बकोध्यानम्
‘बकोध्यानम्’ चिराग़ जैन का व्यंग्य-संग्रह है, जो फिलहाल प्रकाशनाधीन है। इस पुस्तक में प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए उन लेखों को सहेजा गया है जिनका मूल उद्देश्य अपने समाज को बेहतर बनाना है। इस पुस्तक में विविध विषयों पर लिखे गए व्यंग्य-लेखों का संग्रह है।
अनुक्रम
सरकार का जवाब
चौराहे पर खड़ा भिक्षुक दल हमारी गाड़ी के शीशे पर जी भर के ठुक-ठुक करता है। जब हम उसे भीख देने से इनकार करते हैं तो वह गाली बकने से लेकर, गाड़ी पर खरोंच मारने तक की प्रतिक्रिया देता है। दस-बीस मीटर दूर खड़ा ट्रैफिक पुलिस का जवान उसे कुछ नहीं कहता क्योंकि उसका काम गाड़ियों को रोकना है, भिखारियों को नहीं।...
स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है
सिचुएशन 1 : राधा कृष्ण से प्रेम करती थीं। कृष्ण भी उनसे प्रेम करते थे। दोनों अविवाहित थे किंतु इस प्रेम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं। निष्कर्ष : परस्पर सहमति पर आधारित संबंध स्वीकार्य है। सिचुएशन 2 : कर्ण को द्रौपदी के स्वयंवर में भाग नहीं लेने दिया गया। रावण सीता स्वयंवर में भाग नहीं ले पाए। कर्ण...
सूचना पट्ट से झाँकती सभ्यता
यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो दीवारों पर लिखी हिदायतें हमारी बुरी आदतों का आईना हैं। कल्पना करें तो शायद हम समझ पाएंगे कि अपने सपनों के घर की खूबसूरत दीवार पर तारकोल से ‘गधे के पूत, यहाँ मत मूत’ लिखनेवाला आदमी किस हद तक परेशान हुआ होगा। यत्र-तत्र-सर्वत्र मूत्रत्याग करने वाले निष्ठावान...
कबिरा इन द मार्केट
कबिरा लुकाठी लेकर बाज़ार की ओर गया। उसे देखकर अपना घर फूँकने को प्रेरित हुए कुछ नवयुवक उसके साथ हो लिए। बीच बाज़ार खड़े होकर कबिरा ने लड़कों से पूछा- ‘बॉयज़, आर यू रेडी टू सेट फायर ऑन योर ओन हाउस?’ लड़के जोश में आकर बोले- ‘यस सर!’ कबिरा बोला- ‘ओके, गेट रेडी विद योर लुकाठी।’ लड़के निराश होकर बोले- ‘बट वी...
कवि-सम्मेलनों का स्तर
हिंदी की साहित्यिक गोष्ठियों में यह प्रश्न अक्सर चर्चा का विषय बनता है कि कवि-सम्मेलनों का स्तर गिर रहा है। मंच पर फूहड़ता बढ़ रही है। चुटकुलेबाज़ ख़ुद को कवि कहने लगे हैं। लफ़्फ़ाज़ी और बकवास करके श्रोताओं का समय नष्ट किया जाता है। वही पुरानी कविताएँ सुनाकर मोटे लिफाफे लेने का चलन बढ़ गया है। कविता के...
भीष्म प्रतिज्ञा का मीडिया ट्रायल
भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसमें अपने पिता की छवि देखूंगा। भीष्म लकी थे कि उस दौर में कांग्रेसी और भाजपाई लोग नहीं थे। वरना कोई भी चैनल अपने प्राइम टाइम में विरोधी पार्टी वाले किसी बड़बोले को बुलवाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का ऐसा हश्र करता कि भीष्म उसका एक्सप्लेनेशन देने की बजाय...
अतिवादी
गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। "बॉर्डर" फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को "मेरे भाई" और "मेरे दोस्त" जैसे...
द ग्रेट तीतरबाज़ डेमोक्रेसी
काफी समय पहले तीतरों के समाज में एक नालायक तीतर ने लड़ाई-भिड़ाई से समय निकाल कर कुछ पढ़ने-लिखने की ठानी। युवा तीतर की इस इच्छा से तीतर समाज बहुत दुखी हुआ। कई बुज़ुर्ग तीतरों ने उसे समझाया कि बेटा, इस पढाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। लड़ाई-झगड़ा करोगे तो कुछ बन जाओगे। आज का फसाद कल तुम्हें मुहल्ले में...
व्यंग्यकार और व्यंग्य
व्यंग्यकारों के लिए ये जानना बेहद आवश्यक है कि व्यंग्य में बात टेढ़ी होनी जरूरी है, मुँह नहीं। व्यंग्यकार की बात श्रोता को थोड़ी देर से समझ आए तो यह व्यंग्य की गुणवत्ता है लेकिन व्यंग्यकार अपनी बात खुद भी बमुश्किल समझ पा रहा हो तो यह व्यंग्यकार की आत्ममुग्धता है। किसी चर्चा में से व्यंग्य निकालने के...
लोकतंत्र के चार स्तम्भ
भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा। विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी युवतियों को ढँक-ओढ़ कर रहना सिखाने...