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गुल्लक

इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।

Book Gullak by Chirag Jain

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अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे ✍️ चिराग़...

बिटिया

शादी का जोड़ा चढ़ा, सजे सोलहों साज इक छोटी-सी लाडली, बड़ी हुई है आज विदा समय बाबुल कहे, जोड़े दोनों हाथ मेरी लाज बंधी हुई, बिटिया तेरे साथ बिन कारण ताने सहे, बिन मतलब संत्रास पर उसने तोड़ा नहीं, बाबुल का विश्वास बाबुल तेरी देहरी, जब से छूटी हाय। तब से मन की बात बस, मन ही में रह जाय दो नावों में ही...

तिरंगा

अपना तिरंगा एक परचम ही नहीं है भावनाओं की बहार-सी है तीन रंग में छोटे-छोटे बालकों के अधरों पे बिखरी जो वही एक पावन हँसी है तीन रंग में प्रेम, त्याग, एकता, अखण्डता, समानता से ओत-प्रोत आत्मा बसी है तीन रंग में खादी वाले मोटे रेशों का ही ताना-बाना नहीं भारत की एकता कसी है तीन रंग में ✍️ चिराग़...

रोटी

पेट को जब भूख लगती है तो अक्सर पाँव सबके घर से बाहर आ निकलते हैं भूख के कारण सभी प्राणी, परिन्दे, जानवर सब कीट और इन्सान तक संघर्ष करते हैं तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से चींटियाँ चलतीं कतारों में निकलकर बांबियों से साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं शेर, तजकर मांद को भीषण दहाड़ें मारते हैं...

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिये जिया हर एक शख़्स...

सपना

मुझपे अब मेहरबान हो कोई मेरे सपनों की जान हो कोई मेरे मन में उतर-उतर जाए जैसे बन्सी की तान हो कोई ✍️ चिराग़ जैन

लहर

ग़रीबों के बच्चों की भूखी आँखों में पलते कोरे स्वप्न अनायास ही मिट जाते हैं सागर-तट पर फैली रेत पर लिखे नाम की तरह। रेतीली चित्रकारी को मिटाने आयी लहर हर बार दे जाती है एक नया चित्र सागर के तट को ताकि व्यर्थ न हो यात्रा भविष्य में आनेवाली लहर की! ✍️ चिराग़...

पत्थर को भी तरते देखा

हमने सूरज को यहाँ डूब के मरते देखा और जुगनू से अंधेरों को सँवरते देखा तूने जिस बात पे मुस्कान के पर्दे डाले हमने उसको तेरी आँखों में उतरते देखा एक लमहे में तेरे साथ कई रुत गुज़रीं तेरे जाने पे मगर वक़्त ठहरते देखा लोग कहते हैं बस इक शख़्स मरा है लेकिन क्या किसी ने वहाँ सपनों को बिखरते देखा तेरे...

सुरों की आह

ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है ✍️ चिराग़...

प्रभु की वन्दना

नानक, कबीर, महावीर, पीर, गौतम को पंथ-देश-जातियों का नाम मत दीजिए जिनने समाज की तमाम बेड़ियाँ मिटाईं उन्हें किसी बेड़ी का ग़ुलाम मत कीजिए मन के फ़कीर अलमस्त महामानवों को रूढ़ियों से जोड़ बदनाम मत कीजिए प्राणियों के प्रति प्रेम ही प्रभु की वन्दना है भले किसी ईश को प्रणाम मत कीजिए ✍️ चिराग़...

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