छूकर निकली है बैचैनी
अनुभूतियाँ ज्यों-ज्यों ऊँची उठती जाती हैं, त्यों-त्यों उनकी उड़ान सहज होने लगती है। और एक सीमा के बाद उन्हें पंख नहीं हिलाने पड़ते, वे स्वतः ही सृजन के आकाश में तैरने लगती हैं। फिर उड़ान, उड़ान न रहकर बहाव बन जाती है। बस यही बहाव गीत का प्राणतत्त्व है।
शिल्प की यान्त्रिकता पीछे रह जाये और अनुभूति स्वतः ही लयात्मक होकर अभिव्यक्त होने लगे तो इसे गीत का अवतरण कहा जा सकता है। इस प्रक्रिया में व्याकरण को अलग से साधना नहीं पड़ता, इस स्थिति में मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं, बल्कि आनन्द के किसी चरम पर यदि पंख प्रमादी भी होने लगें तो आनन्द का वेग परिन्दे को बहा ले जाता है। यहाँ केवल आनन्द शेष रह जाता है और प्रक्रिया गौण हो जाती है। फिर तिरना निश्चित हो जाता है। यह याद ही नहीं आता कि पंख भी हिलाने हैं। यह होश ही नहीं रहता कि उड़ने के मूलभूत नियम न पाले गये तो दुर्घटना घट सकती है।
यह किसी रचनाकार के अपनी अनुभूतियों से एकाकार हो जाने की अवस्था है। यह किसी पथिक के मार्ग में लीन हो जाने की अवस्था है। पानी में दूर तक यात्रा करनी है तो ख़ुद को पानी कर लेने से बेहतर कोई दूसरा उपाय नहीं है। आकाश में बहुत ऊँचे जाना हो तो हवा में घुल जाना ही श्रेयस्कर है।
भाव और भाषा के इसी एकाकार स्वरूप का नाम है गीत। लय की झंकृति के आकाश में तिरता अनुभूति का पाखी है गीत। पीड़ा, हर्ष, दर्शन, उत्साह अथवा अन्य किसी भी मनोदशा के चरम पर पहुँचकर रचनाकार को अनहद की जो ध्वनि सुनायी देती है, वही गीत है।
इसके लिये बहुत ज़ोर नहीं आज़माना पड़ता। ज़ोर आज़माकर गीत रचा ही नहीं जा सकता। बादलों को पत्थर मारने से बरसात नहीं होती। बादल तो स्वतः ही बरस पड़ता है …बेपरवाह …झमाझम। यदि अनुभूति लबालब भर गयी है तो गीत को छलकना ही होगा। उसको आमन्त्रित नहीं करना पड़ेगा। वह स्वतः आयेगा। आप मना करेंगे, तब भी आ जायेगा। फिर उसे रोकना नामुम्किन होगा।
मैंने कई बार गीत से झगड़ा किया है लेकिन उसने भी ढीठ दोस्त की तरह आने का क्रम जारी रखा। कई-कई दिन शक्ल नहीं देखी, लेकिन फिर जब मिला तो ऐसे मिला जैसे कभी बिछुड़ा ही न हो। गत दो-ढाई वर्ष में तो गीत मेरी अभिव्यक्ति का साया बन गया है। विचार का हाथ थामकर किसी भी राह पर चलूँ, लेकिन मंज़िल पर गीत खड़ा मिलता है।
‘छूकर निकली है बेचैनी’ ऐसी ही सृजन यात्राओं का प्राप्य है। संवेदना के अस्तित्व से जो कंपन मन के धरातल पर घटित होता है, उसकी तरंगों का लिप्यंतरण हैं ये गीत। इनमें प्रसव की पीर से लेकर विरक्ति की मनोदशा तक की अभिव्यक्ति है। इनमें वयष्टि के झरोखे से समष्टि का दर्शन करने का प्रयास है। पौराणिक संदर्भों के कॅनवास पर परिवेश का चित्र उकेरने की कोशिश है। हिन्दी गीत के वातायन में कणांश सरीखा अस्तित्व लिये यह संग्रह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत है। इसकी किसी भी पंक्ति से आपको अपने किसी अनुभव की गूंज सुनायी दे तो मेरी लेखनी को सहजता का आशीष दीजियेगा।
अनुक्रम
उत्सव के मधुघट
पीड़ा के सागर मंथन से उत्सव के मधुघट पाएंगे चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी हम जीवन भर मुस्काएँगे यादों के जलते छालों पर भावों का मरहम धर देंगे जीवन के उघड़े घावों में शब्दों की हल्दी भर देंगे सरगम के छू लेने भर से ग़म के फोड़े भर जाएंगे चाहे कण्ठ रुंधा हो फिर भी हम जीवन भर मुस्काएँगे हालातों का गर्जन होगा...
