+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

बकोध्यानम्

‘बकोध्यानम्’ चिराग़ जैन का व्यंग्य-संग्रह है, जो फिलहाल प्रकाशनाधीन है। इस पुस्तक में प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए उन लेखों को सहेजा गया है जिनका मूल उद्देश्य अपने समाज को बेहतर बनाना है। इस पुस्तक में विविध विषयों पर लिखे गए व्यंग्य-लेखों का संग्रह है।

अनुक्रम

थाने मत जइयो

हमारे यहाँ पूरा पुलिस महक़मा दर्शनशास्त्र के इसी सिद्धांत पर कार्य करता है कि बड़ी समस्या आते ही मनुष्य को अन्य समस्याएँ छोटी लगने लगती हैं। इसीलिए आप कोई भी समस्या लेकर थाने जाइये, पुलिसवाले उसे टुच्चा सिद्ध करने के लिए तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। तब आपको पता चलता है कि जिसे आप समस्या समझ रहे थे, वह...

चर्चालुओं से श्रद्धालुओं तक

नुक्कड़ का पनवाड़ी, चाय की मढ़ैया, बीड़ी-सिगरेट का खोखा, सिटी बस, लोकल ट्रेन और सार्वजनिक शौचालय की लाइन -ये सब चर्चाओं के स्वर्ग हैं। जैसे संसद में पक्ष और विपक्ष होते हैं, ऐसे ही इन चर्चाओं में भी पक्ष और विपक्ष होते हैं। विपक्ष के बिना चर्चा हो ही नहीं सकती। विपक्ष के अभाव में तो केवल गुणगान किया...

दान का उपदेश

हम अजीब किस्म के नकारात्मक लोग हैं। हमें दूसरों पर उंगली उठाने की लत पड़ी हुई है। इस भयावह संकट के समय में भी आज सुबह से लोग अलग-अलग सेलिब्रिटीज़, अलग-अलग उद्योगपतियों और अलग-अलग राजनेताओं के नाम लिखकर लानत भेज रहे हैं कि संकट के समय वे अपनी पूंजी में से दान करके समाजसेवा क्यों नहीं करते? हद्द है...

हँसना बहुत ज़रूरी है

भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में कोरोना, दहशत का सबब बन गया है। अमरीका, चीन और इटली जैसे देशों ने सख्ती के साथ जनता को घरों में बन्द कर दिया है। भारत में भी सरकार को कमोबेश सख्ती बरतनी पड़ रही है। दरअस्ल अनवरत भागती-दौड़ती ज़िन्दगी को टिककर बैठने का अभ्यास ही नहीं रहा है। तेज़ दौड़ती गाड़ी के ड्राइवर को...

लोकतन्त्र की नयी परिभाषा

भारतीय लोकतंत्र अपने सर्वाधिक वैभवशाली दौर से गुज़र रहा है। एक राजनैतिक दल ने जनता को बिजली-पानी मुफ़्त देने का ब्लूप्रिंट दिया। दूसरे राजनैतिक दल ने आटा फ्री बाँटने की घोषणा की। एक समय था जब चुनाव जीतने के लिए शराब, पैसा, सिलाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप और साड़ियाँ बाँटी जाती थी। इस चुनावी रिश्वत का बोझ...

लोकतंत्र का बकासुर

यह लोकतंत्र का सौंदर्य है कि जिस प्रदेश में चुनाव होते हैं, पूरे देश की चिंताएँ और चिंतन उसी प्रदेश पर केंद्रित हो जाते हैं। बाक़ी पूरे देश में सब कुछ अपने आप ठीक चल रहा होता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने कितनी दूरदर्शिता के साथ यह व्यवस्था की होगी कि देश के तमाम खुराफ़ाती मस्तिष्कों से देश को...

देश का भला

"भाई! देश का भला कब होगा?" "जब आपके वोट से हम चुनाव जीतेंगे।" "भैया जी! चुनाव में जीत मुबारक़ हो। अब देश का भला कीजिये!" "अभी तो जीते हैं यार। चुनावों में रात-दिन काम किया है। साँस तो ले लें।" "सर जी! आपको चुनाव जीते एक साल हो गया, अब देश का भला कीजिये।" "विपक्ष ने हमारा जीना मुहाल कर रखा है। रोज़...

आरोपी और अपराधी

आरोपी और अपराधी में क्या अंतर होता है; यह समझने के लिए विवेक का जागृत होना आवश्यक है। उन्माद विवेक की हत्या करके जन्म लेता है। उन्माद भीड़ का मूल स्वभाव है। हमारी राजनीति हमें नागरिकों से जनता और जनता से भीड़ बनाने में तो सफल हो ही गई है। जब लिंचिंग और एनकाउंटर जैसे हथकंडे जन से प्रशंसा पाने लगें,...

समस्या ख़ुद कन्फ़्यूज़्ड है

हम भारतीय लोग ज़रा हटकर सोचते हैं। जैसे ही कोई समस्या हमारे सामने आती है तो हम उसकी ओर देखते ही नहीं। समस्या चिंघाड़ कर कहती है कि मैं तुम्हारा सर्वनाश कर रही हूँ, लेकिन हम उसकी इन बातों को कान न देकर उसके अगल-बगल कुछ टटोलने लगते हैं। बिल्कुल उस पगले की तरह जिसे चोट लग जाए तो वह उसकी मरहम तलाशने की...

राजनीति का निश्छल रूप

मन बहुत भावुक है। जिस देश के सरकारी कर्मचारी दिन में भी काम नहीं करते, उस देश के राजनेता रात भर काम करते रहे। जिन राजनेताओं को हम भ्रष्टाचारी कहते हैं, वे राजनेता महाराष्ट्र में सरकार बनाने की भयंकर आपाधापी के बीच किसानों की समस्याओं पर चर्चा करने के लिए प्रधानमंत्री से मिले। जिन विधायकों को हम...

error: Content is protected !!