गुल्लक
इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।
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सुन्दरी
कारे-कारे कजरारे नैन तोरे प्यारे-प्यारे गीले-गीले लागत हैं नदिया के कूल से सौंधी-सौंधी खुसबू महकती है केसन में मानो अभी नहा के आई हो गोरी धूल से मस्तानी की दीवानी मुस्कान देख लें तो रोम-रोम खिले गुलदाऊदी के फूल से मीठी-मीठी बोली, मो से बोले तो मिठाई लागे औरन से बोले तब चुभते हैं सूल से ✍️ चिराग़...
प्यार वाला अहसास
प्यार वाला एक अहसास जब से जगा है अँखियों से भेद खोलती है मेरी ज़िन्दगी हर घड़ी हर पल दिन-रैन बिन चैन उस ही का नाम बोलती है मेरी ज़िन्दगी अपना तो दिल भूल आई किसी आँचल में अब बावरी-सी डोलती है मेरी ज़िन्दगी मथुरा में बन बनवारी बैठ गई और बृज की हवा टटोलती है मेरी ज़िन्दगी ✍️ चिराग़...
अनपढ़ माँ
चूल्हे-चौके में व्यस्त और पाठशाला से दूर रही माँ नहीं बता सकती कि ”नौ-बाई-चार” की कितनी ईंटें लगेंगी दस फीट ऊँची दीवार में …लेकिन अच्छी तरह जानती है कि कब, कितना प्यार ज़रूरी है एक हँसते-खेलते परिवार में। त्रिभुज का क्षेत्रफल और घन का घनत्व निकालना उसके शब्दों में ‘स्यापा’ है …क्योंकि उसने मेरी...
प्रार्थना
सब चोरी का माल है, वाणी-भजन-पुराण प्रेम-पत्र लिखवा रहे, ग़ैरों से नादान रटी-रटाई प्रार्थना, सुना-सुनाया ज्ञान बोर किया भगवान को, कैसे हो उत्थान ✍️ चिराग़...
आदमी यकसा मिला
हर कोई ख़ुद को यहाँ कुछ ख़ास बतलाता मिला हर किसी में ढूंढने पर आदमी यकसा मिला आज के इस दौर में आदाब की क़ीमत कहाँ वो क़लंदर हो गया जो सबको ठुकराता मिला हर दफ़ा इक बेक़रारी उनसे मिलने की रही हर दफ़ा ऐसा लगा, इस बार भी बेज़ा मिला जिसने उम्मीदें रखीं और क़ोशिशें हरगिज़ न कीं उसको अन्ज़ामे-सफ़र रुसवाई का तोहफ़ा...
आख़िर क्यों माँ?
माँ दुनिया तुझको अक्सर ममता की इक मूरत कहती है मैं भी तेरे त्याग, नेह और वात्सल्य का क़द्रदान हूँ। लेकिन माँ इतना बतला दे तब वो सारी नेह-दिग्धता भीतर का सारा वात्सल्य कहाँ दफ़्न कर दिया था तूने जब तूने इक सच्चे दिल से दोनों हाथ बलैयाँ लेकर अपने रब से दुआ करी थी इक बचपन के मर जाने की... जब तूने चाहा...
इक लड़की
प्यार की बयार में ये दिल झूम नाचता है जब दिल में उतरती है इक लड़की नित नए रंग, नित नई मुस्कान लिए मन में उमंग भरती है इक लड़की जीवन की सूनी बगिया महकती है जब पारिजात बन झरती है इक लड़की दिल ट्रिन-ट्रिन बजता है रोज़-रोज़ जब सांझ ढले फोन करती है इक लड़की ✍️ चिराग़...
तुम्हारा आगमन
ये हवा कल भी बही थी ज़िन्दगी कल भी यही थी कुछ कमी कल भी नहीं थी पर तुम्हारे आगमन ने बीहड़ों में जान भर दी संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी बिन तुम्हारे भी अधूरापन नहीं था ज़िन्दगी में पर ख़ुषी का भी कोई कारण नहीं था ज़िन्दगी में ये महक, ये बदलियाँ, ये बारिषंे कल भी यहीं थीं कैसे मैं कह दूँ कोई...
कोई कैसे सच बोले
जब तक हमसे भाग्य हमारे खोटे होकर मिलते हैं बस तब ही तक हम लोगों से छोटे होकर मिलते हैं कोई कैसे सच बोले सबकी है अपनी लाचारी अब तो दर्पण से भी लोग मुखोटे होकर मिलते हैं जिनसे मतलब हो बस उनकी हाँ को हाँ कहते हैं जो उनका क्या है; बिन पेंदी की लोटे होकर मिलते हैं जब से ख़ुद्दारी गिरवी रख, हमने बेच दिया...
कुछ देर मिलन के बाद
दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है ज्यों छोटी-छोटी सी बदली...
