गुल्लक
इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।
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मिलन का क्षण
प्यार के दो बसन्ती लम्हें छू गए और सूखा हुआ मन हरा हो गया सीप को बून्द का बून्द को सीप का प्रीत को प्रीत का आसरा हो गया पर्वतों से निकल कर लगी दौड़ने धूप में बर्फ बन कर गली इक नदी पत्थरों से लड़ी, जंगलों से घिरी अनबने रास्तों पर चली इक नदी जब नदी ने समन्दर छुआ झूम कर वो भँवर बन गया बावरा हो गया जो...
ओ माधो जी!
ओ माधो जी! कल मैंने बाज़ार में देखी रूह तुम्हारी काफ़ी सजी-धजी लगती थी यूँ लगता है तुमने उसको नहलाने में अपनी आँखों का सब पानी ख़र्च कर दिया! वो जो गै़रत वाला जोड़ा तुम हरदम पहने रहते थे कल मैंने उस ही जोड़े में रूह तुम्हारी लिपटी देखी आँखें झुकी हुई थी उसकी गर्दन नीचे गड़ी हुई थी आँखों का पानी माथे पर...
संबंधों की परिभाषा
जग सीमित करना चाहे, सम्बन्धों को परिभाषा में कैसे व्यक्त करूँ मैं भावों की बोली को भाषा में क्या बतलाऊँ मीरा संग मुरारी का क्या नाता है शबरी के आंगन से अवध बिहारी का क्या नाता है क्यों धरती के तपने पर अम्बर बादल बन झरता है क्यों दीपक का तेल स्वयं बाती केे बदले जरता है क्यों प्यासा रहता चातक...
निस्पृह प्रेम
चाहता हूँ उन्हें ये अलग बात है वो मिलें ना मिलें ये अलग बात है एक अहसास से दिल महकने लगा गुल खिलें ना खिलें ये अलग बात है हम मिलें और मिलते रहें हर जनम ज़िन्दगी भर का नाता बने ना बने मन समर्पण के सद्भाव से पूर्ण हों तन भले ही प्रदाता बने ना बने बात दिल की दिलों तक पहुँचती रहें लब हिलें ना हिलें ये...
मुझे तुम भूल सकते थे
फ़ज़ाई रक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे तुम्हारा अक्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे तुम्हारी चाह हूँ, आदत, इबादत हूँ, मुहब्बत हूँ महज इक शख़्स होता तो मुझे तुम भूल सकते थे ✍️ चिराग़...
गीत लिखते वक़्त
इक दफ़ा पलकों को अश्क़ों में भिगो लेते हैं हम और फिर अधरों पे इक मुस्कान बो लेते हैं हम गीत गाते वक्त रुंध ना जाए स्वर इसके लिए गीत लिखते वक्त ही जी भर के रो लेते हैं हम ✍️ चिराग़...
याद
कभी जब नीम की डाली पे चिड़ियाँ चहचहाती हैं हज़ारों ख्वाहिशें दिल में तड़पकर कुलबुलाती हैं मेरे आगे से जब भी ख़ुशनुमा मंज़र गुज़रते हैं किसी की याद में भरकर ये आँखें छलछलाती हैं ✍️ चिराग़...
क़हक़हे
बिल्कुल ख़ाली कर दिया है मैंने दिल का भरा-पूरा मकान आँखों की बाल्टी में आँसुओं का पानी भरकर धो डाला है मकान का एक-एक कोना ...काफ़ी दिन हुए। लेकिन अब भी गूंजते हैं यादों के क़हक़हे टकराकर ख़ाली मकान की ख़ामोश दीवारों से। और मैं फिर से धोने लगता हूँ दिल के मकान की उदास दीवारें! ✍️ चिराग़...
जीवन दर्शन
मुझे गुलमोहरों के संग झरना आ गया होता किसी छोटे से तिनके पर उबरना आ गया होता तो मरते वक़्त मेरी आंख में आँसू नहीं होते कि जीना आ गया होता तो मरना आ गया होता ✍️ चिराग़...
माँ
माँ मैं तुझको क्या लिखूँ, सब तुझसे साकार जब-जब तू आशीष दे, तब-तब हो त्योहार ✍️ चिराग़ जैन
