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गुल्लक

इंडियन यूनिवर्सिटी प्रेस के अंतर्गत प्रकाशित पाठ्यक्रम शृंखला है ‘गुल्लक’। इस शृंखला का संपादन चिराग़ जैन ने किया है। इसमें उनकी अनेक रचनाएं भी सम्मिलित की गई हैं। पहली कक्षा से आठवीं कक्षा तक के लिए लिखी गई इन पुस्तकों में जो रचनाएं चिराग़ जैन ने विशेष रूप से इन्हीं पुस्तकों के लिए लिखी हैं, उनको इस खण्ड में संकलित किया गया है। बालमनोविज्ञान, पाठ्यक्रम तथा सृजनात्मकता को ध्यान में रखकर रची गई ये रचनाएं श्रेष्ठ बाल-साहित्य का उदाहरण बनेंगी।

Book Gullak by Chirag Jain

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छोड़ो वेद-पुरान

ईश्वर, बालक, माँ, कवि, ये सब एक समान इन्हें प्रेम से जीत लो, छोड़ो वेद-पुरान ✍️ चिराग़ जैन

आकांक्षा

तलवे याद न रख सकें, मिट्टी का अहसास इतना ऊँचा मत रखो सपनों का आकाश ✍️ चिराग़ जैन

सरस्वती वंदना

हम सरिता सम बन जाएँ कविता-सरगम-ताल-राग के सागर में खो जाएँ सात सुरों के रंगमहल में साधक बनकर घूमंे नयनों से मलहार बहे माँ, दादर पर मन झूमे भोर भैरवी संग बिताएँ, सांझहु दीपक गाएँ हम सरिता सम बन जाएँ हे वीणा की धरिणी, हमको वीणामयी बना दो ज्ञानरूपिणी मेरे मन में ज्ञान की ज्योत जगा दो कण्ठासन पर आन...

सुभाषचंद बोस

जिनकी धमनियों में डोलता था ज्वालामुखी, मात-भारती के क्रांति-कोष कहाँ खो गए राष्ट्र-स्वाभिमान वाली मदिरा का पान कर होते थे जो लोग मदहोश; कहाँ खो गए जिस सिंह-गर्जना से बाजुएँ फड़कतीं थीं, इन्क़लाब वाले जय-घोष कहाँ खो गए देश को आज़ादी की अमोल सम्पदा थमा के, नेताजी सुभाषचन्द बोस कहाँ खो गए ✍️ चिराग़...

मज़ा उनको भी आता है

अजब सी बात होती है मुहब्बत के तराने में क़तल दर क़त्ल होते हैं सनम के मुस्कुराने में मज़ा हमको भी आता है मज़ा उनको भी आता है उन्हें नज़रें चुराने में हमें नज़रें मिलाने में ✍️ चिराग़...

अन्तर

अन्तस् की पावन भोगभूमि और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी अधरों की सौम्यता। लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान विश्वास की पारदर्शी भागीरथी अनायास ही छलक पड़ती है सागरमुक्ता-सी दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित निश्छल खिलखिलाहट के साथ। और इस पल को शब्दों में बांधने के निरर्थक प्रयास करके कसमसाकर रह जाता...

अहसास

मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है ✍️ चिराग़...

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई और आग में जलती देश की कमाई मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश? क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास? क्या सड़क को...

मन में श्रद्धा हो तो

प्रेमी को प्रेमी का होना भर ही काफ़ी होता है मन में श्रद्धा हो तो इक पत्थर ही काफ़ी होता है ग़ैरों के संग रहना महलों में भी रास न आएगा अपनापन मिल जाए तो कच्चा घर ही काफ़ी होता है ✍️ चिराग़...

जो है वही कहना

किसी भी चोट को सहना बड़ा दुश्वार होता है जु़बां हो और चुप रहना बड़ा दुश्वार होता है ये माना दर्द को अभिव्यक्त करना भी ज़रूरी है मगर जो है वही कहना बड़ा दुश्वार होता है ✍️ चिराग़...

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