कोहरा घना है
‘कोहरा घना है’ शीर्षक से तैयार की जा रही यह पुस्तक, चिराग़ जैन के उन व्यंग्य-लेखों का संग्रह है जो समसामयिक घटनाओं पर लिखे गए हैं। लोकतंत्र, राजनीति तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े इन व्यंग्य-लेखों में हास्य से अधिक चुटीले कटाक्ष का रंग देखने को मिलता है। यह पुस्तक फिलहाल प्रकाशनाधीन है।
अनुक्रम
मापदंड बदलते क्यों हैं
कोरोना से निबटने के लिए पहले जनता कर्फ़्यू और फिर लॉकडाउन की एहतियात बरती गई। अनुमान था कि 21 दिन की तालाबंदी कोरोना को पूरी तरह समाप्त कर देगी। बहरहाल, सरकार ने यह क़दम जनता के हित में ही उठाया था। बाद में लॉकडाउन भी बढ़ता रहा, वायरस भी फैलता रहा और रोजगार सम्बन्धी समस्याएँ भी विकट से विकटतम होती...
इतनी तो मर्यादा रखो
सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन। हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न...
कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका
सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता...
एनकाउंटर
आठ दिन से देश एक ऐसी फिल्म देख रहा था, जिसका क्लाइमेक्स पहले से पता था। विकास दुबे जैसे घिनौने अपराधियों की मृत्यु होनी तय थी, किन्तु एक बार फिर कष्ट इस बात का है कि समस्या की जड़ को बचाने के लिए, एक शाखा काट कर संतोष कर लिया गया। दो स्थितियाँ हो सकती हैं- यदि यह एनकाउंटर सच है तो उत्तर प्रदेश...
अपराध का सिस्टम
विकास दुबे की गुंडागर्दी को खाद-पानी देनेवाले जो लोग थे, वे उसी महकमे में काम करते थे, जिसे इस तंत्र ने जनता की सुरक्षा हेतु तैनात किया है। ये महक़मा जनता के टैक्स के पैसों से चलता है और जनता को ही थाली में रखकर अपराधियों के आगे पेश कर देता है। जिन लोगों के साथ विकास दुबे और उसके गैंग ने...
आपातकाले मतभेद नास्ते
22 मार्च 2020 के बाद हमारी ज़िंदगी पूरी तरह बदल चुकी है -यह हमें स्वीकार करना चाहिए। वायरस की दहशत से शुरू हुई इस अंधी सुरंग से हमारे मन-मानस को कब और कैसे मुक्ति मिलेगी इसका सही-सही अनुमान लगाना कठिन है। सरकारें अपनी-अपनी क्षमता और प्रवृत्तियों के अनुरूप निरंतर सक्रिय हैं। राजनैतिक उठापटक और...
श्रद्धांजलियों का ढोंग
कभी सुना था कि आपके जीवन का आकलन इस बात से किया जाता है कि आपके दुनिया से जाने के बाद लोग आपके बारे में क्या बोलते हैं। लेकिन अब लगता है कि किसी भी व्यक्ति के भीतर के घटियापन का आकलन इस बात से किया जाना चाहिए कि वह किसी की मौत को भुनाने के लिए किस हद्द तक गिर सकता है। हम इस हद्द तक ढोंगी हैं कि...
मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया
एक गर्भिणी हथिनी, तीन दिन तक अपने भीतर पल-पल बढ़ती टीस का कारण समझने की कोशिश में तड़प-तड़पकर मर गई। अपने जर्जर मुँह पर मनुष्य के बर्बर चेहरे के हस्ताक्षर लिए वह माँ अपने बच्चे को साथ लेकर दूर चली गई। ‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया’ की हिक़ारत के साथ उसके जलसमाधि...
भ्रष्टाचार की परंपरा
कोरोना विश्व भर में महामारी की तरह फैल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इस संकट से उबरने के उपाय खोज रहे हैं। ‘जान है तो जहान है’ के सिद्धांत पर चलते हुए जान बचाने के लिए काम-धंधे, आवागमन, मेलजोल आदि सब बन्द कर दिए गए हैं। दुनिया भर के शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर रहे...
जनता चुपचाप देखेगी
कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए और मीडिया की मौज हो गई। भाजपाई बता रहे हैं कि पार्टी को अपने ख़ून-पसीने से सींचनेवाले किसी नेता को साइड लाइन करना नैतिकता नहीं है। यह बयान सुनते ही शत्रुघ्न सिन्हा, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और के एन गोविंदाचार्य जैसे ढेर सारे नाम स्मृतियों...