शब्दों की कुंजगलियाँ
‘ललित निबंध’ साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। वर्तमान में यह विधा विलुप्त सी होती जा रही है। लेकिन चिराग़ जैन ने अनेक ललित निबंध लिखे हैं। जीवन के एक अलग पक्ष को खूबसूरती से बयां करते ये निबंध आपको ज्ञान ही नहीं, आनंद भी देंगे। ‘शब्दों की कुंजगलियां’ शीर्षक से इन निबंधों को एक पुस्तक में संकलित किया जा रहा है। यह पुस्तक अभी प्रकाशनाधीन है।
अनुक्रम
माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण
एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, 'गीतमयी' होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है;...
मन रह गया अयोध्या में…
जहाज ने दिल्ली का रन-वे छोड़ा और मन राम के आचरण की कथा बाँचने लगा। खिड़की से बाहर झाँका, तो सूरज के तेज प्रकाश से आँखें चुंधिया गईं। भौतिक आँखें बंद हुई तो मन राम के नयनाभिराम चरित्र पर त्राटक करने लगा। अनायास ही राम से कुछ मांगने की उत्कंठा जगी तो याचना राम-आचरण की प्रार्थना के गीत में ढल गई।...
मूल प्रवृत्ति
सामान्यतया राम की मूर्ति धनुष से पहचानी जाती है, और राम का चरित्र मृदुता से! इसके ठीक विपरीत कृष्ण की मूर्ति बाँसुरी से पहचानी जाती है किन्तु कृष्ण का चरित्र एक योद्धा का चरित्र है। राम कंधे पर धनुष रखकर विनम्र जीवन जीते हैं और कृष्ण अधरों पर बाँसुरी रखकर राजनैतिक जीवन जीते हैं। दोनों के चित्र...
राम: भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक नाम
राम... एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम... एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी...
सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले
कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं...
समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा
वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी...
कृष्ण का तो चक्र भी ‘सुदर्शन’ है
नंदलला, कन्हैया, कान्हा, गिरिधर, मुरलीधर, गोपाल, मोहन, गोविन्द, मधुसूदन, केशव, रणछोड़, माधव, श्याम, वासुदेव, पीताम्बर... और भी दर्जनों संज्ञाएँ मिलकर थोड़ी-थोड़ी झलक भर दे पाती हैं एक कृष्ण की। और ये सब संज्ञाएँ कृष्ण के नाम भर नहीं हैं, अपितु ये सब नाम कृष्ण के जीवन के अलग-अलग किस्सों के शीर्षक हैं,...
ओशो कम्यून की पहली शर्त
ख़ुद से मिलने की ख़ुशी क्या होती है, इसका एहसास मुझे तब हुआ जब मैंने कम्यून में प्रवेश किया। हर चेहरे पर एक नैसर्गिक प्रसन्नता, हर आँख में एक प्राकृतिक चमक, हर पाँव में एक अनायास थिरक ...उत्सव वहाँ आयोजित नहीं, घटित हो रहा था। वहाँ सब अपने पूरे अस्तित्व के साथ घूम रहे थे। वहाँ सब अपने पूरे...
साहित्य बर्बरीक है
साहित्य करुणा से उपजता है। साहित्य संवेदना से जन्म लेता है। 'आह से उपजा होगा गान' -यही 'आह' साहित्य की सर्जना का बीज है। यही कारण है कि साहित्य सदैव कमज़ोर की आवाज़ बनता है। साहित्य की समाज में वही भूमिका है, जो महाभारत के युद्ध में बर्बरीक की थी। वह न पाण्डवों के पीछे खड़ा है, न ही कौरवों के...
हनुमान : भक्त से मित्र हो जाने की यात्रा
अगाध समर्पण का साकार रूप हैं हनुमान। निस्पृह भक्ति का शाश्वत उदाहरण हैं हनुमान। श्रीमत् हनुमान की वीरता अन्य किसी भी वीर की वीरता से इसलिए विशेष है, क्योंकि हनुमान की वीरता समर्पण से उत्पन्न हुई है। श्रीराम के प्रति वीरवर हनुमान का जो समर्पित प्रेम था, उसी की कुक्षि से यह भाव उपजा कि चाहे...
