कोहरा घना है
‘कोहरा घना है’ शीर्षक से तैयार की जा रही यह पुस्तक, चिराग़ जैन के उन व्यंग्य-लेखों का संग्रह है जो समसामयिक घटनाओं पर लिखे गए हैं। लोकतंत्र, राजनीति तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े इन व्यंग्य-लेखों में हास्य से अधिक चुटीले कटाक्ष का रंग देखने को मिलता है। यह पुस्तक फिलहाल प्रकाशनाधीन है।
अनुक्रम
बलात्कार की जड़ें
बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी...
वधस्थल में है लोकतंत्र
सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है। इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब...
पत्रकारिता का अंधा युग
जिस पत्रकारिता ने आदर्श, सिद्धांत, जनहित, सच और क्रांति जैसे शब्दों को अर्थ प्रदान किये, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सुनते हैं कि देश में जब कभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के स्तम्भ जर्जर हुए हैं, तब-तब अकेले इस एक स्तम्भ ने लोकतंत्र के ढाँचे को बचाए रखा है। ‘जब तोप मुक़ाबिल...
हम अराजक हो रहे हैं
अराजकता किसी भी स्थिति में समाधान के पथ का पाथेय नहीं हो सकती। प्रतिशोध से कभी शांति नहीं आती। कबीलाई संस्कृति में, जब न्याय हेतु कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं थी, तब प्रतिशोध-दर-प्रतिशोध ही होता रहता होगा। किन्तु जब सामाजिक व्यवस्था के लिए एक तंत्र की निर्मिति हो गई है, तो उस पूरी व्यवस्था को धता...
मानवता को श्रद्धांजलि
ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा। यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के...
मापदंड बदलते क्यों हैं
कोरोना से निबटने के लिए पहले जनता कर्फ़्यू और फिर लॉकडाउन की एहतियात बरती गई। अनुमान था कि 21 दिन की तालाबंदी कोरोना को पूरी तरह समाप्त कर देगी। बहरहाल, सरकार ने यह क़दम जनता के हित में ही उठाया था। बाद में लॉकडाउन भी बढ़ता रहा, वायरस भी फैलता रहा और रोजगार सम्बन्धी समस्याएँ भी विकट से विकटतम होती...
इतनी तो मर्यादा रखो
सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन। हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न...
कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका
सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता...
एनकाउंटर
आठ दिन से देश एक ऐसी फिल्म देख रहा था, जिसका क्लाइमेक्स पहले से पता था। विकास दुबे जैसे घिनौने अपराधियों की मृत्यु होनी तय थी, किन्तु एक बार फिर कष्ट इस बात का है कि समस्या की जड़ को बचाने के लिए, एक शाखा काट कर संतोष कर लिया गया। दो स्थितियाँ हो सकती हैं- यदि यह एनकाउंटर सच है तो उत्तर प्रदेश...
अपराध का सिस्टम
विकास दुबे की गुंडागर्दी को खाद-पानी देनेवाले जो लोग थे, वे उसी महकमे में काम करते थे, जिसे इस तंत्र ने जनता की सुरक्षा हेतु तैनात किया है। ये महक़मा जनता के टैक्स के पैसों से चलता है और जनता को ही थाली में रखकर अपराधियों के आगे पेश कर देता है। जिन लोगों के साथ विकास दुबे और उसके गैंग ने...