कोहरा घना है
‘कोहरा घना है’ शीर्षक से तैयार की जा रही यह पुस्तक, चिराग़ जैन के उन व्यंग्य-लेखों का संग्रह है जो समसामयिक घटनाओं पर लिखे गए हैं। लोकतंत्र, राजनीति तथा सामाजिक सरोकारों से जुड़े इन व्यंग्य-लेखों में हास्य से अधिक चुटीले कटाक्ष का रंग देखने को मिलता है। यह पुस्तक फिलहाल प्रकाशनाधीन है।
अनुक्रम
बात-बात पर बदलें मापदण्ड
हैदराबाद में पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया। इस घटना पर एक तबक़ा पुलिस को साधुवाद देते हुए यह तर्क दे रहा था कि न्याय व्यवस्था की विफलता के कारण पुलिस का यह क़दम तर्कसंगत है। यह शाबासी इस बात की भी गवाही दे रही थी कि यह एनकाउंटर एक वेल प्लैन्ड इंसिडेंट था। विकास दुबे एनकाउंटर केस में...
सुना है…
सुना है, कुछ वर्ष पूर्व मुम्बई में कोई परिवार, एक पत्रकार को दोषी ठहरा कर आत्मघात कर गया। मुम्बई पुलिस ने मुआमले की तफ़्तीश की और बिना किसी पर आरोप सिद्ध किये, मुआमला बन्द हो गया। सुना है, इस बीच मुम्बई में बैठी सरकार के साथ दिल्ली में बैठी सरकार का झगड़ा हो गया। परिवार बँटा तो घर के बर्तनों से लेकर...
एक अदद मनुष्य का सवाल है
दो दिन पहले हिसार की ख़बर थी कि एक व्यापारी को उसकी कार में ज़िन्दा जला दिया। अब करौली की ख़बर है कि मन्दिर के पुजारी को ज़िन्दा जला दिया। हे ईश्वर! पाशविकता का यह पथ आखि़र किस मन्ज़िल तक ले जायेगा हमारे समाज को। मैंने बचपन में एक महिला को आग की लपटों में घिरे हुए सड़क पर दौड़ते देखा है। (वह एक...
दुर्घटना : एक अवसर
एक फिल्मी सितारे ने अपने घर में फाँसी लगा ली। ख़बर सुनकर देश सन्न रह गया, लेकिन एक विशेष वर्ग ने उसके फिल्मी क़िरदार को लेकर उसे अपने धर्म का विरोधी घोषित किया और उसकी मृत्यु पर शोक न करने के संदेश सोशल मीडिया पर लिखे। बाद में दो दलों के राजनैतिक हित टकराए और उस आत्महत्या को हत्या कहकर मुद्दे को...
रात के अंधेरे में
सुना है कि चिरैया के नुचे हुए पंखों को उसके घोंसले की मिट्टी नसीब न हो सकी। रात के अंधेरे में घरवालों को घर में बन्द करके पुलिस ने बिटिया की चिता जला दी। उसकी मिट्टी से लिपटकर रो लेने का भी अधिकार न मिल सका लाचार परिवार को। सुनते हैं, इस देश में कोई असुरक्षित महसूस करे तो पुलिस उसे सुरक्षा देती...
बलात्कार की जड़ें
बलात्कारी कहीं आसमान से नहीं आते। हम जैसे ही सामान्य दिखनेवाले लोग होते हैं, ये वीभत्स अपराधी। स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कुछ बातें बनाई जाती हैं, उनकी निस्सारता हर बार उघड़कर सामने आती है। हमारे यहाँ रात-बेरात लड़कियों को अकेली जाने पर मनाही थी। लेकिन निर्भया काण्ड से पता चला कि किसी का साथ होना भी...
वधस्थल में है लोकतंत्र
सोशल मीडिया पर एक पार्टी विशेष के नेताजी पर कोई टिप्पणी की जाए अथवा कोई प्रश्न पूछा जाए तो यकायक कमेंट बॉक्स गालियों से भरने लगता है। इन गालीबाज़ों की प्रोफाइल देखें तो अधिकतर ने अपनी प्रोफाइल पर किसी धर्मविशेष अथवा दलविशेष के समर्थन की घोषणा कर रखी होती है। इस घोषणा के तमगे से सजी प्रोफ़ाइलधारी जब...
पत्रकारिता का अंधा युग
जिस पत्रकारिता ने आदर्श, सिद्धांत, जनहित, सच और क्रांति जैसे शब्दों को अर्थ प्रदान किये, वही आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। सुनते हैं कि देश में जब कभी विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के स्तम्भ जर्जर हुए हैं, तब-तब अकेले इस एक स्तम्भ ने लोकतंत्र के ढाँचे को बचाए रखा है। ‘जब तोप मुक़ाबिल...
हम अराजक हो रहे हैं
अराजकता किसी भी स्थिति में समाधान के पथ का पाथेय नहीं हो सकती। प्रतिशोध से कभी शांति नहीं आती। कबीलाई संस्कृति में, जब न्याय हेतु कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं थी, तब प्रतिशोध-दर-प्रतिशोध ही होता रहता होगा। किन्तु जब सामाजिक व्यवस्था के लिए एक तंत्र की निर्मिति हो गई है, तो उस पूरी व्यवस्था को धता...
मानवता को श्रद्धांजलि
ऋषि कपूर के निधन पर कुछ लोगों ने उन्हें हिन्दू विरोधी कहकर उनको श्रद्धांजलि देनेवालों को लानत भेजी। अमित शाह जी के कोविड संक्रमित होने पर भी कुछ संवेदनहीन लोगों ने नंगा नाच किया। राहत इंदौरी जी के निधन पर भी इस प्रवृत्ति को मुखर होते देखा। यह किस समाज की स्थापना कर रहे हैं हम लोग? मतभेद को घृणा के...