप शजर, रूपा राजपूत, भावना राठौर, पल्लवी त्रिपाठी, एकता भारती, गोपाल पाण्डे, हिमांशु भावसार और न जाने कितने सारे ऊर्जावान युवा लगातार लोगों के आँसू पोंछने के लिए अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए उपलब्ध हैं।
इन्हें नाम की कोई चाह नहीं है। जिस तक मदद पहुँच जाए, उसके लिए की गयी मदद की गुहार वाली पोस्ट भी ये अपनी वॉल से डिलीट कर देते हैं। कई ऐसे भी हैं जो व्हाट्सएप समूहों में लगातार जुटकर लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन उनका नम्बर मेरे पास दर्ज नहीं है इसलिए उनका नाम तक मैं नहीं जानता।
सचमुच, ये ऐसे मदद कर रहे हैं जैसे मदद की जानी चाहिये। ईश्वर मेरे जीवन के सारे पुण्य इन सब पर बरसा दे!
चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Unpublished
टूटने से काम नहीं चलेगा। व्यवस्था में बैठे हुए लोग तुम्हें इग्नोर करेंगे, लेकिन किसी भी स्थिति में किसी की मदद के लिये ‘प्रयास’ करने से मत चूकना। दस जगह फोन करोगे तो नौ जगह से कोई उत्तर नहीं आएगा, लेकिन दसवीं जगह भी कोशिश ज़रूर करना।
बस एक बात ध्यान रखना कि जो आपके पास मदद मांगने आया है वह आप पर विश्वास कर रहा है। आप भगवान नहीं हैं कि उसकी मदद कर ही देंगे, लेकिन आप इंसान ज़रूर बने रहना कि कोशिश में कोई कमी न रहे।
सोशल मीडिया पर अनेक विज्ञापन चल रहे हैं, कहीं ऑक्सीजन की सप्लाई के लिए सम्पर्क करने का विज्ञापन है तो कहीं रेमडेसिवर की उपलब्धता की लंबी-लंबी लिस्टें फॉरवर्ड की जा रही हैं। यदि आपके पास ऐसी कोई सूची हो तो उसे उठाकर पीड़ित के परिजनों को भेजने से पूर्व कम से कम उसकी सत्यता जाँच लें। जो जीवन मृत्यु से जूझ रहा है, उसके परिवार के किसी भी व्यक्ति का एक मिनिट बर्बाद करना कितना बड़ा अपराध है, इसका एहसास इन फेक लिस्टों को फॉरवर्ड करते समय ज़रूर रहना चाहिए।
आप सबने बड़ी मेहनत करके सोशल मीडिया की ताक़त जुटाई है। इस माध्यम का प्रयोग लोगों की जान बचाने के लिए कीजिये। कहीं भी किसी को भी मदद की ज़रूरत हो तो उसकी वास्तविकता की पुष्टि करके उसे अपनी टाइमलाइन से पोस्ट करें, न जाने कौन-सी पोस्ट किसकी जान बचा ले। इस दौर में किसी को यह एहसास भी दे दिया जाए कि वह अकेला नहीं है, तो उसकी हिम्मत बढ़ जाएगी।
सिस्टम और सरकार को कोसनेवाले लोग मेरी प्रोफ़ाइल से फिलहाल दूर रहें। मैं कोविड से त्रस्त लोगों की जानकारी पोस्ट कर रहा हूँ। यदि किसी की कोई सहायता कर सकें, या ऐसी इच्छा हो तो ही मेरी प्रोफ़ाइल पर आएँ, अन्यथा अनर्गल प्रलाप करने के लिए और बहुत प्रोफाइल्स हैं।
कृपया इस समय जीवन बचाने की क़वायद में हमारा सहयोग करें। हम सब बचे रहेंगे तो राजनीति और सिस्टम पर गाल बजाने के बहुत अवसर मिल जाएंगे।
चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
ध्वंस मुँह बाये खड़ा है
मृत्यु का पहरा कड़ा है
घाट धू-धू जल रहे हैं
हर लहर मातम जड़ा है
यह बिखरने का नहीं, हिम्मत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
मृत्यु का विकराल वैभव इस जगत् पर छा चुका है
आँसुओं के अर्घ्य से कब काल का ताण्डव रुका है
अब हमें अड़ना पड़ेगा
अनवरत बढ़ना पड़ेगा
श्वास पर विश्वास रखकर
यह समर लड़ना पड़ेगा
आत्मबल से भाग्य का रुख मोड़ आने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
चाह अमृत की रखी पर, विष उलीचा है जलधि ने
सृष्टि भर के प्राण दूभर कर दिये फिर से नियति ने
काल प्रलयंकर बना है
मृत्यु हर कंकर बना है
जब हवा में विष घुला है
तब कोई शंकर बना है
फिर इसी जलधाम से अमृत जुटाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
अपशकुन पर ध्यान क्यों दें, हम शकुन के गीत गाएँ
इस अंधेरे से डरें क्यों, क्यों न इक दीपक जलाएँ
हर लहर का क्रोध फूटे
साथ जीवट का न छूटे
सिर्फ़ हिम्मत साथ रखना
टूटती हो नाव टूटे
यह प्रलय पर पाँव रखकर पार जाने का समय है
मौत के पंजे से जीवन छीन लाने का समय है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
स्वयं को भगवान मानने की महत्वाकांक्षा में हिरण्यकश्यप ने होलिका के वरदान का दुरुपयोग किया। चिता ने चीख-चीख कर कहा कि, ‘मूर्ख हिरण्यकश्यप, जनता पर इतना अत्याचार न कर कि तेरे ही महल के खंभे तेरे विनाश का उद्गम बन जाएँ!’
