कोई यूँ ही नहीं चुभता
मैंने कौन-सी कविता कैसे लिखी, इस प्रश्न का उत्तर देना मेरे लिए असंभव-प्रायः है। भावनाओं के सागर में उठे ज्वार ने अन्तस् की धरती पर कैसा रेणुका-चित्र अंकित किया -यह तो सबको दिखाई देता है, लेकिन इस चित्र के सृजन की त्वरित प्रक्रिया में लहर कैसे उठी; कैसे धरती पर न्यौछावर हुई; कैसे उसने रेत को काटा और कैसे वह वापस लौट गई – इन दृश्यों के साक्षी तो बहुत हैं, समीक्षक कोई नहीं।
मैंने अपने भीतर कविता के प्रस्फुटन को चाहे समझा न हो, देखा अवश्य है। सहज साक्षीभाव से सृजन की आकुलता को अनुभूत किया है। मन के भीतर गुंजायमान काव्य-ध्वनियों का दिन-रात पीछा किया है और अनुभूति से अभिव्यक्ति के बीच, यात्रा की जटिलताओं से साक्षात्कार किया है।
मुझे मालूम है कि मैं किसी कविता के अवतरण का माध्यम हो सकता हूँ, निमित्त हो सकता हूँ, रचयिता नहीं। इसी सत्य को जानते हुए, मैंने कभी कविता लिखने के लिए प्रयास नहीं किए। अभिव्यक्ति में बदलती अनुभूति की विधा के साथ कभी छेड़छाड़ करने की कोशिश नहीं की। बल्कि उद्वेलन की पराकाष्ठा पर पहुँचकर इन रचनाओं ने स्वयं ही अपने अवतरण का निमित्त बनाकर मुझे कृतार्थ किया है। मैंने तो अन्तस् में कहीं दूर गूंजती हुई ध्वनियों को सुनकर, गणपति भाव से उन्हें यथावत् काग़ज़ पर उतारने से अधिक कुछ भी नहीं किया।
जैसे मधुमास में लाल-लाल फूलों से लदने से पहले गुलमोहर के छोटे-छोटे पत्ते स्वतः ही झरने लगते हैं। ऊँचे-ऊँचे वृक्षों का आसन त्यागकर विराट धरातल पर आ उतरते हैं। ठीक उसी प्रकार, कविता भी एक अजीब सी मस्ती लिए स्वेच्छा से ही शब्दों का रूप धारण करती है। काव्य की यह मस्ती स्वयं काव्य को तो आह्लादित करती ही है, साथ ही साथ संसर्गियों के मन में भी एक पावन-सी ऊर्जा, एक सात्विक-सा रोमांच उत्पन्न करती है। इस परिस्थिति में शब्द तलाशने नहीं पड़ते; तुक मिलाने नहीं पड़ते; मात्राएँ गिननी नहीं पड़तीं और धुनें बनानी नहीं पड़ती! सब कुछ स्वतः घटित होता है, एकदम सहज… सत्य-सा…! और ध्यानस्थ योगी-सा कवि, नितान्त अकेला… अकिंचन…. रचना का अवलम्बन बनकर सुखसागर में गोते लगाता है।
अनहद नाद के समान अन्तस् में गूंजते इन काव्य स्वरों के पाश्र्व में, जो कारक विद्यमान होते हैं, उनके बूते ही अनुभूति से अभिव्यक्ति की दुर्गम यात्रा पूर्ण हो पाती है। सो, मैं आभारी हूँ उन स्थितियों, परिस्थितियों, योग तथा मनुष्यों का, जो किसी भी रूप में मेरी अनुभूति के कारक बने और अभिव्यक्ति के साक्षी रहे। साथ ही आभार व्यक्त करता हूँ, उन अपनों का जिनके स्नेहावलम्बन को पकड़ मेरा रचनाकार अब तक की यात्रा तय कर सका!
काव्य का दिव्य अवतरण मेरे माध्यम से यूँ ही काग़ज़ों पर होता रहे और माँ शारदे का आशीष सदैव मेरे अन्तस् में काव्य-प्रस्फुटन का रूप धरकर फलीभूत होता रहे!
