बकोध्यानम्
‘बकोध्यानम्’ चिराग़ जैन का व्यंग्य-संग्रह है, जो फिलहाल प्रकाशनाधीन है। इस पुस्तक में प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए उन लेखों को सहेजा गया है जिनका मूल उद्देश्य अपने समाज को बेहतर बनाना है। इस पुस्तक में विविध विषयों पर लिखे गए व्यंग्य-लेखों का संग्रह है।
अनुक्रम
शुभचिंतक
एक राजा के दो बेटे थे। एक नाटे कद का था और दूसरा लंबे कद का। बचपन से ही दोनों में तनाव रहता था। जब वे बड़े हुए तो राजा ने राज्य का बंटवारा कर दिया और पूरे देश के अधिकतम नाटे नागरिक नाटे बेटे के देश में चले गए। मूल राज्य में लंबे नागरिक रह गए। लेकिन कुछ नाटे लोग अपना देश छोड़कर नाटे देश में नहीं गए...
युद्ध : एक अवसर
‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो...
वितण्डावाद का ताण्डव
‘सत्ता का खेल तो चलेगा। सरकारें आएंगी-जाएंगी। पार्टियाँ बनेंगी-बिगड़ेंगी। मगर ये देश रहना चाहिए। इस देश का लोकतन्त्र अमर रहना चाहिए। क्या आज के समय में ये कठिन काम नहीं हो गया है? ये चर्चा तो आज समाप्त हो जाएगी। मगर कल से जो अध्याय शुरू होगा, उस अध्याय पर थोड़ा ग़ौर करने की ज़रूरत है। ये कटुता बढ़ना...
भारतीय लोकतंत्र : एक ढकोसला
भारतीय जनता पार्टी के चुनावी चाणक्य बाक़ायदा मीडिया के सामने बैठक बुलाकर यह बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का वोट अपनी ओर मिलाने के लिए वे जाट नेताओं को माना रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी घोषणा करके दलितों की पार्टी होने का दावा करती है। एआईएमएम घोषित करती है कि वह मुसलमानों की पार्टी है।...
मास्टरजी की ऐसी-तैसी
‘मनसुख’ अपने खेत के एक कोने में पक्षियों के लिए चुग्गा डाल रहा था। उसे ऐसा करते देख गाँव के मास्टरजी ने उसे रोकना चाहा। मनसुख ने मास्टरजी को निष्ठुर, निर्दयी और चिड़िया-विरोधी कहकर अपमानित किया और सारे गाँव में कहता फिरा कि ”मास्टर ‘चुग्गा विरोधी गैंग’ का सरगना है। खाली पड़े खेत में चिड़ियों को...
जनकल्याण की भूल-भुलैया
सरकार सदन में चिल्लाती है कि हम जन-कल्याण करेंगे। विपक्ष भी सदन में चिल्लाता है कि हम जन-कल्याण करवाएंगे। दोनों तरफ़ की आवाज़ें ऊँची होती जाती हैं। शोर-शराबा बढ़ता है तो स्पीकर सदन की कार्रवाई स्थगित कर देते हैं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी आवाज़ लिए सदन के बाहर निकल आते हैं। उन्हें बाहर आता देखकर मीडिया...
क़िस्से-कहानियों का सताया हुआ लोकतंत्र
हमें बचपन से यह पढ़ाया गया है कि फलाने राजा ने ख़ुश होकर फलाने व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएँ दीं। बस यहीं से हमारे मस्तिष्क को कैप्चर करने का खेल शुरू हो गया। हम कलाकार हैं, तो अपनी कला से राजा को ख़ुश करने में लगे रहे। हम विद्वान हुए, तो अपनी विद्वत्ता से राजा को ख़ुश करते रहे। हम चतुर हुए, तो अपना...
आज बुलेटिन तेरा भाई पढ़ेगा!
एक एंकर स्टूडियो में नशा करके ख़बर पढ़ रहा था तो पूरे देश ने उसका मज़ाक़ बनाकर रख दिया। यह सरासर बदतमीज़ी है। ऐसे किसी का मज़ाक़ बनानेवाले समझ लें कि मज़ाक़ बनाने का अधिकार केवल मीडिया के पास है। वह लोकतंत्र, न्यायपालिका, जनभावना, चुनाव प्रक्रिया, राजनीति और यहाँ तक कि किसी की मुर्दनी तक का मज़ाक़ बनाने के...
न्यूज़ एंकरिंग की आत्मा
‘आज तक में पेश हैं अभी तक की ख़बरें’ से शुरू हुआ ‘न्यूज़ एंकरिंग’ का सफ़र लड़खड़ाती हुई ज़ुबान में माथा पकड़कर ख़बर पढ़ते न्यूज़ एंकर तक पहुँच गया है। टीवी पर समाचार पढ़नेवाले समाचार वाचक जब भावना शून्य चेहरे, सपाट स्वर, क्लीन्ड शेव, टाई, कोट जैसे सुनिश्चित गेट-अप में समाचार पढ़ते थे, तब दाढ़ी बढ़ाकर, ख़बर की...
मध्यम वर्ग का शिकार
मध्यम वर्ग इस देश का सर्वाधिक दीन-हीन प्राणी है। उसका जन्म इसीलिए हुआ है कि वह शासन-प्रशासन से लेकर निजी कंपनियों तक के अर्थ-आखेट के काम आ सके। जंगल में हिरन शिकार के ही काम आते हैं। शेर से बच गये तो लकड़बग्घों, तेंदुओं और सियारों तक की निगाह हिरनों पर रहती है। इन सबसे बच जाएँ तो किसी मनुष्य को...