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गुल्लक

इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।

Book Gullak by Chirag Jain

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कवि

एक जन्म की साधना या तपस्या कुछ रातों की व्यक्ति को नहीं बनाती है कवि। कविता के रूप में शब्दों को संजाने के लिये करनी पड़ती है तपस्या जन्मों तक तब कहीं जाकर कठिनाई से जन्मता है कवित्व। जानते हो? कवि के सामने रखी दवात में नहीं होती है स्याही ख़ून होता है। वही ख़ून जो जलता है स्वयं कविता के सृजनार्थ...

क्या हम हिन्दुस्तानी हैं?

क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है ग़रीबी से सिसकती जान और भूख से निकलते प्राण को देखा है? ...ज़रूर देखा होगा बरसात में फुटपाथ पर भीगता हुआ हिन्दुस्तान जिसे पास भीगने को सिर है पर छिपने को घर नहीं है। जिसने अपने चीथड़ों के एक-एक रेशे को उधड़ते हुए देखा है। क्या आपने हिन्दुस्तान को देखा है? ...देखा होगा!...

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