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मुहब्बत सबको होती है

बहुत ज़्यादा न हो पर कुछ तो हसरत सबको होती है
जहाँ में नाम और शोहरत की चाहत सबको होती है

मरासिम हर दफ़ा ताज़िन्दगी निभता नहीं लेकिन
किसी से इक दफ़ा सच्ची मुहब्बत सबको होती है

मन अपने आप से भी इक ना इक दिन ऊब जाता है
किसी अपने की दुनिया में ज़रूरत सबको होती है

हर इक मुज़रिम को लगता है, उसी पर सख़्त है मुन्सिफ़
नहीं तो हर सज़ा में कुछ रियायत सबको होती है

किसी को बादशाहत दी, किसी को झोपड़ों के सुख
मगर फिर भी मुक़द्दर से शिक़ायत सबको होती है

फ़क़त इक मौत जीवन को कोई मौक़ा नहीं देती
वगरना एक-दो लमहों की मोहलत सबको होती है
✍️ चिराग़ जैन

मुहाने तक नहीं पहुँची

किसी की ज़िन्दगी अपने ठिकाने तक नहीं पहुँची
किसी की मौत ही वादा निभाने तक नहीं पहुँची

बुज़ुर्गों की क़दमबोसी मेरी फितरत रही लेकिन
मेरी हसरत कभी उनके ‘सिराने तक नहीं पहुँची

ज़माने के लिए जो शख्स घुट-घुट कर मरा आख़िर
ख़बर उस शख्स की ज़ालिम ज़माने तक नहीं पहुँची

हवा के साथ उसकी ख़ुश्बुएँ आती रहीं लेकिन
कभी वो शय हमारे आशियाने तक नहीं पहँची

लहर से जूझना ही क्यों लिखा था मेरी क़िस्मत में
मेरे किश्ती कभी भी क्यों मुहाने तक नहीं पहुँची

✍️ चिराग़ जैन

हमारा बचपन

माँ के आँचल में था महफ़ूज़ हमारा बचपन
आ के दुनिया में कहीं खो गया प्यारा बचपन

इस ज़माने की हर इक चाल से हारा बचपन
कैसे जी पाएगा ऐसे में बेचारा बचपन

देखकर डर गया दुनिया का नज़ारा बचपन
फिर कभी लौट के आया न दुबारा बचपन

जिस घड़ी हो गए हालात ज़ेह्न पर क़ाबिज़
उस घड़ी आँसुओं में बह गया सारा बचपन

‘हम भी जल्दी से बड़े हों तो मज़ा आ जाए’
-ऐसे मासूम ख़यालात ने मारा बचपन

✍️ चिराग़ जैन

शब्द शिव हैं

शब्द
शिव हैं।

जब कभी
बहती है भावना
उद्विग्न हो
मन के भीतर से

तो उलझा लेते हैं उसे
व्याकरण की जटाओं में।
रोक देते हैं
उसका सहज प्रवाह।
सीमित कर देते हैं
उसकी क्षमताएँ।

