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बकोध्यानम्

‘बकोध्यानम्’ चिराग़ जैन का व्यंग्य-संग्रह है, जो फिलहाल प्रकाशनाधीन है। इस पुस्तक में प्रवृत्तियों पर कटाक्ष करते हुए उन लेखों को सहेजा गया है जिनका मूल उद्देश्य अपने समाज को बेहतर बनाना है। इस पुस्तक में विविध विषयों पर लिखे गए व्यंग्य-लेखों का संग्रह है।

अनुक्रम

अथ अमरीका-इज़रायल प्रेमकथा

वाटिका में विचरण करते हुए अमरीका की दृष्टि, चुहल करती हुई इज़रायल पर पड़ी। अमरीका, इज़रायल के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। इज़रायल भी अमरीका के वैभव और साज-सज्जा से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। आंखों ही आंखों में उपजा प्रेम, अधरों से अभिव्यक्त न हो सका और दोनों मन की बात मन में दबाए अपने-अपने महल...

मुहल्ला स्तरीय अमरीका-ईरान युद्ध

हमारे मुहल्ले के पश्चिमी छोर पर श्याम का घर है और लगभग पूर्वी छोर पर छैनू रहता है। श्याम और छैनू के बीच लम्बे समय से तनातनी का माहौल बना हुआ है। दोनों के बीच जब-तब कहासुनी होती रहती है, जिसे मुहल्ले की चौपाल पर हाथापाई सिद्ध करनेवालों की कमी नहीं है। बालकनी में सूखते कपड़ों पर मिट्टी फेंकने से...

अवसर

राज्य में नियम बना कि जो भी नागरिक राजा की आलोचना करेगा, उसे मृत्युदंड दिया जाएगा। भयभीत प्रजा मौन हो गई। एक दिन एक मंत्री ने राजा का मूड देखकर सलाह देने की हिम्मत की- "महाराज, यदि प्रजा के बोलने पर रोक लगी रही तो लोगों के भीतर-भीतर गुस्सा भर जाएगा। और इससे क्रांति की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। राजा...

भारतीय राजनीति : एक निबंध

भारतीय राजनीति में दो पक्ष होते हैं। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे की दृष्टि में विपक्ष होते हैं। भारत की राजनीति एक सधे हुए नाटक की तरह है जिसकी बाकायदा एक पटकथा है। इस पटकथा में हर पक्ष के अलग-अलग संवाद हैं। पाँच साल में एक बार मतदान की पर्चियों से यह तय किया जाता है कि कौन-सा पक्ष कौन से संवाद बोलकर...

फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

संपन्नता से वे ऑफ लिविंग बदल सकता है, लेकिन वे ऑफ थिंकिंग पर संपन्नता का कोई असर नहीं होता। झुग्गी बस्ती में पानी का टैंकर आने पर जिस तरह की झड़प होती है ठीक वैसी ही तू-तू-मैं-मैं एयरपोर्ट पर सिक्युरिटी चेक करते समय भी ख़ूब होती है। अन्तर बस इतना है कि फेंकने की सिचुएशन आने पर पानी की बाल्टी,...

बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी। जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता।...

भीड़ हैं हम

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी...

स्वयंभू सेलिब्रिटी

मेरे एक परिचित हैं, जो पिछले कुछ महीनों से ख़ुद को सेलिब्रिटी मान बैठे हैं। अब वे दिन भर भीतर ही भीतर सेलिब्रिटी होने के भाव से भरकर अपने आसपास के सभी मनुष्यों को तुच्छ समझते हुए विचरते हैं और रात होने पर शेष विश्व को टुच्चा समझते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ सो जाते हैं। उनकी सबसे बड़ी चुनौती...

सावधान, आगे सड़क है!

भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सड़कें बनाई नहीं जातीं। ऐसा लगता है मानो हर सड़क भारतीयों को संघर्षों से जूझने का प्रशिक्षण देने के लिए राहों में बिछ गई हो। देश की राजधानी से प्रारंभ करते हैं। इस शहर की सड़कों के दोनों ओर फुटपाथ बनाए गए हैं। फुटपाथ, अर्थात् रेहड़ी, पटरी लगाने का स्थान। कहीं-कहीं मूत्रालय...

हमारा लोकतन्त्र महान!

लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह...

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