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शब्दों की कुंजगलियाँ

‘ललित निबंध’ साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। वर्तमान में यह विधा विलुप्त सी होती जा रही है। लेकिन चिराग़ जैन ने अनेक ललित निबंध लिखे हैं। जीवन के एक अलग पक्ष को खूबसूरती से बयां करते ये निबंध आपको ज्ञान ही नहीं, आनंद भी देंगे। ‘शब्दों की कुंजगलियां’ शीर्षक से इन निबंधों को एक पुस्तक में संकलित किया जा रहा है। यह पुस्तक अभी प्रकाशनाधीन है।

अनुक्रम

शांति बनाम उन्माद

जो शांति का उपाय खोजने के लिए अन्तिम प्रयास तक जूझता रहे, उसे शांतिदूत कहा जाता है। जब दोनों ही पक्ष ख़ून-ख़राबे के उन्माद में हों तथा किसी तरह शांति का उपाय न सूझ रहा हो, उस समय भी शांति का उपाय खोजना ऐसा ही है, ज्यों सींग भिड़ाए खड़े दो बिजारों को लड़ने से रोकना हो। इस स्थिति में स्वयं के लहूलुहान...

सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् की अनुगूंज : पशुपतिनाथ मन्दिर

शिव, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों के लिए समभाव है। शिव, जहाँ मनुष्य, पशु, भूत, गण, स्त्री, पुरुष, देव, दैत्य, सुर, असुर, सृजन, ध्वंस... सब कुछ स्वीकार है। जहाँ कुछ हेय नहीं है। जहाँ किसी नकार के लिए कोई स्थान नहीं है। जहाँ सब स्वीकृत हैं। जो सबके हैं। जहाँ मानव तन पर गजमुख भी स्वीकृत है और जीवित देह...

डिब्रूगढ़ की पहली यात्रा

दिल्ली से उड़कर डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट पर लैंड किया तो जहाज की खिड़कियों पर पानी की बून्दों ने चित्रकारी कर दी थी। बाहर झाँकने पर एहसास हुआ कि यहाँ दिल्ली जैसी गर्मी का नामो-निशान नहीं है, बल्कि बादलों की मेहरबानी से मौसम गुलाबी नमी से महक उठा है। हवाई अड्डे से बाहर निकलने तक हमें अगले ही दिन की वापसी के...

सनातन धर्म और सहिष्णुता

सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है। विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों...

एक सुबह पतझड़ की…

मौसम बदल रहा है। जो हरापन पेड़ की शाखा से नीचे नहीं उतरता था, वह सूखकर ज़मीन पर आ गिरा है। मुसाफ़िरों के पैरों तले कुचलकर चूरा हुए जाते इस युग को रोज़ सवेरे एक झाड़ू से सकेरकर ढेर घोषित कर दिया जाता है। हवा का कोई झोंका इन्हें छेड़ देता है तो इनसे सरगम नहीं फूटती, बल्कि खड़खड़ाहट का चिड़चिड़ा शोर गूंजता है।...

महीयसी महादेवी

बचपन में पाठ्यक्रम में एक रेखाचित्र पढ़ा था- ‘गौरा’। इसे पढ़कर गाय के प्रति तो मन आकृष्ट हुआ ही; महादेवी जी के प्रति भी मन प्रेम से भर उठा। फिर तो मैंने खोज-खोजकर महादेवी जी को पढ़ना शुरू कर दिया। उनका गद्य मेरे लिए प्रेरणास्रोत बनता गया और उनका पद्य मेरे संवेदी तंतुओं की ख़ुराक़ बन गया। महादेवी जी से...

होली : एक अवसर

होली; मनुष्य को भीतर से बाहर तक एकरूप कर देने का त्योहार। होली; अलग-अलग रंगों के एकरंग हो जाने का अवसर। होली; शालीनता और नैतिकता के बोझ को किनारे रखकर कुछ क्षण स्वाभाविक हो जाने का पर्व। होली; सभ्यता के आडम्बर से मुक्त होकर सहजता की धारा में डुबकी लगाने का रिवाज़। होली के दिन आपमें कृष्ण साकार होते...

गोल-गोल गप्पा

पानी के बतासे, पुचका, गुपचुप, टिकिया और न जाने क्या-क्या नाम हैं इस चटखारे का। हर गली-नुक्कड़ पर कोई चाट का ठेला इस अनोखे व्यंजन के बिना पूरा नहीं होता। सूजी और आटे की छोटी-छोटी करारी पूरियों को फोड़कर उनमें आलू-चने और सोंठ का मसाला भरकर जब तक गोलगप्पे वाला उसे किसी बर्तन की तरह चटपटे पानी में...

शिव : साधना सहजता की

शिव... जहाँ पीड़ा और उत्स एकाकार हो जाते हैं। शिव... जहाँ काव्य के नौ रस बिना किसी भेदभाव के एक साथ रहते हैं। शिव... जहाँ सृष्टि के समस्त भावों को प्रश्रय मिल जाता है। शिव... जिसके द्वार किसी के लिए भी बंद नहीं हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि जहाँ द्वार जैसा कुछ है ही नहीं। शिव तो द्वाररहित हैं। शिव तो...

दिल्ली : एक करवट इतिहास की

दिल्ली - यह केवल एक शहर का नाम नहीं, बल्कि एक अंदाज़ है ज़िन्दगी का। अपने साथ न जाने कितने ही किस्से-कहानियाँ लेकर अपने नम इतिहास के साथ ये शहर, ज़िंदा भी है और आबाद भी। तोमर, पिथौरा, सीरी, सैयद, लोधी, तुग़लक़, ग़ुलाम, मुग़ल, खि़लजी,और अंग्रेज सभी ने इस शहर को अपने-अपने अंदाज़ में बसाया और अपने-अपने तरीके...

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