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गुल्लक

इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।

Book Gullak by Chirag Jain

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वो शालीन पल

हाँ, गुज़ारे थे कभी दो-तीन पल कुछ हसीं, कुछ शोख़, कुछ रंगीन पल हर तरह की वासना से हीन पल अब कहाँ मिलते हैं वो शालीन पल भोग, लिप्सा, मोह के संगीन पल कब किसे दे पाए हैं तस्कीन पल आपका आना, ठहरना, लौटना इक मुक़म्मल हादसा थे तीन पल साथ हो तुम तो मुझे लगता है ज्यों हो गए हैं सब मिरे आधीन पल कँपकँपाते...

आसरा

लड़खड़ाकर गिरे नहीं होते गर तेरे आसरे नहीं होते कमनसीबी का दौर है वरना हम भी इतने बुरे नहीं होते ✍️ चिराग़ जैन

दर्द की दास्तान

दर्द की दास्तान सुन लेना ख़ुद-ब-ख़ुद साहिबान सुन लेना होंठ मेरे न कुछ कहेंगे मगर आँसुओं का बयान सुन लेना ✍️ चिराग़...

संतोष

सिर्फ़ मकरन्द बन के जी लेंगे हम तेरी गन्ध बन के जी लेंगे ज़िन्दगी चाक़ हो गई तो क्या हम भी पैबन्द बन के जी लेंगे ✍️ चिराग़...

मुक़म्मल क़लाम

सभी ग़मों को ग़ज़ल का मुकाम देता है ख़ुदा सभी को कहाँ ये इनाम देता है वो जिसकी एक-एक साँस जैसे मिसरा हो वही जहाँ को मुक़म्मल क़लाम देता है ✍️ चिराग़...

हक़ीक़त

सितम का दर्द होता है बहुत गहरा नहीं छिपता मेरी नज़रों से आँसू का कोई क़तरा नहीं छिपता किसी के होंठ कितनी भी अदाकारी करें लेकिन बनावट से हक़ीकत का कभी चेहरा नहीं छिपता ✍️ चिराग़...

मैं शायर नहीं होता

मुहब्बत के बिना अहसास से दिल तर नहीं होता अगर अहसास न हो तो सुख़न बेहतर नहीं होता मेरी पहचान है ये शायरी, ये गीत, ये ग़ज़लें किसी से प्यार न करता तो मैं शायर नहीं होता ✍️ चिराग़...

ज़रूरत

मेरी बेबस मुहब्बत को सहारों की ज़रूरत है दीवाने को महज तेरे इशारों की ज़रूरत है मेरा दिल क़ैद करने को तेरी ज़ुल्फ़ें ही काफी हैं न तीरों की ज़रूरत है न तारों की ज़रूरत है ✍️ चिराग़...

मर्यादा

न हों हदों में तो छाले रिसाव देते हैं किनारे धार को बाढब बहाव देते हैं हदों में हैं तो ख़ैर-ख्वाह हैं उंगलियों के हदों को लांघ के नाखून घाव देते हैं ✍️ चिराग़...

किसी के बिन…

भीतर-भीतर मन गलता है बाहर नैन बरसते हैं बीते पल आँखों के आगे हर पल हलचल करते हैं टूटन, आह, चुभन, सिसकन में जीवन घुलता जाता है लोग किसी के बिन जी लेना कितना सहज समझते हैं ✍️ चिराग़...

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