कविता वेग है
आवेग है
उद्वेग है।

वो तो
शब्दों ने उलझा लिया
वरना,
बहा ले जाती
सृष्टि के
सारे कचरे को।

शब्द ब्रह्म नहीं हैं,
शब्द शिव हैं।

✍️ चिराग़ जैन

लो वेस्ट जीन्स पर बैन

पिछले दिनों इस बात से पूरे समाज में सनसनी फैल गई कि अब लड़के-लड़कियाँ लो वेस्ट जीन्स नहीं पहन सकेंगे। मुद्दआ ये है कि इस प्रकार के परिधानों को उत्तेजक बताते हुए इन पर बैन लगा दिया गया है। अब ये विषय विश्वविद्यालयों की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं से लेकर साहित्यिक पत्रिकाओं के वाद-विवाद व्यवसाय तक छाया रहेगा।
दरअसल हमारा जागरूक समाज इस निर्णय को इसलिए स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकार ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का हनन है। इस संदर्भ में परम आदरणीया मल्लिका जी की एक सूक्ति उद्धृत की जा सकती है। जब उनके परिधानों को लेकर कुछ संकुचित मानसिकता वाले लोगों ने हंगामा खड़ा किया था तो मल्लिका जी ने यह उद्बोधन देकर मुआमला शांत किया था कि मेरे पास ख़ूबसूरत बदन है तो मैं क्यों न दिखाऊँ। तर्क में दम था। सो हंगामाजीवियों को साँप संूघ गया और संपादकीय पृष्ठों से उठा विवाद पेज थ्री के इस बयान से समाप्त हो गया।
कदाचित् बुद्धिजीवियों ने यह सोचकर विवाद को आगे नहीं बढ़ाया कि यदि कल को मल्लिका जी ने उन्हें कम कपड़े पहनने की चुनौती दे डाली तो क्या होगा! सो अपनी इज़्ज़त अपने हाथ….। ख़ैर कपड़ों की तरह विषय भी भटक गया था। सो वापस लो वेस्ट जीन्स पर आते हैं।
यह मुआमला केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का नहीं है अपितु हमारे सभ्य समाज की ‘अनुभूति की स्वतंत्रता’ का भी है। जब कुछ ‘सुराग़’ ही नहीं दिखाई देगा तो कल्पनाशील समाज पूरी तस्वीर की कल्पना कैसे करेगा। और जब तस्वीर की कल्पना ही नहीं होगी तो वह सुखद अनुभूति कैसे होगी जो……….!
इतना ही नहीं, ये निर्णय पुनः हमारे समाज की महिलाओं को उसी पुरुषवादी कठघरे में ला खड़ा करने का एक षड्यंत्र है जिससे बाहर आने के लिए सैंकड़ों लोग महिला-मुक्ति का झंडा उठाए कमा रहे हैं। पहले पुरुषों ने धर्म के नाम पर महिलाओं को घर की चाहरदीवारी में क़ैद कर रखा था और अब पूरे कपड़ों में क़ैद करने के लिए समाज और सभ्यता की दुहाई दी जा रही है।
ये अन्याय नहीं चलेगा। और चूंकि क्रांति दबाने से और भड़कती है इसलिए यदि पुरुष यूँ ही मनमानी करते रहे और महिलाओं को पूरे कपड़े पहनाने को विवश किया गया तो महिलाएँ इसका और भी अधिक विरोध करेंगी और कोई काॅरपोरेट कंपनी अपनी सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभाते हुए लो थाइज़ जीन्स लांच कर देगी। फिर देखते रह जाएंगे सारे पुरुष!
सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लेते हुए इस निर्णय पर बैन लगाए। ज़रा सोचिए! एक ग़रीब आदमी जो अभी दो सप्ताह पहले लिवाइज़ की जीन्स ख़रीद कर लाया है, इस निर्णय के लागू होने से उसके दिल पर क्या बीतेगी। कहाँ से लाएगा नई जीन्स ख़रीदने के लिए वह पैसा। जिस दौर में लोगों के पास दाल-रोटी के लाले हैं, ऐसे में सरकार ने यदि इस प्रकार के निर्णयों पर रोक नहीं लगाई तो ग़रीबी कितनी बढ़ जाएगी।
वैसे भी जब गांधी जी अपने देशवासियों की चिंता में अपने पायजामे को धोती में बदल सकते हैं, तो गांधी जी के अनुयायी अपनी जीन्स को थोड़ा छोटा नहीं कर सकते। ये और बात है कि गांधी जी ने पाऊँचे काटे थे और हमने बैल्ट! पर मूल मुद्दआ तो कटौती का है। और कटौती हम कर रहे हैं। अब इस निर्णय पर पुनर्विचार होना चाहिए और इसको जीन्स से हटाकर टाॅप पर लागू करना चाहिए कि जो लो वेस्ट टाॅप पहनेगा उस पर ज़ुर्माना किया जाएगा। इससे हमारे टाॅप भी ऊपर उठेंगे और ‘संस्कृति’ भी!

“लड़कियाँ मंदिर में जींस पहन कर न आएं।” -यह वाक्य धर्म के वर्तमान स्वरूप की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है। इस वाक्य का एक अनुवाद यह है कि हम घर से भगवान् के दर्शन करने निकलते हैं और जींस देख कर भटक जाते हैं।
इस वाक्य का एक अर्थ यह भी है कि लड़कियो, कान खोल कर सुन लो, तुम जब जींस पहन कर भगवान् के दर्शन करने आती हो तो हमें कुछ हो जाता है, बस!
हम डरे हुए धर्मात्मा हैं। हम जानते हैं कि हमारी एकाग्रता को जींस की झलक और ईश्वर की मनोहारी मूर्ति में से एक को चुनना होगा तो हम क्या चुनेंगे। हमें अपनी भीतरी कुंठाओं का भान है। इसलिए हमें धार्मिक रखना है तो लड़कियों को ढँकी-दबी रहना होगा, अन्यथा हम क्या हो जाएंगे ये हम भी नहीं जानते।
हम खजुराहो जाकर सदैव सम्भोग मूर्तियों के गलियारों में उलझ कर रह जाते हैं। उन मूर्तियों का आकर्षण हमें कभी भी गलियारे के पार शिवालय तक नहीं पहुँचने देता।
जब हम ईश्वर के दर्शन कर रहे होते हैं तब तुम्हारी जींस के भीतर से एक तीव्र प्रकाश प्रस्फुटित होकर हमारे नयनों की ज्योति को कुंद कर देता है, इससे हमारी मति भ्रष्ट हो जाती है और हम अपनी आस्था के सूत्र ईश्वर की वेदी से खोलकर तुम्हारी जींस से बाँध देते हैं।
हमारे धर्म की रक्षा करो लड़कियो, जींस पहननी है तो बाज़ार में पहनो। बाजार में हमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मंदिर में हमें बख्श दो प्लीज़।

✍️ चिराग़ जैन

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