स्वर्णिम भविष्य
कल बना लेगा उदाहरण जग हमारे निर्णयों को पर अभी हम आपके उपहास का संत्रास झेलें कल हमारे अनुकरण की सीख देना पीढ़ियों को आज हम अपने किये पर धृष्टता का त्रास झेलें जब कभी गौतम नकारेगा गँधाती रीतियों को तब उसे उद्दण्ड कहकर विश्व कर देगा बहिष्कृत जब वही कृशकाय होकर लकड़ियों जैसा बनेगा तब उसे गृहिणी करेगी...
बारहमासा
मीत! तुम्हारी सुधियों का ये कैसा बारहमासा है अधरों पर मधुमास रखा है आँखों में चौमासा है पल में मुखड़े पर जगमग दीवाली-सी आ जाती है पल में मन में चैत दुपहरी की वीरानी छाती है पल में डरकर मन बेचारा पूस निशा-सा कँपता है पल में आषाढ़ी चातक-सा चंद्रकिरण को तकता है क्षणिक हताशा, क्षणिक पिपासा, क्षणिक मिलन...
प्रश्न संस्कृति
अंधियारे में चलते रहने से जग का उत्थान न होगा प्रश्नों से परहेज किया तो कोई अनुसंधान न होगा भगवद्गीता उत्तर ही तो है अर्जुन की जिज्ञासा का यम तक ने सम्मान किया है नचिकेता की अभिलाषा का समवशरण में प्रश्न न हों तो आगम ज्ञान कहाँ से आता प्रश्न गरुड़ यदि पूछ न पाते गरुड़ पुराण कहाँ से आता ज्ञानपिपासा...
पुनर्समीक्षा
किस पर्वत से पत्थर आया, कैसे रूप धरा पत्थर ने बस इतने भर से मूरत की, प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी पूछ लिया यदि उत्सुक होकर, शिल्पी की घायल उंगली से तो फिर इस पूरे मंदिर की पुनः समीक्षा करनी होगी रामकथा लिखना चाहो तो, केवट का किस्सा सुन लेना कैसे त्याग गए पल भर में, शासन का हिस्सा सुन लेना सागर से...
पराजित विजेता
धर्मराज स्वीकार करोगे? रण से जीते इस शासन में कुछ अनबोले वृक्षों के शव भी शामिल हैं सिंहासन में धर्मराज स्वीकार करोगे? लाक्षागृह की कालनिशा में जिस भिलनी को दमित किया था जिनके शव की भस्म बनाकर दुर्योधन को भ्रमित किया था उन बच्चों की दग्ध अस्थियां चुभती होंगी सिंहासन में धर्मराज स्वीकार करोगे?...
अपराधी सब हैं
किस राजा ने दांव लगाया किस शकुनि ने फेंके पासे किस देवर ने चीर उघाड़ा कौन ससुर हैं आज रुआँसे इन प्रश्नों में मत उलझाओ, चीरहरण के वादी सब हैं लड़ते रहना युद्ध भले तुम, पर सचमुच अपराधी सब हैं दुर्योधन के कान कहेंगे, हमने इक उपहास सहा था जाति बताकर रश्मिरथी ने, इक दहता संत्रास सहा था भीष्म बंधे हैं...
समय-चक्र
सदा कसा ही नहीं रहेगा, जीवन पर कष्टों का फंदा सूरज तेरी यही रौशनी, ठंडी करके देगा चंदा रिश्तों के अपनेपन का भी, पीड़ा रूप बदल जाती है जिनके बिन जीवन मुश्किल था, उनकी संगत खल जाती है जितना तेज़ तपेगा सूरज, उतना अधिक मेह बरसेगा जितना ज्यादा विरह सहेंगे, उतना गहन नेह बरसेगा पत्थर छैनी सहकर पुजता, लकड़ी...
सूरज को चेतावनी
किरणों के बूते गहरा अंधियार मिटाना नामुमकिन है दिनकर अब तुमको ख़ुद ही अंधियारे बीच उतरना होगा युग-युग से तुम जिन घोड़ों के रथ पर थे असवार दिवाकर! उनका चाल-चलन भी जाँचो अब फिर से इक बार दिवाकर! इनके चारे की थैली पर अंधियारे के चिन्ह मिले हैं इनकी हर हरक़त पर तुमको पूरा अंकुश धरना होगा ओ दिनकर!...
प्रह्लाद जीवित है
हार भी है, जीत भी है पीर भी है, प्रीत भी है अनवरत इक शोर भी है आपदा घनघोर भी है किन्तु अन्तस् में अमर आह्लाद जीवित है होलिका की गोद में प्रह्लाद जीवित है मानता हूँ उत्सवों का दौर थोड़ा कम हुआ है आंधियों से आम्रवन का बौर थोड़ा कम हुआ है किन्तु कलरव ने चहकने की प्रथा त्यागी नहीं है मांगलिक वेला अभी सब...