मदान्ध राजा ने चिता की बात अनसुनी कर दी। फिर एक दिन पत्थर की भी छाती फट गयी। फिर एक दिन सारे वरदान उसके विरुद्ध खड़े हो गये। फिर एक दिन नियति के नाख़ून, अत्याचारी के पाप से अधिक बड़े हो गये।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Prose, Unpublished
जो कुछ इस समय घट रहा है, उसकी भरपाई कभी न हो सकेगी। मृत्यु ने समूची मानवजाति को दहला दिया है। मानव बस्तियों में अजीब-सा अमंगल छा गया है। सब मन ही मन अपने-अपने अपनों की गिनती करके इस संख्या के यथावत बने रहने की दुआ मांग रहे हैं।
सब ऊपर ही ऊपर यह जता रहे हैं कि हमें कुछ नहीं होगा, लेकिन सब भीतर ही भीतर यह जान रहे हैं कि किसी को भी कुछ भी हो सकता है। काल इतना क्रूर हो गया है कि किसी के लिए भी जीवन बचाने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं रह गया है।
हमने ऐसी-ऐसी दुर्भिक्ष के विषय में पढ़ा है कि गाँव के गाँव ख़ाली हो गये थे। मसान छोटे पड़ गये थे। लोगों ने खेत-खलिहान और यहाँ तक कि आंगन में ही चिताएँ जलानी शुरू कर दी थीं। इन स्थितियों के विषय में जब पढ़ते थे तो लगता था कि अब ऐसा नहीं होगा। अब समाज बहुत विकसित हो गया है। अब हम साधन-सम्पन्न हैं। किन्तु कोरोना के इस प्रकोप ने यह सिद्ध कर दिया कि स्थिति जस की तस है।
मनुष्यता का ऐसा ह्रास शायद ही कभी हुआ हो कि लोगों की अन्तिम यात्रा तक में चार कंधे पूरे नहीं हो पा रहे। पूरे माहौल पर मसान का सन्नाटा छा रहा है। इस सूनामी से स्वयं को बचाए रखने के लिये मनोबल बनाए रखना बेहद ज़रूरी हो गया है।
मैं स्वयं को यह कह-कहकर ऊर्जा और सकारात्मकता से सींच रहा हूँ कि ‘समाज पर इतना बड़ा संकट आया है, ऐसे में बीमार पड़ने की फ़ुरसत ही कहाँ है!’ यह टोटका काम कर रहा है। यह विचार डूबते हुए मन को सम्बल प्रदान करता है। जिस किसी के विषय में थोड़ा भी पता चलता है, उसकी कुशल-क्षेम जानने की क़वायद, और जहाँ तक सम्भव हो उस तक सहायता पहुँचाने की इच्छाशक्ति मेरे तन में व्याप्त रोग को सिर उठाने की मोहलत नहीं दे रही है।
समय का यह टुकड़ा एक तूफ़ान जैसा है। इसके गुज़रने से होनेवाली तबाही को रोकना लगभग असंभव है, किंतु इसकी दिशा देखकर, इसकी चपेट में आनेवालों को अपनत्व का मानसिक अवलम्बन थमाकर नुक़सान और पीड़ा को कम तो किया ही जा सकता है।
चिराग़ जैन