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गुल्लक

इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।

Book Gullak by Chirag Jain

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व्यस्तता

जब तक तुम संग थीं मैंने नहीं तलाशी कोई ख़ुशी नहीं खोजी कोई मुस्कान नहीं ढूँढ़ी कोई हँसी ...ज़रूरत ही नहीं पड़ी। अब तलाशता फिरता हूँ एक-मासूम सी ख़ुशी अपने दिल के लिये। एक कोमल-सी मुस्कान अपने होंठों के लिये। एक गीली-सी हँसी अपने चेहरे के लिये। और एक पावन-सी चमक अपनी आँखों के लिये। लेकिन रीती ही रह जाती...

शॉर्ट-सर्किट

सर्किट के सीने में हुई गड़बड़ का असर उपकरण पर भी समान रूप से पड़ा लेकिन इन दोनों के बीच बेचारा वायर अकारण ही सड़ा। तार बेचारा सदैव अपना कार्य सुचारू रूप से करता है लेकिन जब भी कुछ प्रॉब्लम होती है तो उसको जलना ही पड़ता है। रिश्तों के कनेक्शन में हुए झगड़ों के शॉर्ट-सर्किट से विश्वास का वायर जल जाता है...

बावरा कवि

हँसने के लिए कारणों का मोहताज नहीं, आँसुओं का ख़ूब अनुभवी हो गया हूँ मैं सारी दुनिया को आज अपना-सा लगता हूँ, अपनों के लिए अजनबी हो गया हूँ मैं झूठ-अनाचार-बेईमानी की बदलियों में, सच के रवि की कोई छवि हो गया हूँ मैं बावरेपने में घूमता हूँ दुनिया को भूल, तब लगता है एक कवि हो गया हूँ मैं ✍️ चिराग़...

लोग आते-जाते हैं

दिल भी है इक ख़ूबसूरत से इदारे की तरह लोग आते-जाते हैं, पानी के धारे की तरह जब से ये संसार सारा हो गया है आसमां तब से है इन्सानियत टूटे सितारे की तरह चल सको तो तुम किसी के बन के उसके संग चलो वरना इक दिन छूट जाओगे सहारे की तरह दिल के रिश्तों को फ़रेबी उंगलियों से मत छुओ जुड़ नहीं पाते, बिखर जाते हैं...

खोते मंज़र

चाहकर भी नहीं बचा पा रहे हैं हम वह सब जो आनंदित करता है हमें तनाव के क्षणों में। क्षमा नहीं करेंगी हमें हमारी ही सन्तानें क्योंकि छीन लेते हैं हम रोज़ाना आनंद के अनिवार्य तत्व अगली पीढ़ी से ...आधुनिक बनने की कोशिश में मिटा देते हैं रोज़ाना प्रकृति में बिखरे काव्यांश अपने ही हाथों आधुनिक बनने के लिए...

मापदण्ड

टूट गया था मैं ठीक वैसे ही ज्यों कठोर धरातल पर गिरते ही टूट जाता है कच्चा बर्तन। क्वारी-गर्भवती कन्या के मजबूर बाप की तरह कसमसा उठी थी मेरी आत्मा। जून की झुलसती गर्मी में सड़क-किनारे खड़े शिकंजीवाले की गीली रेहड़ी पर पड़े बर्फ़ के छोटे-से टुकड़े की तरह पिघल गईं थीं मेरी आँखें और भूख से बिलबिलाते हुए...

मधुमास

खण्ड-खण्ड कर रहे देश की अखण्डता को, ऐसे दुष्ट लोगों का विनाश होना चाहिए जातिवादियों के जीवन में हलाहल घुले, साम्प्रदायिकों का सर्वनाश होना चाहिए ज्वालाएँ प्रचण्ड मेरे भारत में फिर जलें, एक-एक कोने में प्रकाश होना चाहिए न हो कोई जाति न धरम कोई शेष रहे, पूरे भारत में मधुमास होना चाहिए ✍️ चिराग़...

इक पहेली हूँ

धूप में निखरोगे मेरी छाँव में जल जाओगे इक पहेली हूँ, कहाँ तुम ढूंढने हल जाओगे बर्फ़-सी ठंडक तो उसकी बात में होगी मगर छू लिया जिस पल उसे उस पल ही तुम जल जाओगे विषधरों के दंश का संकट भी झेलोगे ज़रूर जब कभी लेने किसी जंगल से संदल जाओगे धूप बनकर तुम दलानों में पसरते हो मगर जब दरख्तों के तले आओगे तो ढल...

आयात-निर्यात

जंगल के सभागार में बहुत बड़ा आयोजन हुआ जिसमें सर्वप्रथम भारत माँ के चित्र के सम्मुख दीप-प्रज्वलन और फिर मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ। भाषण में अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था भाषण का सार कुछ यूँ था- "भैंसा दल के अध्यक्ष श्री कालूूप्रसाद जी! टबासीन मछलियो! रंग-बिरंगी तितलियो! खूँटों से बंधी गायो! और अन्य...

भीमराव अंबेडकर

गुदड़ी के लाल ने दिखाया था कमाल देखो, सारी दुविधाओं का निदान ले के आया था परेशानी, दुख और ग़रीबी में जो जन्मा था, वही भारती का स्वाभिमान ले के आया था भारत की खोई आन-बान ले के आया; औ लोकतन्त्र वाला यश-गान ले के आया था भारती का एक अलबेला अनमोल पूत, भारत के लिए संविधान ले के आया था ✍️ चिराग़...

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