+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

शब्दों की कुंजगलियाँ

‘ललित निबंध’ साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। वर्तमान में यह विधा विलुप्त सी होती जा रही है। लेकिन चिराग़ जैन ने अनेक ललित निबंध लिखे हैं। जीवन के एक अलग पक्ष को खूबसूरती से बयां करते ये निबंध आपको ज्ञान ही नहीं, आनंद भी देंगे। ‘शब्दों की कुंजगलियां’ शीर्षक से इन निबंधों को एक पुस्तक में संकलित किया जा रहा है। यह पुस्तक अभी प्रकाशनाधीन है।

अनुक्रम

विनीत चौहान

सामाजिक व्यवहार में मैच्योरिटी की परिभाषा तलाशता हूँ तो पाता हूँ कि सही और ग़लत का निर्धारण करने से पहले अपने व्यक्तिगत लाभ और हानि का आकलन करने की क्षमता को मैच्योरिटी कहते हैं। यद्यपि यह परिभाषा मैंने स्वयं गढ़ी है, तथापि मैच्योर कहे जानेवाले अधिकतम लोगों को मैंने इस परिभाषा पर खरा उतरते देखा है।...

जामनगर में कुछ छूट गया है…

3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु। गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और प्रवृत्ति में विद्यमान कबीर ने...

अरुण जैमिनी: एक नाम नहीं, एक किरदार

“छोड़ ना यार, क्या फरक पड़ता है।” -यह वाक्य कोरा तकियाक़लाम ही नहीं, अपितु अरुण जी के जीवन का मूल सिद्धान्त भी है। जीवन की बड़ी से बड़ी भँवर से भी वे इसी एक वाक्य की डोर थामकर किनारे आ लगते हैं। पहले मुझे ऐसा लगता था कि वे दूसरों की समस्या को छोटा समझते हैं, इसीलिए सामनेवाले की परिस्थिति और तनाव के...

माहेश्वर तिवारी: गीत का उदाहरण

एक सम्पूर्ण गीत को यदि मनुष्य बना दिया जाए तो उसका आचार-व्यवहार लगभग माहेश्वर दा जैसा होगा। संवेदना में डूबकर तरल हो उठी आँखें उनके गीतकार नहीं, 'गीतमयी' होने का प्रमाण थीं। आज वे आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं। मृदु वाणी किसे कहते हैं, इसका उदाहरण आज हमसे छिन गया। सौम्य व्यक्तित्व कैसा होता है;...

मन रह गया अयोध्या में…

जहाज ने दिल्ली का रन-वे छोड़ा और मन राम के आचरण की कथा बाँचने लगा। खिड़की से बाहर झाँका, तो सूरज के तेज प्रकाश से आँखें चुंधिया गईं। भौतिक आँखें बंद हुई तो मन राम के नयनाभिराम चरित्र पर त्राटक करने लगा। अनायास ही राम से कुछ मांगने की उत्कंठा जगी तो याचना राम-आचरण की प्रार्थना के गीत में ढल गई।...

मूल प्रवृत्ति

सामान्यतया राम की मूर्ति धनुष से पहचानी जाती है, और राम का चरित्र मृदुता से! इसके ठीक विपरीत कृष्ण की मूर्ति बाँसुरी से पहचानी जाती है किन्तु कृष्ण का चरित्र एक योद्धा का चरित्र है। राम कंधे पर धनुष रखकर विनम्र जीवन जीते हैं और कृष्ण अधरों पर बाँसुरी रखकर राजनैतिक जीवन जीते हैं। दोनों के चित्र...

राम: भारतीय संस्कृति की आत्मा का एक नाम

राम... एक ऐसा नाम, जिसका उच्चारण जितने गहरे स्वर में किया जाए, मन उतना ही आराम पाने लगता है। राम... एक ऐसा नाम, जिसको पुकारने के लिए किसी विशेष मनोदशा की आवश्यकता नहीं पड़ती। जो हर परिस्थिति के अनुरूप लय धारण करने में सक्षम है। जिसका उच्चारण यकायक किसी साकार की छवि निर्मित न भी करे, तो भी किसी...

सृजन की एक समर्थ साधिका: डॉ. कीर्ति काले

कवि होने की न्यूनतम अर्हताओं में एक अदद मन की आवश्यकता होती है। और मन भी साधारण नहीं; बल्कि ऐसा मन, जिसका करुणा-कोष अक्षय हो। जिसकी कल्पना का आकाश दिखाई तो सबको दे, लेकिन उस तक पहुँचना सहज संभव न हो। जिसकी दृष्टि विहंगम हो। जिसकी आकांक्षाओं में समस्त सृष्टि के लिए शुभ की कामना हो। जिसकी उत्कंठाओं...

समय के चक्रव्यूह का अथक जोधा : शैलेश लोढा

वर्ष 2005 में हिंदी कवि सम्मेलन टेलिविज़न के परदे पर नए रूप में अस्तित्व खोज रहे थे। तमाम चैनल प्राइम टाइम में कवि सम्मेलन दिखा रहे थे, लेकिन कवि सम्मेलनों का परंपरागत प्रारूप टीवी के फॉर्मेट में फिट नहीं हो पा रहा था। ऐसे में सम्भवतः 2005 में talent hunt का प्रयोग करके कवि सम्मेलन का प्रारूप टीवी...

कृष्ण का तो चक्र भी ‘सुदर्शन’ है

नंदलला, कन्हैया, कान्हा, गिरिधर, मुरलीधर, गोपाल, मोहन, गोविन्द, मधुसूदन, केशव, रणछोड़, माधव, श्याम, वासुदेव, पीताम्बर... और भी दर्जनों संज्ञाएँ मिलकर थोड़ी-थोड़ी झलक भर दे पाती हैं एक कृष्ण की। और ये सब संज्ञाएँ कृष्ण के नाम भर नहीं हैं, अपितु ये सब नाम कृष्ण के जीवन के अलग-अलग किस्सों के शीर्षक हैं,...

error: Content is protected !!