अनुक्रम
परोक्ष
किसी का क़द ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं किसी का पद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं कहाँ गहराई है किसकी यही सबको नहीं दिखता कोई बरगद ज़रा उठ जाए तो सब देख लेते हैं ✍️ चिराग़...
इक अदद इन्सान
मैंने कब चाहा कि सिर पर ताज होना चाहिए बस मिरे माथे पे माँ का इक दिठोना चाहिए दिल में बेशक़ इक बड़ा अरमां संजोना चाहिए चंद क़तरे ऑंख में पानी भी होना चाहिए घर में ख़ुशियों के लिए कालीन या मखमल नहीं एक छोटा-सा मुहब्बत का बिछोना चाहिए ऑंसुओं की मूक भाषा को समझने के लिए हर बशर में इक अदद इन्सान होना...
कोई यूँ ही नहीं चुभता
कोई चीखा है तो उसने बड़ी तड़पन सही होगी कोई यूँ ही नहीं चुभता कहीं टूटन रही होगी किसी को सिर्फ़ पत्थर-दिल समझ कर छोड़ने वालो टटोलो तो सही उस दिल में इक धड़कन रही होगी ✍️ चिराग़...
नमक
यूँ चखा हमने बहुत दुनिया के स्वादों का नमक है ज़माने से अलग माँ की मुरादों का नमक तू परिन्दा है तिरी परवाज़ ना दम तोड़ दे लग गया ग़र शाहज़ादों के लबादों का नमक आँसुओं की शक़्ल ले लेंगी तड़प और सिसकियाँ दिल के छालों पर जो गिर जाएगा यादों का नमक दावतें धोखे की हरगिज़ हो न पाएंगीं लज़ीज़ ग़र न होगा उनमें कुछ...
फागुन की शाम
फागुन की शाम कैसी हवा चली हाय राम जोगियों का दिल धक-धक करने लगा सारी सोच बूझ घास-फूस सी बिखर गई मन को खुमार चकमक करने लगा पीपल का पेड़ सारे पंछियों के संग मिल झूम-झूम मार बक-बक करने लगा और चुपचाप मेरा मानस भी हौले-हौले प्रेम के मृदंग पे धमक करने लगा ✍️ चिराग़...
तुझको कुछ भी याद नहीं?
तेरी पलकों में सपनों की दुनिया अब आबाद नहीं मेरी यादें तेरे दिल तक पहुँचाती आवाज़ नहीं तुझको कुछ भी याद नहीं? तू मुझको रजनीबाला का मूर्तरूप सी लगती थी बातें तेरी, मुझे पौह की मधुर धूप सी लगती थी तेरा यौवन मुझे पंत की सोनजुही में दीखा था तूने मेरी यादों में रातों को जगना सीखा था वो सारी बातें अब...
गुलशन
मैंने गुलशन को कई बार सँवरते देखा हर तरफ़ रंग का ख़ुश्बू का समा होता है पंछियों की चहक सरगम का मज़ा देती है चांदनी टूट के गुलशन में उतर आती है धूप पत्तों को उजालों से सजा देती है कोई अल्हड़, कोई मदमस्त हवा का झोंका शोख़ कलियों का बदन छू के निकल जाता है इस शरारत से भी कलियों को मज़ा आता है सबसे नज़रें...
दिखावा
मुहब्बत में सनम के बिन कोई मंज़र नहीं दिखता सिवा दिलबर कोई भीतर कोई बाहर नहीं दिखता किसी को हर तरफ़ महबूब ही महसूस होता है किसी को दूर जाकर भी ख़ुदा का घर नहीं दिखता ✍️ चिराग़...
एक जिल्द में बांध दो
एक संग आकर कहें, कातिक औ’ रमज़ान एक जिल्द में बांध दो, गीता और कुरान ✍️ चिराग़ जैन
रिसाला
याद है मुझको अभी भी मैंने तुमको एक जीती-जागती कविता कहा था। सुन के तुम शरमा गई थी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी और फिर अपने उसी नटखट हसीं अन्दाज़ में चेहरे पे इक विद्वान-सी मुद्रा सजाए मेरी आँखों में उतर आई थी तुम। याद है मुझको कि उस लम्हा बिना सोचे ही तुमने टप्प से उत्तर दिया था- "तुम भी तो कोई रिसाला हो...
