गुल्लक
इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।
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गुड्डी
गुड्डी के पापा लन्च में टिफ़िन खोलते समय मूंद लेते हैं आँखों को क्योंकि देख नहीं पाते हैं रोटियों से झाँकते तवे के सुराखों को। ईमानदार क्लर्क समझ नहीं सकता है क़िस्मत की गोटियों को इसलिए चुपचाप निगल लेता है बोलती हुई रोटियों को। गुड्डी अक्सर लेट पहुँचती है स्कूल नहीं करती कोई भूल क्योंकि स्कूल का...
दुःख
वाह के मज़मों में अक्सर मौज़ूद होती है आह भी। जैसे बहुत कुछ पा लेने पर भी नहीं मिट पाती है कसक कुछ खो जाने की। दुःख जन्मता है ख़ुशियों की कुक्षि से कदाचित् यही सिद्ध करने के लिये जलती हैं खलिहानों में रखी फ़सलें फटते हैं धरती पर उतरते अंतरिक्ष-यान मरते हैं जवान बेटे फुँकते हैं बसे हुए घर और छीन ली...
कैसे लिखूँ
मस्त था मैं, भ्रमर-सा दीवाना था मैं, लेखनी प्रेयसी बन गई थी मेरी ऑंसुओं की अमानत संजोई बहुत, जुल्म से जंग-सी ठन गई थी मेरी एक दिन प्रेयसी मुझसे कहने लगी- "मेरे प्रीतम ये क्या कर दिया आपने मेरे बचपन को क्यों रक्त-रंजित किया, मांग में रक्त क्यों भर दिया आपने क्यों शवों के नगर में मुझे लाए हो, मेरी...
चाहत
मैं मुहब्बत का सुगम-संगीत लिखना चाहता हूँ कंदरा संग पर्वतों की प्रीत लिखना चाहता हूँ उत्तरा का मूक-वैधव्य जकड़ लेता है मुझको जब कभी मैं पांडवों की जीत लिखना चाहता हूँ ✍️ चिराग़...
सरस्वती वन्दना
वरदान दे दे मुझे छंद-गीत-कविता का, वाग्देवी तेरा उपकार मांगता हूँ मैं रंग-ओ-तरंग तेरे संग से मिलेगा मुझे, जीवन में तेरे सुविचार मांगता हूँ मैं मृदु-सौम्य-भावपूर्ण वाणी बोलने के लिए वाणी तेरे सभ्य-संस्कार मांगता हूँ मैं वाणी का वरद् सुत बन के जिऊँ मैं यहाँ, हंसवाहिनी ये अधिकार मांगता हूँ मैं शारदे,...
इबादत
उनकी बातों में इक इबारत है उनसे मिलना भी इक इबादत है इस ज़मीं के ख़ुदा हैं वो बन्दे जिनके दिल में कहीं मुहब्बत है ✍️ चिराग़...
कविता
ज्वार भावनाओं का जो मन में उमड़ता है, तब आखरों का रूप धरती है कविता आस-पास घट रहे हादसों की कीचड़ में कुमुदिनी बन के उभरती है कविता प्रेयसी के रूप में सँवरती है कविता; औ शहीदों की अरथी पे झरती है कविता लोग मानते हैं काग़जों पे लिखी जा रही है, कवि जानते हैं कि उतरती है कविता ‘रश्मिरथी’ में ‘रेणुका’...
मानवता
अपने आप से दूर हो रहे लोग इंसानियत से अधिक आवश्यक हो रहे भोग अदालतों में टूटता भाई-बहन का प्यार अस्सी साल की नारी का बलात्कार पश्चिम की धुनों पर थिरकता यौवन चुनाव-दर-चुनाव बढ़ता प्रलोभन बेटियों को बेचकर ख़रीदा गया राशन धर्ममंचों से पढ़ा जा रहा राजनैतिक भाषण स्कूलों के सामने चाय बनाते बच्चे धर्म के...
रिक्शावाला
डरी-सहमी पत्नी और तीन बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता है रिक्शावाला। बच्चे रोज़ शाम खेलते हैं एक खेल जिसमें सीटी नहीं बजाती है रेल नहीं होती उसमें पकड़म-पकड़ाई की भागदौड़ न किसी से आगे निकलने की होड़ न ऊँच-नीच का भेद-भाव और न ही छुपम्-छुपाई का राज़ ....उसमें होती है ”फतेहपुरी- एक सवारी“ की आवाज़।...
अनकहा
हम क़लम थामकर सोचते रह गए भाव आँसू बने, आँख से बह गए इक ग़ज़ल काग़ज़ों पर उतर तो गई दर्द दिल के मगर अनकहे रह गए ✍️ चिराग़...
