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इक मुक़म्मल बयान

प्यार कब बेज़ुबान होता है लफ्ज़ बिन दास्तान होता है आँख तक बोलने लगें इसमें इक मुक़म्मल बयान होता है ✍️ चिराग़...

वो कश्मीर हमारा है

हिमगिरि की गोदी में पसरा जो इक हरा बगीचा है जिसकी झीलों को पुरखों ने स्वेदकणों से सींचा है जिसके कण-कण में भारत की सौंधी ख़ुश्बू बिखरी है जिसके प्रांगण में हरियाली दिव्य रूप में बिखरी है जहाँ धरा पर स्वर्ग सरीख़ा अद्भुत भव्य नज़ारा है दुनिया माने या ना माने वो कश्मीर...

बचपन नहीं जाता

अगर कुछ शोख़ियों की ओर उसका मन नहीं जाता तो फिर इंसान के मन से कभी बचपन नहीं जाता कोई कितना भी ख़ुद को सख्त दिल कहता रहे लेकिन कभी यादों से पहले प्यार का सावन नहीं जाता भले ही मिट गया दीवार का नामो-निशां भी अब मगर मेरे ज़ेह्न से वो बँटा आंगन नहीं जाता चुभन ही क्यों बहुत...

अवतारी बालक

जीवन के जिस मौसम में आँखें सपने पाला करती हैं कुछ रंग-बिरंगी उम्मीदें जब होश संभाला करती हैं पलकों के भीतर कोई अनगढ़ मूरत ढाली जाती है सरगम साँसों की वीणा पर प्रियतम के गीत सुनाती है वो मौसम जिसमें अपने कुछ कानून बनाए जाते हैं वो मौसम जिसमें मिलन-विरह के नग़में गाए जाते...

लरजिश हमारे लहजे में

कहाँ अचानक मिले हैं हम-तुम, यहाँ के मौसम में शायरी है जवान रुत, मदभरी हवाएँ, ये शाम जैसे ठहर गई है महकती रुत उनके सुर्ख़ नाज़ुक लबों को छूकर बहक रही है सनम के भीगे बदन की लरजिश हमारे लहजे में आ गई है जो सोच की हद में आ गया हो, वो चाहे जो भी हो आदमी है किसी तरह भी समझने...
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